समर्पण का अर्थ अहं का विसर्जन है। अहं के कारण ही सर्वशक्तिमान परमात्मा से हमारा संबंध नहीं जुट पाता। अहंकार के उन्मूलन के बाद परमपिता परमात्मा की सर्वशक्तियां हममें प्रवाहित होने लगती है। गज-ग्राह युद्ध और चीरहरण इसी के प्रतीक हैं। जब तक गज अपनी शक्ति के अहंकार से भरा रहा, ग्राह उसे जल में खींचता चला गया। अंततोगत्वा जब उसका अहं टूटा और पूरे हृदय से उसने परमात्मा से प्रार्थना की तभी उसमें ईश्वरीय शक्ति प्रवाहित होने लगी और ग्राह मारा गया। इसी तरह द्रोपदी को भी जब तक अपने पतियों की शक्ति पर विश्वास था, तब तक परमात्मा की सहायता नहीं मिली, जब सब तरफ से निराश होकर परमात्मा को पुकारा तब प्रभु तुरंत उपस्थित हुए। गीता में परमात्मा का आदेश है-'मामेकं शरणं ब्रज।' लेकिन हम केवल एक परमात्मा की शक्ति का भरोसा न कर अनेक का भरोसा करते रहते है। फलस्वरूप दो नावों पर पांव रखने वालों जैसी हमारी गति हो जाती है।
समर्पित व्यक्ति शून्य होता है। उसमें कोई आशा, आकांक्षा, कामना और वासना नहीं होती, वह परमात्मा का यंत्र व उनका वाद्य बन जाता है। मुरली की तरह वह भीतर से रिक्त होता है, परमात्मा के स्वरों के लिए वह कोई अवरोध नहीं उत्पन्न करता। वह जैसा चाहे जो चाहे वैसा हो जाए तभी मुरली का गायन है। धन्य है वह लोग जो परमात्मा की ज्ञान-मुरली, ज्ञान वीणा बने हैं। उन्हीं का जीवन सफल है, कृतार्थ है। जिस तरह से विसर्जन ही समर्पण है और समर्पण का आधार श्रद्धा है। आध्यात्मिक क्षेत्र में श्रद्धा बहुत बड़ी संपत्ति है। संशयग्रस्त मनुष्य कभी भी परमात्मा को नहीं पा सकता। वर्तमान शताब्दी संशय से भरी हुई है, अत: परमात्मा से तथा आध्यात्मिकता से बहुत दूर चली गई है। भौतिक क्षेत्र में तो संशय की मनोवृत्ति से हमें अनेक उपलब्धियां हुई, लेकिन आध्यात्मिक प्रगति के लिए संशय की मनोवृत्ति बहुत अधिक खतरनाक सिद्ध हुई। आत्मानुभूति और ईश्वरानुभूति के लिए श्रद्धा की मनोवृत्ति आवश्यक है। आज के युग में श्रद्धा के पुनर्जागरण की आवश्यकता है। मनुष्य की जब तक तर्क बुद्धि शांत नहीं हो जाती तब तक श्रद्धा और समर्पण के लिए विसर्जन चाहिए अहंकार का।
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