अन्तःकरण की हृदय की शुद्धि चाहिए, निश्चय चाहिए, निस्वार्थ भावना चाहिए और सच्चा स्नेह चाहिए। संसार में जिससे प्राप्ति होती है उसके लिए सब कुछ करने के लिए तैयार रहते हो लेकिन वो जो तुम्हारा हर जन्म में ध्यान रखता है उसे भूल जाते हो। कहते हो याद करने की फुर्सत नहीं और भूल जाते हैं। उक्त प्रेरणादायी सद्विचार सद्गुरूवार भोग दिवस पर प्रातःकालीन राजयोग प्रवचनमाला में परमपिता परमात्मा शिव के महावाक्यों को स्पष्ट करते हुए प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के अलीगढ रोड स्थित आनन्दपुरी कालोनी के सहज राजयोग प्रशिक्षण केन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी शान्ता बहिन ने व्यक्त किये। बहिन शान्ताजी ने कहा कि मंदिरों में जाते हो और अपने अवगुणों को सुनाते हो नीच, पापी कहते हो ‘‘मैली चादर ओढ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ’’ यह भी गाते हो दूसरी ओर सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी देवताओं की महिमा गाते हो तथा घर पर लौटने पर कहते हो बुराईयों के बिना संसार नहीं चलता।
यह काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार ज़रूरी हैं। अगर बुराईयाँ नहीं रहीं तो यह सृष्टि कैसे चलेगी। जब मन यह मानता है कि बुराईयों के बिना काम ही नहीं चलता तो भारत जो कभी दैवताओं की भूमि रहा है, जहाँ सत्य, प्रेम, अहिंसा आदि गुणों की धारणा रही है महिमा वर्णन करने से क्या लाभ होगा। उन्होंने कहा कि गृहस्थ व्यवहार में कमल फूल के समान रहना यह दैवीय प्रवृत्ति की निशानी है इसलिए उनके हर अंग जैसे मुखकमल, हस्तकमल, पदमकमल, नयनकमल इत्यादि की तुलना कमल से की गई है। शिव जयन्ति मनाते हैं जो ज्ञान के सागर हैं, पतितों को पावन बनाने वाले हैं, विश्वकल्याणकारी होने के कारण शिव हैं तो वे आकर कुछ न कुछ तो करते ही होंगे। करते भी वही हैं जैसे उनके नाम हैं। गीता में कहा गया है कि भगवान को यज्ञ, जप, तप, पूजा पाठ से प्राप्त नहीं किया जा सकता। उनको स्वयं ही निज परिचय देने के लिए इस विषय सागर में बुराईयों रूपी हलाहल विष को पीने के लिए आना पड़ता है। शिव बाबा ने कहा है कि मेरे को याद करेंगे तो मेरे पास आ जायेंगे। पुकारने, फरियाद करने, चिल्लाने की बजाए अपने शान्त स्वधर्म में स्थित होकर याद करो तो जीवन रूपी बेड़ा इस भवसागर अर्थात् दुःखों के सागर से पार हो जाये। मैं करता हूँ यह न कहकर मुख से बाबा-बाबा कहते रहो, वो ही करा रहे हैं वो ही चला रहे हैं ऐसे अभ्यास से अपना अभिमान समाप्त हो जायेगा और आत्मा स्थितप्रज्ञ बन जायेगी।
बहिन शान्ता जी ने कहा कि कर्मा से ही वर्णों का उदय हुआ है जो कर्मों में श्रेष्ठ हैं, व्यवहार में सच्चे हैं, जो पवित्र ब्रह्मचारी जीवन जीने वाले हैं, जिनके अन्दर दैवीय गुणों पवित्रता, नम्रता, सत्यता, मधुरता आदि गुणों की धारणा करने वाले हैं, जिनका अन्न प्राप्त करने के साधन पवित्र है और शुद्ध अन्न ग्रहण करते हैं, संसार विषय सागर में रहते हुए भी जिनका नियमित रूप से परमपिता सत्यम् शिवम् सुन्दरम का सतसंग है वही सच्चे ब्राह्मण हैं। केवल जटा चोटी रखने और विशेष गोत्र में जन्म लेने वाले लेकिन कर्मों में शुद्धता, पवित्रता सद्चरित्रता धारण न करने वाले ब्राह्मण नहीं। महाभारत पुराण में भी कहा गया है कि जिस व्यक्ति में चाहे वह किसी भी जाति अथवा धर्म का हो उसके अन्दर सत्य, दान , क्षमा, शील, तप आदि हो वही ब्राह्मण है।
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