सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
ब्रह्माकुमार भगवान भाई ब्रह्माकुमारीज़ माउंट आबू राजस्थान भारत ने अब तक 5000 स्कूल , कॉलेजों और 800 जेल में प्रोग्राम कर इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज किया है ,नैतिक मूल्य पर लगभग 2000 अधिक लेख भी लिखे है ३२ वर्षो से माउंट आबू में ईश्वरीय सेवा में समर्पित है
Monday, October 31, 2011
Saturday, October 29, 2011
अन्तःकरण की हृदय की शुद्धि चाहिए, निश्चय चाहिए, निस्वार्थ भावना चाहिए और सच्चा स्नेह चाहिए।
अन्तःकरण की हृदय की शुद्धि चाहिए, निश्चय चाहिए, निस्वार्थ भावना चाहिए और सच्चा स्नेह चाहिए। संसार में जिससे प्राप्ति होती है उसके लिए सब कुछ करने के लिए तैयार रहते हो लेकिन वो जो तुम्हारा हर जन्म में ध्यान रखता है उसे भूल जाते हो। कहते हो याद करने की फुर्सत नहीं और भूल जाते हैं। उक्त प्रेरणादायी सद्विचार सद्गुरूवार भोग दिवस पर प्रातःकालीन राजयोग प्रवचनमाला में परमपिता परमात्मा शिव के महावाक्यों को स्पष्ट करते हुए प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के अलीगढ रोड स्थित आनन्दपुरी कालोनी के सहज राजयोग प्रशिक्षण केन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी शान्ता बहिन ने व्यक्त किये। बहिन शान्ताजी ने कहा कि मंदिरों में जाते हो और अपने अवगुणों को सुनाते हो नीच, पापी कहते हो ‘‘मैली चादर ओढ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ’’ यह भी गाते हो दूसरी ओर सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी देवताओं की महिमा गाते हो तथा घर पर लौटने पर कहते हो बुराईयों के बिना संसार नहीं चलता।
यह काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार ज़रूरी हैं। अगर बुराईयाँ नहीं रहीं तो यह सृष्टि कैसे चलेगी। जब मन यह मानता है कि बुराईयों के बिना काम ही नहीं चलता तो भारत जो कभी दैवताओं की भूमि रहा है, जहाँ सत्य, प्रेम, अहिंसा आदि गुणों की धारणा रही है महिमा वर्णन करने से क्या लाभ होगा। उन्होंने कहा कि गृहस्थ व्यवहार में कमल फूल के समान रहना यह दैवीय प्रवृत्ति की निशानी है इसलिए उनके हर अंग जैसे मुखकमल, हस्तकमल, पदमकमल, नयनकमल इत्यादि की तुलना कमल से की गई है। शिव जयन्ति मनाते हैं जो ज्ञान के सागर हैं, पतितों को पावन बनाने वाले हैं, विश्वकल्याणकारी होने के कारण शिव हैं तो वे आकर कुछ न कुछ तो करते ही होंगे। करते भी वही हैं जैसे उनके नाम हैं। गीता में कहा गया है कि भगवान को यज्ञ, जप, तप, पूजा पाठ से प्राप्त नहीं किया जा सकता। उनको स्वयं ही निज परिचय देने के लिए इस विषय सागर में बुराईयों रूपी हलाहल विष को पीने के लिए आना पड़ता है। शिव बाबा ने कहा है कि मेरे को याद करेंगे तो मेरे पास आ जायेंगे। पुकारने, फरियाद करने, चिल्लाने की बजाए अपने शान्त स्वधर्म में स्थित होकर याद करो तो जीवन रूपी बेड़ा इस भवसागर अर्थात् दुःखों के सागर से पार हो जाये। मैं करता हूँ यह न कहकर मुख से बाबा-बाबा कहते रहो, वो ही करा रहे हैं वो ही चला रहे हैं ऐसे अभ्यास से अपना अभिमान समाप्त हो जायेगा और आत्मा स्थितप्रज्ञ बन जायेगी।
बहिन शान्ता जी ने कहा कि कर्मा से ही वर्णों का उदय हुआ है जो कर्मों में श्रेष्ठ हैं, व्यवहार में सच्चे हैं, जो पवित्र ब्रह्मचारी जीवन जीने वाले हैं, जिनके अन्दर दैवीय गुणों पवित्रता, नम्रता, सत्यता, मधुरता आदि गुणों की धारणा करने वाले हैं, जिनका अन्न प्राप्त करने के साधन पवित्र है और शुद्ध अन्न ग्रहण करते हैं, संसार विषय सागर में रहते हुए भी जिनका नियमित रूप से परमपिता सत्यम् शिवम् सुन्दरम का सतसंग है वही सच्चे ब्राह्मण हैं। केवल जटा चोटी रखने और विशेष गोत्र में जन्म लेने वाले लेकिन कर्मों में शुद्धता, पवित्रता सद्चरित्रता धारण न करने वाले ब्राह्मण नहीं। महाभारत पुराण में भी कहा गया है कि जिस व्यक्ति में चाहे वह किसी भी जाति अथवा धर्म का हो उसके अन्दर सत्य, दान , क्षमा, शील, तप आदि हो वही ब्राह्मण है।
यह काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार ज़रूरी हैं। अगर बुराईयाँ नहीं रहीं तो यह सृष्टि कैसे चलेगी। जब मन यह मानता है कि बुराईयों के बिना काम ही नहीं चलता तो भारत जो कभी दैवताओं की भूमि रहा है, जहाँ सत्य, प्रेम, अहिंसा आदि गुणों की धारणा रही है महिमा वर्णन करने से क्या लाभ होगा। उन्होंने कहा कि गृहस्थ व्यवहार में कमल फूल के समान रहना यह दैवीय प्रवृत्ति की निशानी है इसलिए उनके हर अंग जैसे मुखकमल, हस्तकमल, पदमकमल, नयनकमल इत्यादि की तुलना कमल से की गई है। शिव जयन्ति मनाते हैं जो ज्ञान के सागर हैं, पतितों को पावन बनाने वाले हैं, विश्वकल्याणकारी होने के कारण शिव हैं तो वे आकर कुछ न कुछ तो करते ही होंगे। करते भी वही हैं जैसे उनके नाम हैं। गीता में कहा गया है कि भगवान को यज्ञ, जप, तप, पूजा पाठ से प्राप्त नहीं किया जा सकता। उनको स्वयं ही निज परिचय देने के लिए इस विषय सागर में बुराईयों रूपी हलाहल विष को पीने के लिए आना पड़ता है। शिव बाबा ने कहा है कि मेरे को याद करेंगे तो मेरे पास आ जायेंगे। पुकारने, फरियाद करने, चिल्लाने की बजाए अपने शान्त स्वधर्म में स्थित होकर याद करो तो जीवन रूपी बेड़ा इस भवसागर अर्थात् दुःखों के सागर से पार हो जाये। मैं करता हूँ यह न कहकर मुख से बाबा-बाबा कहते रहो, वो ही करा रहे हैं वो ही चला रहे हैं ऐसे अभ्यास से अपना अभिमान समाप्त हो जायेगा और आत्मा स्थितप्रज्ञ बन जायेगी।
बहिन शान्ता जी ने कहा कि कर्मा से ही वर्णों का उदय हुआ है जो कर्मों में श्रेष्ठ हैं, व्यवहार में सच्चे हैं, जो पवित्र ब्रह्मचारी जीवन जीने वाले हैं, जिनके अन्दर दैवीय गुणों पवित्रता, नम्रता, सत्यता, मधुरता आदि गुणों की धारणा करने वाले हैं, जिनका अन्न प्राप्त करने के साधन पवित्र है और शुद्ध अन्न ग्रहण करते हैं, संसार विषय सागर में रहते हुए भी जिनका नियमित रूप से परमपिता सत्यम् शिवम् सुन्दरम का सतसंग है वही सच्चे ब्राह्मण हैं। केवल जटा चोटी रखने और विशेष गोत्र में जन्म लेने वाले लेकिन कर्मों में शुद्धता, पवित्रता सद्चरित्रता धारण न करने वाले ब्राह्मण नहीं। महाभारत पुराण में भी कहा गया है कि जिस व्यक्ति में चाहे वह किसी भी जाति अथवा धर्म का हो उसके अन्दर सत्य, दान , क्षमा, शील, तप आदि हो वही ब्राह्मण है।
धन्य है वह लोग जो परमात्मा की ज्ञान-मुरली, ज्ञान वीणा बने हैं। उन्हीं का जीवन सफल है, कृतार्थ है। जिस तरह से विसर्जन ही समर्पण है और समर्पण का आधार श
समर्पण का अर्थ अहं का विसर्जन है। अहं के कारण ही सर्वशक्तिमान परमात्मा से हमारा संबंध नहीं जुट पाता। अहंकार के उन्मूलन के बाद परमपिता परमात्मा की सर्वशक्तियां हममें प्रवाहित होने लगती है। गज-ग्राह युद्ध और चीरहरण इसी के प्रतीक हैं। जब तक गज अपनी शक्ति के अहंकार से भरा रहा, ग्राह उसे जल में खींचता चला गया। अंततोगत्वा जब उसका अहं टूटा और पूरे हृदय से उसने परमात्मा से प्रार्थना की तभी उसमें ईश्वरीय शक्ति प्रवाहित होने लगी और ग्राह मारा गया। इसी तरह द्रोपदी को भी जब तक अपने पतियों की शक्ति पर विश्वास था, तब तक परमात्मा की सहायता नहीं मिली, जब सब तरफ से निराश होकर परमात्मा को पुकारा तब प्रभु तुरंत उपस्थित हुए। गीता में परमात्मा का आदेश है-'मामेकं शरणं ब्रज।' लेकिन हम केवल एक परमात्मा की शक्ति का भरोसा न कर अनेक का भरोसा करते रहते है। फलस्वरूप दो नावों पर पांव रखने वालों जैसी हमारी गति हो जाती है।
समर्पित व्यक्ति शून्य होता है। उसमें कोई आशा, आकांक्षा, कामना और वासना नहीं होती, वह परमात्मा का यंत्र व उनका वाद्य बन जाता है। मुरली की तरह वह भीतर से रिक्त होता है, परमात्मा के स्वरों के लिए वह कोई अवरोध नहीं उत्पन्न करता। वह जैसा चाहे जो चाहे वैसा हो जाए तभी मुरली का गायन है। धन्य है वह लोग जो परमात्मा की ज्ञान-मुरली, ज्ञान वीणा बने हैं। उन्हीं का जीवन सफल है, कृतार्थ है। जिस तरह से विसर्जन ही समर्पण है और समर्पण का आधार श्रद्धा है। आध्यात्मिक क्षेत्र में श्रद्धा बहुत बड़ी संपत्ति है। संशयग्रस्त मनुष्य कभी भी परमात्मा को नहीं पा सकता। वर्तमान शताब्दी संशय से भरी हुई है, अत: परमात्मा से तथा आध्यात्मिकता से बहुत दूर चली गई है। भौतिक क्षेत्र में तो संशय की मनोवृत्ति से हमें अनेक उपलब्धियां हुई, लेकिन आध्यात्मिक प्रगति के लिए संशय की मनोवृत्ति बहुत अधिक खतरनाक सिद्ध हुई। आत्मानुभूति और ईश्वरानुभूति के लिए श्रद्धा की मनोवृत्ति आवश्यक है। आज के युग में श्रद्धा के पुनर्जागरण की आवश्यकता है। मनुष्य की जब तक तर्क बुद्धि शांत नहीं हो जाती तब तक श्रद्धा और समर्पण के लिए विसर्जन चाहिए अहंकार का।
समर्पित व्यक्ति शून्य होता है। उसमें कोई आशा, आकांक्षा, कामना और वासना नहीं होती, वह परमात्मा का यंत्र व उनका वाद्य बन जाता है। मुरली की तरह वह भीतर से रिक्त होता है, परमात्मा के स्वरों के लिए वह कोई अवरोध नहीं उत्पन्न करता। वह जैसा चाहे जो चाहे वैसा हो जाए तभी मुरली का गायन है। धन्य है वह लोग जो परमात्मा की ज्ञान-मुरली, ज्ञान वीणा बने हैं। उन्हीं का जीवन सफल है, कृतार्थ है। जिस तरह से विसर्जन ही समर्पण है और समर्पण का आधार श्रद्धा है। आध्यात्मिक क्षेत्र में श्रद्धा बहुत बड़ी संपत्ति है। संशयग्रस्त मनुष्य कभी भी परमात्मा को नहीं पा सकता। वर्तमान शताब्दी संशय से भरी हुई है, अत: परमात्मा से तथा आध्यात्मिकता से बहुत दूर चली गई है। भौतिक क्षेत्र में तो संशय की मनोवृत्ति से हमें अनेक उपलब्धियां हुई, लेकिन आध्यात्मिक प्रगति के लिए संशय की मनोवृत्ति बहुत अधिक खतरनाक सिद्ध हुई। आत्मानुभूति और ईश्वरानुभूति के लिए श्रद्धा की मनोवृत्ति आवश्यक है। आज के युग में श्रद्धा के पुनर्जागरण की आवश्यकता है। मनुष्य की जब तक तर्क बुद्धि शांत नहीं हो जाती तब तक श्रद्धा और समर्पण के लिए विसर्जन चाहिए अहंकार का।
घर गृहस्थ का कार्य करते समय स्मरण रहे कि सब कुछ भगवान का दिया हुआ है। व्यक्ति की जिसके साथ प्रीत होती है। उसका समय संकल्प शक्ति धन व मन वही लगता है।
प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के उप सेवा केंद्र पर मुख्यालय माउंट आबू से पधारीं राजयोगिनी मनोरमा बहन का शुभागमन हुआ। इस मौके पर स्नेह मिलन समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बोलते हुए मनोरमा बहन ने कहा कि विराट सृष्टि चक्र में सब कुछ पूर्व निश्चित है। यह निश्चितता ही निश्चिंत का आधार है। किंतु इसे अज्ञानता के बस मानव स्वीकार नहीं करता है। मानव अपनी बुद्धि तथा देह के अंहकार में परमात्मा से प्रीत नहीं कर पा रहा है। उन्होंने कहा कि परमात्मा ने प्रीत का पैमाना नहीं बनाया है। मनुष्य भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना है। कृष्ण महाभारत के युद्ध के दौरान विश्राम के क्षणों में भी विश्राम नहीं करके रथ के घोड़ों की सेवा करते रहते थे, तभी कर्मयोगी कहलाए। इसी तरह घर गृहस्थ का कार्य करते समय स्मरण रहे कि सब कुछ भगवान का दिया हुआ है। व्यक्ति की जिसके साथ प्रीत होती है। उसका समय संकल्प शक्ति धन व मन वही लगता है। इस प्रकार हम परमात्म प्रीत में स्वयं को अर्पण कर दें। कार्यक्रम का शुभारंभ ब्रह्मकुमारी प्रविणा बहन द्वारा प्रस्तुत प्रीत के गीत के साथ किया गया। भ्राता कल्याण प्रसाद द्वारा शब्दों से स्वागत किया गया। ब्रह्मकुमारी प्रीति, बबीता, प्रवीण, कमलेश एवं कनक बहन द्वारा अतिथियों का गुलाबासी तिलक पुष्प से स्वागत किया गया। कार्यक्रम में प्रो.उदय सिंह, कल्याण प्रसाद बाबूलाल उपाध्याय, दयाराम योगेंद्र मिटठ्न लाल भरतपुर के मौजी लाल, सुधीर, भ्राता सुरेश उप मन, एकाउंट अधिकारी ब्रह्मकुमार जोशी अमर सिंह व अन्य सेवा केंद्रों से आए लोग महिलाएं उपस्थित थीं।
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप एक "ज्योति बिंदु" के समान, deeye की लो जसा है वह रूप अति निर्मल ,स्वर्णमय ल
परमपिता परमात्मा का दिव्य नाम और उनकी महिमा
परमपिता परमात्मा का नाम "शिव" है "शिव" का अर्थ "कल्याणकारी" है Iपरमपिता परमात्मा शिव ही ज्ञान के सागर ,शांति के सागर, आनंद के सागर और प्रेम के सागर हैI वह ही पतितो को पावन करने वाले , मनुष्यमात्र को शांतिधाम तथा सुखधाम की रह दिखाने वाले , विकारो तथा काल के बंधन से छुड़ाने वाले और सब प्राणियों पर रहम करने वाले है Iमनुष्यमात्र को मुक्ति और जीवनमुक्ति का अथवा गति और सत्गति का वरदान देने वाले भी एकमात्र वही है वह दिव्य बुद्दि के डाटा और दिव्य दृष्टी के वरदाता भी है मनुष्यात्माओ को ज्ञान रूपी सोम अथवा अमृत पिलाने वाले तथा अमर पद का वरदान देने के कारण "सोमनाथ" तथा "अमरनाथ" इत्यादि नाम भी उन्ही के है ओः जन्म मरण से सदा मुक्त , सदा अकरस ,सदा जगती ज्योति, सदा शिव है I
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप एक "ज्योति बिंदु" के समान, deeye की लो जसा है वह रूप अति निर्मल ,स्वर्णमय लाल और मनमोहक है उस ज्योतिर्मय रूप को दिव्य-चक्षुओ द्वारा ही देखा जा सकता है और दिव्य बुद्दि द्वारा ही अनुभव किया जा सकता हैI परमपिता परमात्मा के उस "ज्योतिबिंदु" रूप की प्रतिमाये भारत में "शिवलिंग" नाम से पूजी जाती है और उनके अवतरण की याद में " महाशिवरात्रि" भी मनाई जाती है I
"निराकार" का अर्थ
लगभग सभी धर्मो के अनुयायी परमात्मा को "निराकार" मानते है परन्तु इस शब्द से वे यह अर्थ लेते है की परमात्मा का कोई आकार (रूप)नही है अब परमपिता परमात्मा शिव कहते है कि ऐसा मानना भूल है वास्तव में निराकार का अर्थ यह है कि परमपिता "साकार" नही है, अर्थात न तो उनका मनुष्यों जैसा स्थूल -शारीरिक आकार है और न देवताओ जैसा सूक्ष्म सह्रिरिक आकार है बल्कि उनका रूप अशरीरी है और ज्योति-बिंदु के समान है "बिंदु" को तो निराकार ही कहेंगे Iअत: यह एक आश्चर्यजनक बात है कि परमपिता परमात्मा है तो सुक्ष्मातिसुक्ष्म , एक ज्योति-कण है परन्तु आज लोग प्राय: कहते है कि वह कण-कण में हैI
परमपिता परमात्मा का नाम "शिव" है "शिव" का अर्थ "कल्याणकारी" है Iपरमपिता परमात्मा शिव ही ज्ञान के सागर ,शांति के सागर, आनंद के सागर और प्रेम के सागर हैI वह ही पतितो को पावन करने वाले , मनुष्यमात्र को शांतिधाम तथा सुखधाम की रह दिखाने वाले , विकारो तथा काल के बंधन से छुड़ाने वाले और सब प्राणियों पर रहम करने वाले है Iमनुष्यमात्र को मुक्ति और जीवनमुक्ति का अथवा गति और सत्गति का वरदान देने वाले भी एकमात्र वही है वह दिव्य बुद्दि के डाटा और दिव्य दृष्टी के वरदाता भी है मनुष्यात्माओ को ज्ञान रूपी सोम अथवा अमृत पिलाने वाले तथा अमर पद का वरदान देने के कारण "सोमनाथ" तथा "अमरनाथ" इत्यादि नाम भी उन्ही के है ओः जन्म मरण से सदा मुक्त , सदा अकरस ,सदा जगती ज्योति, सदा शिव है I
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप एक "ज्योति बिंदु" के समान, deeye की लो जसा है वह रूप अति निर्मल ,स्वर्णमय लाल और मनमोहक है उस ज्योतिर्मय रूप को दिव्य-चक्षुओ द्वारा ही देखा जा सकता है और दिव्य बुद्दि द्वारा ही अनुभव किया जा सकता हैI परमपिता परमात्मा के उस "ज्योतिबिंदु" रूप की प्रतिमाये भारत में "शिवलिंग" नाम से पूजी जाती है और उनके अवतरण की याद में " महाशिवरात्रि" भी मनाई जाती है I
"निराकार" का अर्थ
लगभग सभी धर्मो के अनुयायी परमात्मा को "निराकार" मानते है परन्तु इस शब्द से वे यह अर्थ लेते है की परमात्मा का कोई आकार (रूप)नही है अब परमपिता परमात्मा शिव कहते है कि ऐसा मानना भूल है वास्तव में निराकार का अर्थ यह है कि परमपिता "साकार" नही है, अर्थात न तो उनका मनुष्यों जैसा स्थूल -शारीरिक आकार है और न देवताओ जैसा सूक्ष्म सह्रिरिक आकार है बल्कि उनका रूप अशरीरी है और ज्योति-बिंदु के समान है "बिंदु" को तो निराकार ही कहेंगे Iअत: यह एक आश्चर्यजनक बात है कि परमपिता परमात्मा है तो सुक्ष्मातिसुक्ष्म , एक ज्योति-कण है परन्तु आज लोग प्राय: कहते है कि वह कण-कण में हैI
परमपिता परमात्मा का नाम "शिव" है "शिव" का अर्थ "कल्याणकारी" है Iपरमपिता परमात्मा शिव ही ज्ञान के सागर ,शांति के सागर, आनंद के सागर और प्रेम के सागर ह
एक आश्चर्यजनक बात
प्राय: सभी मनुष्य परमात्मा को "हे पिता " " हे दु:खहर्ता और सुखकर्ता प्रभु " इत्यादी सम्बन्ध सूचक शब्दों से याद करते है I परन्तु यह कितने आश्चर्य की बात है की जिसे वे "पिता" कहकर बुलाते है उसका सत्य और स्पष्ट परिचय उन्हें नही है और उसके साथ उनका अच्छी रीती स्नेह ओउए सम्बन्ध भी नही है परिचय और स्नेह न होने के कारण परमात्मा को याद करते समय भी उनका मन एक ठिकाने पर नही टिकता इसलिए , उन्हें परमपिता परमात्मा से शांति तथा सुख का जो जन्म सिद्ध अधिकार प्राप्त होना चाहिए वह प्राप्त नही होता वे न तो परमपिता परमात्मा के मधुर मिलन का सच्चा सुख अनुभव कर सकते है , न उससे लाइट (प्रकाश) और माईट (शक्ति) ही प्राप्त कर सकते हे और न ही उनके संस्कारो तथा जीवन में कोई विशेष परिवर्तन ही आ पाता है I इसीलिए हम यहाँ उस परम प्यारे परमपिता परमात्मा का सक्षिप्त परिचय दे रहे है जो की स्वयं उन्होंने ही लोक-कल्याणार्थ हेम समझाया है और अनुभव कराया है I
परमपिता परमात्मा का दिव्य नाम और उनकी महिमा
परमपिता परमात्मा का नाम "शिव" है "शिव" का अर्थ "कल्याणकारी" है Iपरमपिता परमात्मा शिव ही ज्ञान के सागर ,शांति के सागर, आनंद के सागर और प्रेम के सागर हैI वह ही पतितो को पावन करने वाले , मनुष्यमात्र को शांतिधाम तथा सुखधाम की रह दिखाने वाले , विकारो तथा काल के बंधन से छुड़ाने वाले और सब प्राणियों पर रहम करने वाले है Iमनुष्यमात्र को मुक्ति और जीवनमुक्ति का अथवा गति और सत्गति का वरदान देने वाले भी एकमात्र वही है वह दिव्य बुद्दि के डाटा और दिव्य दृष्टी के वरदाता भी है मनुष्यात्माओ को ज्ञान रूपी सोम अथवा अमृत पिलाने वाले तथा अमर पद का वरदान देने के कारण "सोमनाथ" तथा "अमरनाथ" इत्यादि नाम भी उन्ही के है ओः जन्म मरण से सदा मुक्त , सदा अकरस ,सदा जगती ज्योति, सदा शिव है I
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप एक "ज्योति बिंदु" के समान, deeye की लो जसा है वह रूप अति निर्मल ,स्वर्णमय लाल और मनमोहक है उस ज्योतिर्मय रूप को दिव्य-चक्षुओ द्वारा ही देखा जा सकता है और दिव्य बुद्दि द्वारा ही अनुभव किया जा सकता हैI परमपिता परमात्मा के उस "ज्योतिबिंदु" रूप की प्रतिमाये भारत में "शिवलिंग" नाम से पूजी जाती है और उनके अवतरण की याद में " महाशिवरात्रि" भी मनाई जाती है I
"निराकार" का अर्थ
लगभग सभी धर्मो के अनुयायी परमात्मा को "निराकार" मानते है परन्तु इस शब्द से वे यह अर्थ लेते है की परमात्मा का कोई आकार (रूप)नही है अब परमपिता परमात्मा शिव कहते है कि ऐसा मानना भूल है वास्तव में निराकार का अर्थ यह है कि परमपिता "साकार" नही है, अर्थात न तो उनका मनुष्यों जैसा स्थूल -शारीरिक आकार है और न देवताओ जैसा सूक्ष्म सह्रिरिक आकार है बल्कि उनका रूप अशरीरी है और ज्योति-बिंदु के समान है "बिंदु" को तो निराकार ही कहेंगे Iअत: यह एक आश्चर्यजनक बात है कि परमपिता परमात्मा है तो सुक्ष्मातिसुक्ष्म , एक ज्योति-कण है परन्तु आज लोग प्राय: कहते है कि वह कण-कण में हैI
प्राय: सभी मनुष्य परमात्मा को "हे पिता " " हे दु:खहर्ता और सुखकर्ता प्रभु " इत्यादी सम्बन्ध सूचक शब्दों से याद करते है I परन्तु यह कितने आश्चर्य की बात है की जिसे वे "पिता" कहकर बुलाते है उसका सत्य और स्पष्ट परिचय उन्हें नही है और उसके साथ उनका अच्छी रीती स्नेह ओउए सम्बन्ध भी नही है परिचय और स्नेह न होने के कारण परमात्मा को याद करते समय भी उनका मन एक ठिकाने पर नही टिकता इसलिए , उन्हें परमपिता परमात्मा से शांति तथा सुख का जो जन्म सिद्ध अधिकार प्राप्त होना चाहिए वह प्राप्त नही होता वे न तो परमपिता परमात्मा के मधुर मिलन का सच्चा सुख अनुभव कर सकते है , न उससे लाइट (प्रकाश) और माईट (शक्ति) ही प्राप्त कर सकते हे और न ही उनके संस्कारो तथा जीवन में कोई विशेष परिवर्तन ही आ पाता है I इसीलिए हम यहाँ उस परम प्यारे परमपिता परमात्मा का सक्षिप्त परिचय दे रहे है जो की स्वयं उन्होंने ही लोक-कल्याणार्थ हेम समझाया है और अनुभव कराया है I
परमपिता परमात्मा का दिव्य नाम और उनकी महिमा
परमपिता परमात्मा का नाम "शिव" है "शिव" का अर्थ "कल्याणकारी" है Iपरमपिता परमात्मा शिव ही ज्ञान के सागर ,शांति के सागर, आनंद के सागर और प्रेम के सागर हैI वह ही पतितो को पावन करने वाले , मनुष्यमात्र को शांतिधाम तथा सुखधाम की रह दिखाने वाले , विकारो तथा काल के बंधन से छुड़ाने वाले और सब प्राणियों पर रहम करने वाले है Iमनुष्यमात्र को मुक्ति और जीवनमुक्ति का अथवा गति और सत्गति का वरदान देने वाले भी एकमात्र वही है वह दिव्य बुद्दि के डाटा और दिव्य दृष्टी के वरदाता भी है मनुष्यात्माओ को ज्ञान रूपी सोम अथवा अमृत पिलाने वाले तथा अमर पद का वरदान देने के कारण "सोमनाथ" तथा "अमरनाथ" इत्यादि नाम भी उन्ही के है ओः जन्म मरण से सदा मुक्त , सदा अकरस ,सदा जगती ज्योति, सदा शिव है I
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप एक "ज्योति बिंदु" के समान, deeye की लो जसा है वह रूप अति निर्मल ,स्वर्णमय लाल और मनमोहक है उस ज्योतिर्मय रूप को दिव्य-चक्षुओ द्वारा ही देखा जा सकता है और दिव्य बुद्दि द्वारा ही अनुभव किया जा सकता हैI परमपिता परमात्मा के उस "ज्योतिबिंदु" रूप की प्रतिमाये भारत में "शिवलिंग" नाम से पूजी जाती है और उनके अवतरण की याद में " महाशिवरात्रि" भी मनाई जाती है I
"निराकार" का अर्थ
लगभग सभी धर्मो के अनुयायी परमात्मा को "निराकार" मानते है परन्तु इस शब्द से वे यह अर्थ लेते है की परमात्मा का कोई आकार (रूप)नही है अब परमपिता परमात्मा शिव कहते है कि ऐसा मानना भूल है वास्तव में निराकार का अर्थ यह है कि परमपिता "साकार" नही है, अर्थात न तो उनका मनुष्यों जैसा स्थूल -शारीरिक आकार है और न देवताओ जैसा सूक्ष्म सह्रिरिक आकार है बल्कि उनका रूप अशरीरी है और ज्योति-बिंदु के समान है "बिंदु" को तो निराकार ही कहेंगे Iअत: यह एक आश्चर्यजनक बात है कि परमपिता परमात्मा है तो सुक्ष्मातिसुक्ष्म , एक ज्योति-कण है परन्तु आज लोग प्राय: कहते है कि वह कण-कण में हैI
तीन लोक कौन से है और शिव का धाम कौनसा है ?
तीन लोक कौन से है
और
शिव का धाम कौनसा है ?
मनुष्यात्माये मुक्ति अथवा पूर्ण शांति की शुभ इच्छा तो करती है परन्तु उन्हें यह मालूम नही है की मुक्तिधाम अथवा शांतिधाम है कहाँ ? इसी प्रकार , परम प्रिय परमात्मा शिव से मनुष्यात्माये मिलना तो चाहती है और उसे याद भी करती है परन्तु उन्हें यह मालूम नही है कि वह पवित्र धाम कहाँ है जहा से आकर परमपिता शिव इसी सृष्टि पर अवतरित होते है ? यह कितने अश्च्चार्य की बात है की जहाँ से हम सभी मनुष्यात्माये सृष्टि रूपी रंगमंच पर आयी है, उस प्यारे देश को सभी भूल गयी है और वापिस भी नही जा सकती I
१. साकार मनुष्य लोक -सामने चित्र में दिखाया गया है कि एक है यह साकार मनुष्य लोक जिसमे इस समय हम है ईसमे सभी आत्माए हड्डी-मांसादी का स्थूल शरीर लेकर कर्म करती है और उसका फल सुख दुःख के रूप में भोगती है तथा जन्म-मरण के चक्कर में भी आती है I इस लोक में संकल्प , ध्वनि और कर्म तीनो है I इसे ही " पञ्च तत्वों कि सृष्टि अथवा "कर्म- क्षेत्र "भी कहते है इ यह सृष्टि आकाश तत्व के अंश मात्र में है इ इसे सामने त्रिलोक के चित्र में दिखाया गया है क्योंकि इसके बीज रूप परमात्मा शिव , जो कि जन्म -मरण से न्यारे है , ऊपर रहते है I
२. सूक्ष्म देवताओ का लोक -इस मनुष्य लोक के सूर्य तथा तारागण के पार तथा आकाश तत्व के भी पार एक सूक्ष्म लोक है जहा प्रकाश ही प्रकाश है उस प्रकाश के अंश-मात्र में ब्रह्मा , विष्णु तथा महादेव शंकर की अलग अलग पुरिया है इन देवताओं के शरीर हड्डी-मांसादी के नहीं बल्कि प्रकाश के है इन्हें दिव्य चक्षुओ के द्वारा ही देखा जा सकता है यहाँ दुःख अथवा अशांति नही होती यहाँ संकल्प तो होते है और क्रियाए भी होती है और बातचीत भी होती है परन्तु आवाज नही होती I
३. ब्रह्मलोक और परलोक - इन पुरियो के भी पार एक और लोक है जिसे ब्रह्मलोक , परलोक , मुक्तिधाम , शांतिधाम , शिवलोक इत्यादी नामो से यद् किया जाता है इसमे सुनहरे लाल रंग का प्रकाश फैला हुआ है जिसे ही ब्रह्म-तत्व , छठा तत्व अथवा महातत्व कहा जा सकता है इसके अंशमात्र ही में ज्योतिर्बिंदु आत्माये मुक्ति की अवस्था में रहती है यहाँ हरेक धर्म की आत्माओ के संस्थान है I
उन सभी के ऊपर , सदा मुक्त ,चेतन्य , ज्योतिबिंदु रूप परमात्मा "सदाशिव " का निवास स्थान है इस लोक में मनुष्यात्मा कल्प के अंत में , सृष्टि का महाविनाश होने के बाद अपने-अपने कर्मो का फल भोग कर तथा पवित्र होकर ही जाती हैI यहाँ मनुष्यात्मा देह बंधन ,कर्म-बंधन तथा जन्म मरण से रहित होती है यहाँ न संकल्प है , न वचन और न कर्म इ इस लोक में परमपिता परमात्मा शिव के सिवाय अन्य कोई "गुरु " इत्यादी नही ले जा सकता इस लोक में जाना ही अमरनाथ ,रामेश्वरम अथवा विश्वेश्वर नाथ की सच्ची यात्रा करना है, क्योंकि अमरनाथ परमपिता शिव यही रहते है I
और
शिव का धाम कौनसा है ?
मनुष्यात्माये मुक्ति अथवा पूर्ण शांति की शुभ इच्छा तो करती है परन्तु उन्हें यह मालूम नही है की मुक्तिधाम अथवा शांतिधाम है कहाँ ? इसी प्रकार , परम प्रिय परमात्मा शिव से मनुष्यात्माये मिलना तो चाहती है और उसे याद भी करती है परन्तु उन्हें यह मालूम नही है कि वह पवित्र धाम कहाँ है जहा से आकर परमपिता शिव इसी सृष्टि पर अवतरित होते है ? यह कितने अश्च्चार्य की बात है की जहाँ से हम सभी मनुष्यात्माये सृष्टि रूपी रंगमंच पर आयी है, उस प्यारे देश को सभी भूल गयी है और वापिस भी नही जा सकती I
१. साकार मनुष्य लोक -सामने चित्र में दिखाया गया है कि एक है यह साकार मनुष्य लोक जिसमे इस समय हम है ईसमे सभी आत्माए हड्डी-मांसादी का स्थूल शरीर लेकर कर्म करती है और उसका फल सुख दुःख के रूप में भोगती है तथा जन्म-मरण के चक्कर में भी आती है I इस लोक में संकल्प , ध्वनि और कर्म तीनो है I इसे ही " पञ्च तत्वों कि सृष्टि अथवा "कर्म- क्षेत्र "भी कहते है इ यह सृष्टि आकाश तत्व के अंश मात्र में है इ इसे सामने त्रिलोक के चित्र में दिखाया गया है क्योंकि इसके बीज रूप परमात्मा शिव , जो कि जन्म -मरण से न्यारे है , ऊपर रहते है I
२. सूक्ष्म देवताओ का लोक -इस मनुष्य लोक के सूर्य तथा तारागण के पार तथा आकाश तत्व के भी पार एक सूक्ष्म लोक है जहा प्रकाश ही प्रकाश है उस प्रकाश के अंश-मात्र में ब्रह्मा , विष्णु तथा महादेव शंकर की अलग अलग पुरिया है इन देवताओं के शरीर हड्डी-मांसादी के नहीं बल्कि प्रकाश के है इन्हें दिव्य चक्षुओ के द्वारा ही देखा जा सकता है यहाँ दुःख अथवा अशांति नही होती यहाँ संकल्प तो होते है और क्रियाए भी होती है और बातचीत भी होती है परन्तु आवाज नही होती I
३. ब्रह्मलोक और परलोक - इन पुरियो के भी पार एक और लोक है जिसे ब्रह्मलोक , परलोक , मुक्तिधाम , शांतिधाम , शिवलोक इत्यादी नामो से यद् किया जाता है इसमे सुनहरे लाल रंग का प्रकाश फैला हुआ है जिसे ही ब्रह्म-तत्व , छठा तत्व अथवा महातत्व कहा जा सकता है इसके अंशमात्र ही में ज्योतिर्बिंदु आत्माये मुक्ति की अवस्था में रहती है यहाँ हरेक धर्म की आत्माओ के संस्थान है I
उन सभी के ऊपर , सदा मुक्त ,चेतन्य , ज्योतिबिंदु रूप परमात्मा "सदाशिव " का निवास स्थान है इस लोक में मनुष्यात्मा कल्प के अंत में , सृष्टि का महाविनाश होने के बाद अपने-अपने कर्मो का फल भोग कर तथा पवित्र होकर ही जाती हैI यहाँ मनुष्यात्मा देह बंधन ,कर्म-बंधन तथा जन्म मरण से रहित होती है यहाँ न संकल्प है , न वचन और न कर्म इ इस लोक में परमपिता परमात्मा शिव के सिवाय अन्य कोई "गुरु " इत्यादी नही ले जा सकता इस लोक में जाना ही अमरनाथ ,रामेश्वरम अथवा विश्वेश्वर नाथ की सच्ची यात्रा करना है, क्योंकि अमरनाथ परमपिता शिव यही रहते है I
Friday, October 28, 2011
भगवान दगडू चवरे मुकाम तलेवाडी तालुका आटपाडी जिला सांगली
भगवान दगडू चवरे मुकाम तलेवाडी तालुका आटपाडी जिला सांगली
नैतिक शिक्षा --राजयोगी भगवानभाई
सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले
बीके भगवान 1987 से भारत के विभिन्न प्रांतों में जाकर हजारों स्कूली बच्चों व जेलों में बंद कैदियों में मानवता का बीज बोते रहे। मिडिल व हाईस्कूलों के अलावा कॉलेज, आईटीआई सहित कई संस्थाओं में उनके आह्वान पर युवा अध्यात्म की राह पर चल पड़े हैं। अपने मिशन को सफलता दिलाने के लिए उन्होंने पदयात्रा, मोटरसाइकिल व साइकिल यात्रा सहित शिक्षा अभियान, ग्राम विकास अभियान कार्यक्रम संचालित किए। बीके भगवान भाई के अनुसार अगर समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, कुरीतियां, बुराइयां, व्यसन,नशा को समाप्त करना है तो स्कूलों में शिक्षा में परिवर्तन करने होंगे।
भगवान भाई ने अपने जीवन के रहस्य खोलते हुए कहा कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, जिसके चलते 11 साल की उम्र तक वे स्कूल नहीं गए। पढऩे की ललक होने के कारण गांव के स्कूल पहुंचे तो उन्हें टीचर्स ने कक्षा 5वीं में बैठाया। उन्होंने 5वीं से ही पढऩा शुरू किया। दुकानदार से पुरानी लिखी डायरियां लाकर पानी से साफ कर वे फिर इसका इस्तेमाल करते थे, ऐसे में एक दिन ब्रह्माकुमारी संस्था की डायरी हाथ लगी, जिससे पढ़कर वे काफी प्रभावित हुए। मुसाफिरों को पानी बेचकर 10 रुपए कमाए और माउंटआबू संस्था को भेजकर राजयोग की जानकारी मंगाई। पढऩे के बाद से जीवन में बदलाव आ गया और वे पूरी तरह संस्था के लिए समर्पित हो गए। ३००० से अधिक विषयों पर वे लेख लिख चुके हैं, जो हिंदी ज्ञानामृत, अंग्रेजी-द वल्र्ड रिनिवल, मराठी-अमृत कुंभ, उडिय़ा-ज्ञानदर्पण में छपते रहते हैं। इसके साथ ही वीडियो क्लासेस, ब्लॉग्स द्वारा ईश्वरीय संदेश देते हैं।
नैतिक शिक्षा से बनेगा सौहार्दपूर्ण समाज
कटनी। आज हम विकसित देशों की श्रेणी में खड़े होने का भरपूर प्रयास कर रहे है। इसके साथ सफलता भी मिल रही है। परंतु समाज में फैल रही दुर्भावना और हिंसा चिंता का सबब बनती जा रही है। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्तिगत स्तर पर सकारात्मक आंतरिक चेतना के विकास को महत्व दिया जाए। उक्त उद्गार प्रजापति ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के पूरे भारत में 5 हजार स्कूल में नैतिक शिक्षा का अलख जगाकर इंडिया बुक आॅफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाले राजयोगी डायमंड इंग्लिश उच्च माध्यमिक विद्यालय माधव नगर के विद्यार्थियों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व विषय पर संबोधित करते हुए राजयोगी भगवानभाई ने कहा कि आज समाज, देश व विश्व की क्या स्थिति है इसके बारे में हम अच्छी तरह जानते है कि केवल भौतिक विकास से ही हमारा सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता। नैतिक विकास से समाज और परिवार में मूल्य विकसित होते है। इससे ही पारिवारिक सामाजिक और वैश्विक स्तर पर संपूर्ण रूप से विकसित हो सकेंगे। उन्होंने आगे बताया कि आज जितना हम विकास पर ध्यान रखेंगे अपने आंतरिक शक्तियों को जागृत करेंगे उतना युवाओं सशक्तिकरण आएगा। युवाओं को अपने शक्तियां रचनात्मक कार्य में लगाये। उन्होंने कहा कि यदि अपराधमुक्त समाज चाहित तो मानवीय, नैतिक शिक्षा द्वारा संस्कारित युवाओं की निर्मित करे। इसके लिए युवाओं को आगे आना चाहिए। उन्होंने युवाओं को आंतरिक रूप से सशक्त होकर लोगों की सेवा करने के लिए आगे जाने का आव्हान किया।
पोसted by BK BHAGWAN BRAHMAKUMARIS MOUNT आबू ARTIKAL at 3:54 AM 0 comments
लैबels: प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय bk bhagwan बीrahma kumari
आटपाडी सांगली चे ब्रह्माकुमार भगवान भाई चे नाव इंडिया बुक ऑफ़ रेकॉर्ड्स मधे नोंद
आटपाडी सांगली चे ब्रह्माकुमार भगवान भाई चे नाव इंडिया बुक ऑफ़ रेकॉर्ड्स मधे नोंद
नैतिक शिक्षा से बनेगा सौहार्दपूर्ण समाज
कटनी। आज हम विकसित देशों की श्रेणी में खड़े होने का भरपूर प्रयास कर रहे है। इसके साथ सफलता भी मिल रही है। परंतु समाज में फैल रही दुर्भावना और हिंसा चिंता का सबब बनती जा रही है। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्तिगत स्तर पर सकारात्मक आंतरिक चेतना के विकास को महत्व दिया जाए। उक्त उद्गार प्रजापति ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के पूरे भारत में 5 हजार स्कूल में नैतिक शिक्षा का अलख जगाकर इंडिया बुक आॅफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाले राजयोगी डायमंड इंग्लिश उच्च माध्यमिक विद्यालय माधव नगर के विद्यार्थियों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व विषय पर संबोधित करते हुए राजयोगी भगवानभाई ने कहा कि आज समाज, देश व विश्व की क्या स्थिति है इसके बारे में हम अच्छी तरह जानते है कि केवल भौतिक विकास से ही हमारा सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता। नैतिक विकास से समाज और परिवार में मूल्य विकसित होते है। इससे ही पारिवारिक सामाजिक और वैश्विक स्तर पर संपूर्ण रूप से विकसित हो सकेंगे। उन्होंने आगे बताया कि आज जितना हम विकास पर ध्यान रखेंगे अपने आंतरिक शक्तियों को जागृत करेंगे उतना युवाओं सशक्तिकरण आएगा। युवाओं को अपने शक्तियां रचनात्मक कार्य में लगाये। उन्होंने कहा कि यदि अपराधमुक्त समाज चाहित तो मानवीय, नैतिक शिक्षा द्वारा संस्कारित युवाओं की निर्मित करे। इसके लिए युवाओं को आगे आना चाहिए। उन्होंने युवाओं को आंतरिक रूप से सशक्त होकर लोगों की सेवा करने के लिए आगे जाने का आव्हान किया।
भगवान दगडू चवरे मुकाम तलेवाडी तालुका आटपाडी जिला सांगली
नैतिक शिक्षा --राजयोगी भगवानभाई
सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले
बीके भगवान 1987 से भारत के विभिन्न प्रांतों में जाकर हजारों स्कूली बच्चों व जेलों में बंद कैदियों में मानवता का बीज बोते रहे। मिडिल व हाईस्कूलों के अलावा कॉलेज, आईटीआई सहित कई संस्थाओं में उनके आह्वान पर युवा अध्यात्म की राह पर चल पड़े हैं। अपने मिशन को सफलता दिलाने के लिए उन्होंने पदयात्रा, मोटरसाइकिल व साइकिल यात्रा सहित शिक्षा अभियान, ग्राम विकास अभियान कार्यक्रम संचालित किए। बीके भगवान भाई के अनुसार अगर समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, कुरीतियां, बुराइयां, व्यसन,नशा को समाप्त करना है तो स्कूलों में शिक्षा में परिवर्तन करने होंगे।
भगवान भाई ने अपने जीवन के रहस्य खोलते हुए कहा कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, जिसके चलते 11 साल की उम्र तक वे स्कूल नहीं गए। पढऩे की ललक होने के कारण गांव के स्कूल पहुंचे तो उन्हें टीचर्स ने कक्षा 5वीं में बैठाया। उन्होंने 5वीं से ही पढऩा शुरू किया। दुकानदार से पुरानी लिखी डायरियां लाकर पानी से साफ कर वे फिर इसका इस्तेमाल करते थे, ऐसे में एक दिन ब्रह्माकुमारी संस्था की डायरी हाथ लगी, जिससे पढ़कर वे काफी प्रभावित हुए। मुसाफिरों को पानी बेचकर 10 रुपए कमाए और माउंटआबू संस्था को भेजकर राजयोग की जानकारी मंगाई। पढऩे के बाद से जीवन में बदलाव आ गया और वे पूरी तरह संस्था के लिए समर्पित हो गए। ३००० से अधिक विषयों पर वे लेख लिख चुके हैं, जो हिंदी ज्ञानामृत, अंग्रेजी-द वल्र्ड रिनिवल, मराठी-अमृत कुंभ, उडिय़ा-ज्ञानदर्पण में छपते रहते हैं। इसके साथ ही वीडियो क्लासेस, ब्लॉग्स द्वारा ईश्वरीय संदेश देते हैं।
नैतिक शिक्षा से बनेगा सौहार्दपूर्ण समाज
कटनी। आज हम विकसित देशों की श्रेणी में खड़े होने का भरपूर प्रयास कर रहे है। इसके साथ सफलता भी मिल रही है। परंतु समाज में फैल रही दुर्भावना और हिंसा चिंता का सबब बनती जा रही है। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्तिगत स्तर पर सकारात्मक आंतरिक चेतना के विकास को महत्व दिया जाए। उक्त उद्गार प्रजापति ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के पूरे भारत में 5 हजार स्कूल में नैतिक शिक्षा का अलख जगाकर इंडिया बुक आॅफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाले राजयोगी डायमंड इंग्लिश उच्च माध्यमिक विद्यालय माधव नगर के विद्यार्थियों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व विषय पर संबोधित करते हुए राजयोगी भगवानभाई ने कहा कि आज समाज, देश व विश्व की क्या स्थिति है इसके बारे में हम अच्छी तरह जानते है कि केवल भौतिक विकास से ही हमारा सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता। नैतिक विकास से समाज और परिवार में मूल्य विकसित होते है। इससे ही पारिवारिक सामाजिक और वैश्विक स्तर पर संपूर्ण रूप से विकसित हो सकेंगे। उन्होंने आगे बताया कि आज जितना हम विकास पर ध्यान रखेंगे अपने आंतरिक शक्तियों को जागृत करेंगे उतना युवाओं सशक्तिकरण आएगा। युवाओं को अपने शक्तियां रचनात्मक कार्य में लगाये। उन्होंने कहा कि यदि अपराधमुक्त समाज चाहित तो मानवीय, नैतिक शिक्षा द्वारा संस्कारित युवाओं की निर्मित करे। इसके लिए युवाओं को आगे आना चाहिए। उन्होंने युवाओं को आंतरिक रूप से सशक्त होकर लोगों की सेवा करने के लिए आगे जाने का आव्हान किया।
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लैबels: प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय bk bhagwan बीrahma kumari
आटपाडी सांगली चे ब्रह्माकुमार भगवान भाई चे नाव इंडिया बुक ऑफ़ रेकॉर्ड्स मधे नोंद
आटपाडी सांगली चे ब्रह्माकुमार भगवान भाई चे नाव इंडिया बुक ऑफ़ रेकॉर्ड्स मधे नोंद
नैतिक शिक्षा से बनेगा सौहार्दपूर्ण समाज
कटनी। आज हम विकसित देशों की श्रेणी में खड़े होने का भरपूर प्रयास कर रहे है। इसके साथ सफलता भी मिल रही है। परंतु समाज में फैल रही दुर्भावना और हिंसा चिंता का सबब बनती जा रही है। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्तिगत स्तर पर सकारात्मक आंतरिक चेतना के विकास को महत्व दिया जाए। उक्त उद्गार प्रजापति ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के पूरे भारत में 5 हजार स्कूल में नैतिक शिक्षा का अलख जगाकर इंडिया बुक आॅफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाले राजयोगी डायमंड इंग्लिश उच्च माध्यमिक विद्यालय माधव नगर के विद्यार्थियों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व विषय पर संबोधित करते हुए राजयोगी भगवानभाई ने कहा कि आज समाज, देश व विश्व की क्या स्थिति है इसके बारे में हम अच्छी तरह जानते है कि केवल भौतिक विकास से ही हमारा सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता। नैतिक विकास से समाज और परिवार में मूल्य विकसित होते है। इससे ही पारिवारिक सामाजिक और वैश्विक स्तर पर संपूर्ण रूप से विकसित हो सकेंगे। उन्होंने आगे बताया कि आज जितना हम विकास पर ध्यान रखेंगे अपने आंतरिक शक्तियों को जागृत करेंगे उतना युवाओं सशक्तिकरण आएगा। युवाओं को अपने शक्तियां रचनात्मक कार्य में लगाये। उन्होंने कहा कि यदि अपराधमुक्त समाज चाहित तो मानवीय, नैतिक शिक्षा द्वारा संस्कारित युवाओं की निर्मित करे। इसके लिए युवाओं को आगे आना चाहिए। उन्होंने युवाओं को आंतरिक रूप से सशक्त होकर लोगों की सेवा करने के लिए आगे जाने का आव्हान किया।
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेस
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत.
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत.
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
जीवन में सदा स्वस्थ, संपत्तिवान व खुश रहने के लिए आंतरिक शक्ति व स्थिरता की आवश्यकता है। राजयोग के नियमित अभ्यास से मन की स्थिरता प्राप्त होना संभव है
उत्थान का दिया संदेश
खरगोन। जीवन में सदा स्वस्थ, संपत्तिवान व खुश रहने के लिए आंतरिक शक्ति व स्थिरता की आवश्यकता है। राजयोग के नियमित अभ्यास से मन की स्थिरता प्राप्त होना संभव है।
उक्त विचार प्रजापति ब्रम्हकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से पधारे राजयोगी भगवानभाई ने राजयोग का जीवन में महत्व विष्ाय पर संबोधित करते हुए व्यक्त किए। भगवान भाई ने सोमवार सुबह स्थानीय केंद्र के सदस्यों को प्रवचन दिए। इसके पश्चात उन्होंने जेल पहुंचकर कैदियों के बीच अपनी बात रखी। यहां उन्होंने कर्म की प्रधानता पर अपना उद्बोधन दिया। भगवानभाई मंगलवार सुबह केंद्र पर सदस्यों को प्रवचन देने के बाद दोपहर बोरांवा स्थित इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों को संबोधित करेंगे। केंद्र के सदस्य प्रभाकर कुलकर्णी ने बताया राजयोगी भगवानभाई विवि के सभी आश्रमों नैतिक मूल्यों के उत्थान के लिए प्रवचन देते हैं। साथ ही जेल, विद्यालय, महाविद्यालय में भी अपने विचारों को प्रबुद्धजनों के बीच रखते हैं।
दिया कर्म संदेश
राजयोगी भगवानभाई दोपहर जेल में पहुंचे, जहां उन्होंने कैदियों को कर्म की प्रधानता पर उद्बोधित किया। उन्होंने कर्म की महत्ता बताते हुए कहा कर्म से ही व्यक्ति जीवन में श्रेष्ठ और भ्रष्ट होता है। कलियुग में कर्म की प्रधानता है, इसलिए कर्मो के माध्यम से अपने जीवन को सुखी और खुशहाल बनाए।
नैतिक गुणों का उत्थान
संस्कारों में परिवर्तन और निरंतर नैतिक मूल्य के ह्रास पर राजयोगी ने काम, क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार इन विकारों पर राजयोग से विजय पाने के सूत्र बताए। उन्होंने व्यक्ति के सुखमय और खुशहाल जीवन के लिए नैतिक मूल्यों व गुणों के उत्थान पर जोर दिया।
खरगोन। जीवन में सदा स्वस्थ, संपत्तिवान व खुश रहने के लिए आंतरिक शक्ति व स्थिरता की आवश्यकता है। राजयोग के नियमित अभ्यास से मन की स्थिरता प्राप्त होना संभव है।
उक्त विचार प्रजापति ब्रम्हकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से पधारे राजयोगी भगवानभाई ने राजयोग का जीवन में महत्व विष्ाय पर संबोधित करते हुए व्यक्त किए। भगवान भाई ने सोमवार सुबह स्थानीय केंद्र के सदस्यों को प्रवचन दिए। इसके पश्चात उन्होंने जेल पहुंचकर कैदियों के बीच अपनी बात रखी। यहां उन्होंने कर्म की प्रधानता पर अपना उद्बोधन दिया। भगवानभाई मंगलवार सुबह केंद्र पर सदस्यों को प्रवचन देने के बाद दोपहर बोरांवा स्थित इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों को संबोधित करेंगे। केंद्र के सदस्य प्रभाकर कुलकर्णी ने बताया राजयोगी भगवानभाई विवि के सभी आश्रमों नैतिक मूल्यों के उत्थान के लिए प्रवचन देते हैं। साथ ही जेल, विद्यालय, महाविद्यालय में भी अपने विचारों को प्रबुद्धजनों के बीच रखते हैं।
दिया कर्म संदेश
राजयोगी भगवानभाई दोपहर जेल में पहुंचे, जहां उन्होंने कैदियों को कर्म की प्रधानता पर उद्बोधित किया। उन्होंने कर्म की महत्ता बताते हुए कहा कर्म से ही व्यक्ति जीवन में श्रेष्ठ और भ्रष्ट होता है। कलियुग में कर्म की प्रधानता है, इसलिए कर्मो के माध्यम से अपने जीवन को सुखी और खुशहाल बनाए।
नैतिक गुणों का उत्थान
संस्कारों में परिवर्तन और निरंतर नैतिक मूल्य के ह्रास पर राजयोगी ने काम, क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार इन विकारों पर राजयोग से विजय पाने के सूत्र बताए। उन्होंने व्यक्ति के सुखमय और खुशहाल जीवन के लिए नैतिक मूल्यों व गुणों के उत्थान पर जोर दिया।
नकारात्मकता को पहचाने बिना उसे सकारात्मकता में नही बदला जा सकता है। नकारात्मकता क्या है
ब्रह्माकुमारीज ब्रह्माकुमार भगवान भाई ने बताया कि शुभकामना का विचार हमारे जीवन में सुखमय प्रकाश लाता है। वह मानसिक सकारात्मक ऊर्जा पैदा करता है जो हमारे आंतरिक गुणों व व्यक्तित्व का विकास करता है। हमारी शुभ भावनाएं दूसरों के लिए जीवनदान दे सकती हैं।
े राजकीय बालिका इण्टर कालेज में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय हरपुर द्वारा मन को सकारात्मक विचारों से समर्थ बनाने व दुआओं के सहयोग से दूसरों का सहयोगी बनने संबंधी कार्यक्रम को संबोधित कर ीं। कार्यक्रम की शुरुआत ईश्वर की प्रार्थना से की गयी।
नकारात्मकता को पहचाने बिना उसे सकारात्मकता में नही बदला जा सकता है। नकारात्मकता क्या है ? इसे समझने हम अपने महाकाव्यों में झांकते हैं। रामायण के युद्ध के पीछे क्या कारण है ? लक्ष्मण भैया द्वारा शूर्पनखा की नाक काटना है। नाक काटना अर्थात किसी प्रकार की शारीरिक हिंसा सकारात्मक नहीं हो सकती। सारा जगत रावण को दोष देता है लेकिन लक्ष्मण की नकारात्मकता को हम नहीं देख पाते हैं। आपको अगर कोई महिला शादी का प्रस्ताव रखे या प्रेम का स्वांग रचे तो क्या आप उसकी नाक काट देंगे ?
इसी तरह महाभारत के मूल में भी नकारात्मकता ही है। दुर्योधन द्वारा हस्तिनापुर के पाण्डवों के महलों में फिसलने पर द्रोपदी का हंसना नकारात्मकता है। व्यंग्य मारना कि अन्धे का बेटा अन्धा ही होता है, नकारात्मकता है। क्या दुर्योधन ने साड़ी इसलिये नहीं खींची थी ? हंसने की बजाय द्रोपदी को क्षमा मांगते हुए अपने जेठजी की मदद को दौड़ना था। यह होती सकारात्मकता।
किसी की बुराई करना, आलोचना करना नकारात्मकता है। पर में कमजोरियां खोजना, उसका अहित चाहना, भय, शक, सन्देह करना भी नकारात्मकता की श्रेणी में आते हैं। स्वयं को हीन समझना, स्वयं को धिक्कारना, पछताना, रोना नकारात्मकता है।
अपने जीवन से सभी प्रकार की नकारात्मकता को समाप्त करना होगा। नकारात्मकता हमारे विकास में बाधक है। नकारात्मकता की मात्रा ज्यों-ज्यों घटती है त्यों-त्यों सका
दुआ देने व शुभकामना व्यक्त करने से क्या-क्या लाभ मिलता है इस पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि मन से निकली शुभकामनाएं उसी गति से वायुमण्डल में फैलती हैं जैसे सूर्य से निकले प्रकाश व पुष्प से निकली सुगंध चारों ओर फैलती है। यदि आप सभी बहनें खुद के लिए, परिवार तथा समाज की शांति के लिये अपने-अपने मन के अंदर शुभकामनाएं करें तो निश्चित रूप से एक श्रेष्ठ परिवर्तन की ज्योति जगेगी। विद्यालय की प्रधानाचार्य दुलेश्वरी राय ने धन्यवाद ज्ञापित किया। उपस्थित सभी छात्राओं को शुभकामना से सम्बन्धित कार्ड वितरित किया गया तथा पांच 5 मिनट ईश्वरीय स्मृति में होकर दुआओं का वायुब्रेशन फैलाया गया।
े राजकीय बालिका इण्टर कालेज में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय हरपुर द्वारा मन को सकारात्मक विचारों से समर्थ बनाने व दुआओं के सहयोग से दूसरों का सहयोगी बनने संबंधी कार्यक्रम को संबोधित कर ीं। कार्यक्रम की शुरुआत ईश्वर की प्रार्थना से की गयी।
नकारात्मकता को पहचाने बिना उसे सकारात्मकता में नही बदला जा सकता है। नकारात्मकता क्या है ? इसे समझने हम अपने महाकाव्यों में झांकते हैं। रामायण के युद्ध के पीछे क्या कारण है ? लक्ष्मण भैया द्वारा शूर्पनखा की नाक काटना है। नाक काटना अर्थात किसी प्रकार की शारीरिक हिंसा सकारात्मक नहीं हो सकती। सारा जगत रावण को दोष देता है लेकिन लक्ष्मण की नकारात्मकता को हम नहीं देख पाते हैं। आपको अगर कोई महिला शादी का प्रस्ताव रखे या प्रेम का स्वांग रचे तो क्या आप उसकी नाक काट देंगे ?
इसी तरह महाभारत के मूल में भी नकारात्मकता ही है। दुर्योधन द्वारा हस्तिनापुर के पाण्डवों के महलों में फिसलने पर द्रोपदी का हंसना नकारात्मकता है। व्यंग्य मारना कि अन्धे का बेटा अन्धा ही होता है, नकारात्मकता है। क्या दुर्योधन ने साड़ी इसलिये नहीं खींची थी ? हंसने की बजाय द्रोपदी को क्षमा मांगते हुए अपने जेठजी की मदद को दौड़ना था। यह होती सकारात्मकता।
किसी की बुराई करना, आलोचना करना नकारात्मकता है। पर में कमजोरियां खोजना, उसका अहित चाहना, भय, शक, सन्देह करना भी नकारात्मकता की श्रेणी में आते हैं। स्वयं को हीन समझना, स्वयं को धिक्कारना, पछताना, रोना नकारात्मकता है।
अपने जीवन से सभी प्रकार की नकारात्मकता को समाप्त करना होगा। नकारात्मकता हमारे विकास में बाधक है। नकारात्मकता की मात्रा ज्यों-ज्यों घटती है त्यों-त्यों सका
दुआ देने व शुभकामना व्यक्त करने से क्या-क्या लाभ मिलता है इस पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि मन से निकली शुभकामनाएं उसी गति से वायुमण्डल में फैलती हैं जैसे सूर्य से निकले प्रकाश व पुष्प से निकली सुगंध चारों ओर फैलती है। यदि आप सभी बहनें खुद के लिए, परिवार तथा समाज की शांति के लिये अपने-अपने मन के अंदर शुभकामनाएं करें तो निश्चित रूप से एक श्रेष्ठ परिवर्तन की ज्योति जगेगी। विद्यालय की प्रधानाचार्य दुलेश्वरी राय ने धन्यवाद ज्ञापित किया। उपस्थित सभी छात्राओं को शुभकामना से सम्बन्धित कार्ड वितरित किया गया तथा पांच 5 मिनट ईश्वरीय स्मृति में होकर दुआओं का वायुब्रेशन फैलाया गया।
सकारात्मक विचार से समस्या समाधान में बदल जाती है राजयोगी भगवान भाई
सकारात्मक विचार से समस्या समाधान में बदल जाती है राजयोगी भगवान भाई
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by: bk bhagwan
average: 10.0
on: May 24, 2011
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tags: Brahma Kumaris
language: en
सकारात्मक विचार से समस्या समाधान में बदल जाती है राजयोगी भगवान भाई
कटनी। बदलने से विपरीत परिस्थिति भी सहज दिखने लगती है। अपनी समस्या को समाप्त करने एवं सफल जीवन जीने के लिए विचारों को सकारात्मक बनाने की बहुत आवश्यकता है। उक्त उद्गार प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंटआबू से आए राजयोगी भगवान भाई ने कहे। वे स्थानीय ब्रह्माकुमारीज राजयोग सेवा केन्द्र पर तनावमुक्त विषय पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि समस्याओं का कारण ढूढने की बजाए निवारण ढंूढ़े। उन्होंने कहा कि समस्या का चिंतन करने से तनाव की उत्पत्ति होती है। मन के विचारों का प्रभाव वातावरण पेड़-पौधों तथा दूसरों व स्वयं पर पड़ता है। यदि हमारे विचार सकारात्म है तो उसकासकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने बताया कि जीवन को रोगमुक्त,दीर्घायु, शांत व सफल बनाने के लिएहमें सबसे पहले विचारों को सकारात्मक बनाना चाहिए। राजयोगी भगवान भाई ने कहा कि सकारात्मक विचार से समस्या समाधान में बदल जाती है। एक दूसरों के प्रति सकारातमक विचार रखने से आपसीभाई चारा बना रहता है। उन्होंने सत्संग एवं आध्यात्मिक ज्ञान को सकारात्मक सोच के लिए जस्री बताते हुए कहा कि हम अपने आत्मबल से अपना मनोबल बढ़ा सकते है। सत्संग के द्वारा प्राप्त ज्ञान और शक्तियां ही हमारी असली पूंजी हैं। स्थानीय ब्रह्माकुमारी राजयोग सेवा केन्द्र की भगवती बहन ने कहा कि राजयोग के निरंतर अभ्यास के द्वारा हम अपने कर्म इद्रियों को संयमित कर अपने आंतरिकसद्गुणों का विकास कर
पीथमपुर। वर्तमान समय में स्वयं को तनाव से मुक्त रखने के लिए सकारात्मक सोच की बहुत आवश्यकता है। यह वि
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by: bk bhagwan
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on: Jul 30, 2011
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tags: पीथमपुर। वर्तमान समय में स्वयं को तनाव से मुक्त रखने के लिए सकारात्मक सोच की बहुत आवश्यकता है। यह वि
language: en
पीथमपुर। वर्तमान समय में स्वयं को तनाव से मुक्त रखने के लिए सकारात्मक सोच की बहुत आवश्यकता है। यह विचार प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए राजयोगी भगवान भाई ने रखे। वे यहां इंडोरामा में तनाव मुक्ति विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि 19 वीं सदी तर्क की थी,जबकि 20वीं सदी प्रगति की रही है,परन्तु अब यह 21 वीं सदी तनाव पूर्ण रहेगी। ऐसे तनावपूर्ण माहौल में स्वयं को तनाव से दूर रखना चाहिए। विपरीत परिस्थितियों में,हर बातों में सकारात्मक सोच की कला को बढ़ावा दिया जा रहा है। सोचने वाला मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रह सकता है। नकारात्मक सोच ही अनेक समस्याओं और बीमारियों का कारण है। सत्संग के माध्यम से हमारी असली सम्पत्ति जीवन को मुश्किलों से बचाया जा सकता है। यही भगवान को पाने में मददगार भी साबित होता है। अत: प्रतिदिन सत्संग में भाग लेकर जीवन का धन्य बनाया जाए। इस अवसर पर इंदौर, महू, धार व पीथमपुर से सैकड़ों ब्रह्मकुमार भाई-बहन उपस्थित थे।
सुकून भरे पलों से अंतर्मन को भरपूर करने और स्वयं को सशक्त बनाने के लिए जीवन का हर क्षण सकारात्मक चिं
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by: bk bhagwan
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on: Jul 30, 2011
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tags: ब्रह्माकुमारी राजयोग सेवा केंद्र यह बात ब्रह्माकुमार भगवान भाई
language: en
हर क्षण सकारात्मक चिंतन से सींचें कृषि विभाग में भगवान भाई ने कहा
हर क्षण सकारात्मक चिंतन से सींचें
कृषि विभाग में भगवान भाई ने कहा
भास्कर संवाददाता & झाबुआ
सुकून भरे पलों से अंतर्मन को भरपूर करने और स्वयं को सशक्त बनाने के लिए जीवन का हर क्षण सकारात्मक चिंतन से सीचें। हम घर की सफाई तो रोज करते हैं लेकिन मन की सफाई पर ध्यान नहीं देते, जिससे मन में अवांछनीय खरपतवार रूपी विशुद्ध विचार उग आते हैं, इस कारण मनुष्य के जीवन में सुख की जगह दुखों का सृजन होता है
यह बात ब्रह्माकुमार भगवान भाई ने कृषि विभाग में कृषि अधिकारी एवं कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए कही। वे जीवन जीने की कला विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा रोज अपनी आंतरिक स्थिति को सकारात्मक विचारों से भरपूर करें, जिससे मन और तन का बोझ समाप्त हो जाएगा। मन भारी होने से हम अपने उद्देश्य से भटक जाते हैं। भगवान भाई ने कहा जो आंतरिक रूप से खुश होगा वही बाह्य जगत में भी खुश रह सकता है। जो खुश रहता है उनके साथ विपरीत परिस्थिति भी साथ देगी। उन्होंने कहा शरीर पांच तत्वों से बना हुआ है और इसमें हम चेतन्य शक्ति के रूप में आत्मा विराजमान है। हम आत्मा आपस में भाई-भाई हंै, अविनाशी हैं। इस विस्मृति से जीवन में दु:ख और समस्याएं बढ़ गई। उन्होंने बताया कलियुग में मनुष्य स्वयं की असली पहचान भूल गया है। जिस कारण जीवन में अनेक दुख, तनाव, परेशानियां, विघ्न, समस्या चारों ओर दिखाई देती हैं।
ब्रह्माकुमारी राजयोग सेवा केंद्र की ज्योति बहन ने कहा मनुष्य भौतिक सुखों की प्राप्ति के पीछे दौड़ रहा है। जिस कारण पारिवारिक स्नेह लुप्त हो चुका है। उन्होंने बताया जीवन को यदि अभिमान, अशांति, अनाचार, दुराचार, पापाचार रूपी राक्षसी प्रवृत्ति से बचाना चाहते हैं तो आध्यात्मिकता ज्ञान का सहारा लेने की आवश्यकता है। सहायक संचालक कृषि जीएस त्रिवेदी ने भगवान भाई का आभार
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सकारात्मक विचार से समस्या समाधान में बदल जाती है राजयोगी भगवान भाई
कटनी। बदलने से विपरीत परिस्थिति भी सहज दिखने लगती है। अपनी समस्या को समाप्त करने एवं सफल जीवन जीने के लिए विचारों को सकारात्मक बनाने की बहुत आवश्यकता है। उक्त उद्गार प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंटआबू से आए राजयोगी भगवान भाई ने कहे। वे स्थानीय ब्रह्माकुमारीज राजयोग सेवा केन्द्र पर तनावमुक्त विषय पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि समस्याओं का कारण ढूढने की बजाए निवारण ढंूढ़े। उन्होंने कहा कि समस्या का चिंतन करने से तनाव की उत्पत्ति होती है। मन के विचारों का प्रभाव वातावरण पेड़-पौधों तथा दूसरों व स्वयं पर पड़ता है। यदि हमारे विचार सकारात्म है तो उसकासकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने बताया कि जीवन को रोगमुक्त,दीर्घायु, शांत व सफल बनाने के लिएहमें सबसे पहले विचारों को सकारात्मक बनाना चाहिए। राजयोगी भगवान भाई ने कहा कि सकारात्मक विचार से समस्या समाधान में बदल जाती है। एक दूसरों के प्रति सकारातमक विचार रखने से आपसीभाई चारा बना रहता है। उन्होंने सत्संग एवं आध्यात्मिक ज्ञान को सकारात्मक सोच के लिए जस्री बताते हुए कहा कि हम अपने आत्मबल से अपना मनोबल बढ़ा सकते है। सत्संग के द्वारा प्राप्त ज्ञान और शक्तियां ही हमारी असली पूंजी हैं। स्थानीय ब्रह्माकुमारी राजयोग सेवा केन्द्र की भगवती बहन ने कहा कि राजयोग के निरंतर अभ्यास के द्वारा हम अपने कर्म इद्रियों को संयमित कर अपने आंतरिकसद्गुणों का विकास कर
पीथमपुर। वर्तमान समय में स्वयं को तनाव से मुक्त रखने के लिए सकारात्मक सोच की बहुत आवश्यकता है। यह वि
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पीथमपुर। वर्तमान समय में स्वयं को तनाव से मुक्त रखने के लिए सकारात्मक सोच की बहुत आवश्यकता है। यह विचार प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए राजयोगी भगवान भाई ने रखे। वे यहां इंडोरामा में तनाव मुक्ति विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि 19 वीं सदी तर्क की थी,जबकि 20वीं सदी प्रगति की रही है,परन्तु अब यह 21 वीं सदी तनाव पूर्ण रहेगी। ऐसे तनावपूर्ण माहौल में स्वयं को तनाव से दूर रखना चाहिए। विपरीत परिस्थितियों में,हर बातों में सकारात्मक सोच की कला को बढ़ावा दिया जा रहा है। सोचने वाला मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रह सकता है। नकारात्मक सोच ही अनेक समस्याओं और बीमारियों का कारण है। सत्संग के माध्यम से हमारी असली सम्पत्ति जीवन को मुश्किलों से बचाया जा सकता है। यही भगवान को पाने में मददगार भी साबित होता है। अत: प्रतिदिन सत्संग में भाग लेकर जीवन का धन्य बनाया जाए। इस अवसर पर इंदौर, महू, धार व पीथमपुर से सैकड़ों ब्रह्मकुमार भाई-बहन उपस्थित थे।
सुकून भरे पलों से अंतर्मन को भरपूर करने और स्वयं को सशक्त बनाने के लिए जीवन का हर क्षण सकारात्मक चिं
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हर क्षण सकारात्मक चिंतन से सींचें कृषि विभाग में भगवान भाई ने कहा
हर क्षण सकारात्मक चिंतन से सींचें
कृषि विभाग में भगवान भाई ने कहा
भास्कर संवाददाता & झाबुआ
सुकून भरे पलों से अंतर्मन को भरपूर करने और स्वयं को सशक्त बनाने के लिए जीवन का हर क्षण सकारात्मक चिंतन से सीचें। हम घर की सफाई तो रोज करते हैं लेकिन मन की सफाई पर ध्यान नहीं देते, जिससे मन में अवांछनीय खरपतवार रूपी विशुद्ध विचार उग आते हैं, इस कारण मनुष्य के जीवन में सुख की जगह दुखों का सृजन होता है
यह बात ब्रह्माकुमार भगवान भाई ने कृषि विभाग में कृषि अधिकारी एवं कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए कही। वे जीवन जीने की कला विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा रोज अपनी आंतरिक स्थिति को सकारात्मक विचारों से भरपूर करें, जिससे मन और तन का बोझ समाप्त हो जाएगा। मन भारी होने से हम अपने उद्देश्य से भटक जाते हैं। भगवान भाई ने कहा जो आंतरिक रूप से खुश होगा वही बाह्य जगत में भी खुश रह सकता है। जो खुश रहता है उनके साथ विपरीत परिस्थिति भी साथ देगी। उन्होंने कहा शरीर पांच तत्वों से बना हुआ है और इसमें हम चेतन्य शक्ति के रूप में आत्मा विराजमान है। हम आत्मा आपस में भाई-भाई हंै, अविनाशी हैं। इस विस्मृति से जीवन में दु:ख और समस्याएं बढ़ गई। उन्होंने बताया कलियुग में मनुष्य स्वयं की असली पहचान भूल गया है। जिस कारण जीवन में अनेक दुख, तनाव, परेशानियां, विघ्न, समस्या चारों ओर दिखाई देती हैं।
ब्रह्माकुमारी राजयोग सेवा केंद्र की ज्योति बहन ने कहा मनुष्य भौतिक सुखों की प्राप्ति के पीछे दौड़ रहा है। जिस कारण पारिवारिक स्नेह लुप्त हो चुका है। उन्होंने बताया जीवन को यदि अभिमान, अशांति, अनाचार, दुराचार, पापाचार रूपी राक्षसी प्रवृत्ति से बचाना चाहते हैं तो आध्यात्मिकता ज्ञान का सहारा लेने की आवश्यकता है। सहायक संचालक कृषि जीएस त्रिवेदी ने भगवान भाई का आभार
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती ह
आत्मा क्या है और मन क्या है ?
अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की " आप कौन है ?" अथवा "आपका क्या परिचय है ?" तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I
वास्तव में " में " शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता "आत्मा " का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है I मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है I जैसे शरीर पञ्च तत्वों ( जल, वायु ,अग्नि , आकाश और पृथ्वी ) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन बुद्दि और संस्कारमय होती है I आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है I तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है I
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता है I जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है , तब भी वह यहीं हाथ लगता है I आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगो में यहा ही बिंदी अथवा तिलक लगाने क़ी प्रथा है I यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिस्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध शरीर में फैले ज्ञान-तंतुओ से है I आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिस्क तथा तंतुओ द्वारा व्यक्त होता है I आत्मा ही शांति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है I अत: मन और बुद्दि आत्मा से अलग नहीं है I परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह -स्त्री , पुरुष ,बुड़ा , जवान इत्यादी मान बैठी है I यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है इ
उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है इ शरीर मोटर के समान है तथ आतम इसका ड्राईवर है , अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है , उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियत्रण करती है I आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है , जैसे ड्राईवर के बिना मोटर I अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य ( गंतव्य स्थान ) पर पहुँच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कर चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (एक्सिडेंट) का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नही है वह स्वयं तो दु:खी और अशांत होता ही है, साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दु:खी व् अशांत बना देता है I अत: सच्चे सुख व् सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है I
अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की " आप कौन है ?" अथवा "आपका क्या परिचय है ?" तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I
वास्तव में " में " शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता "आत्मा " का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है I मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है I जैसे शरीर पञ्च तत्वों ( जल, वायु ,अग्नि , आकाश और पृथ्वी ) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन बुद्दि और संस्कारमय होती है I आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है I तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है I
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता है I जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है , तब भी वह यहीं हाथ लगता है I आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगो में यहा ही बिंदी अथवा तिलक लगाने क़ी प्रथा है I यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिस्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध शरीर में फैले ज्ञान-तंतुओ से है I आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिस्क तथा तंतुओ द्वारा व्यक्त होता है I आत्मा ही शांति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है I अत: मन और बुद्दि आत्मा से अलग नहीं है I परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह -स्त्री , पुरुष ,बुड़ा , जवान इत्यादी मान बैठी है I यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है इ
उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है इ शरीर मोटर के समान है तथ आतम इसका ड्राईवर है , अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है , उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियत्रण करती है I आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है , जैसे ड्राईवर के बिना मोटर I अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य ( गंतव्य स्थान ) पर पहुँच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कर चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (एक्सिडेंट) का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नही है वह स्वयं तो दु:खी और अशांत होता ही है, साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दु:खी व् अशांत बना देता है I अत: सच्चे सुख व् सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है I
आत्मा क्या है और मन क्या है ? अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात ह
आत्मा क्या है और मन क्या है ?
अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की " आप कौन है ?" अथवा "आपका क्या परिचय है ?" तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I
वास्तव में " में " शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता "आत्मा " का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है I मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है I जैसे शरीर पञ्च तत्वों ( जल, वायु ,अग्नि , आकाश और पृथ्वी ) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन बुद्दि और संस्कारमय होती है I आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है I तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है I
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता है I जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है , तब भी वह यहीं हाथ लगता है I आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगो में यहा ही बिंदी अथवा तिलक लगाने क़ी प्रथा है I यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिस्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध शरीर में फैले ज्ञान-तंतुओ से है I आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिस्क तथा तंतुओ द्वारा व्यक्त होता है I आत्मा ही शांति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है I अत: मन और बुद्दि आत्मा से अलग नहीं है I परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह -स्त्री , पुरुष ,बुड़ा , जवान इत्यादी मान बैठी है I यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है इ
उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है इ शरीर मोटर के समान है तथ आतम इसका ड्राईवर है , अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है , उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियत्रण करती है I आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है , जैसे ड्राईवर के बिना मोटर I अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य ( गंतव्य स्थान ) पर पहुँच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कर चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (एक्सिडेंट) का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नही है वह स्वयं तो दु:खी और अशांत होता ही है, साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दु:खी व् अशांत बना देता है I अत: सच्चे सुख व् सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है I
अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की " आप कौन है ?" अथवा "आपका क्या परिचय है ?" तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I
वास्तव में " में " शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता "आत्मा " का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है I मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है I जैसे शरीर पञ्च तत्वों ( जल, वायु ,अग्नि , आकाश और पृथ्वी ) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन बुद्दि और संस्कारमय होती है I आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है I तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है I
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता है I जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है , तब भी वह यहीं हाथ लगता है I आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगो में यहा ही बिंदी अथवा तिलक लगाने क़ी प्रथा है I यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिस्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध शरीर में फैले ज्ञान-तंतुओ से है I आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिस्क तथा तंतुओ द्वारा व्यक्त होता है I आत्मा ही शांति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है I अत: मन और बुद्दि आत्मा से अलग नहीं है I परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह -स्त्री , पुरुष ,बुड़ा , जवान इत्यादी मान बैठी है I यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है इ
उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है इ शरीर मोटर के समान है तथ आतम इसका ड्राईवर है , अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है , उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियत्रण करती है I आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है , जैसे ड्राईवर के बिना मोटर I अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य ( गंतव्य स्थान ) पर पहुँच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कर चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (एक्सिडेंट) का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नही है वह स्वयं तो दु:खी और अशांत होता ही है, साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दु:खी व् अशांत बना देता है I अत: सच्चे सुख व् सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है I
तीन लोक कौन से है और
तीन लोक कौन से है
और
शिव का धाम कौनसा है ?
मनुष्यात्माये मुक्ति अथवा पूर्ण शांति की शुभ इच्छा तो करती है परन्तु उन्हें यह मालूम नही है की मुक्तिधाम अथवा शांतिधाम है कहाँ ? इसी प्रकार , परम प्रिय परमात्मा शिव से मनुष्यात्माये मिलना तो चाहती है और उसे याद भी करती है परन्तु उन्हें यह मालूम नही है कि
और
शिव का धाम कौनसा है ?
मनुष्यात्माये मुक्ति अथवा पूर्ण शांति की शुभ इच्छा तो करती है परन्तु उन्हें यह मालूम नही है की मुक्तिधाम अथवा शांतिधाम है कहाँ ? इसी प्रकार , परम प्रिय परमात्मा शिव से मनुष्यात्माये मिलना तो चाहती है और उसे याद भी करती है परन्तु उन्हें यह मालूम नही है कि
आत्मा क्या है और मन क्या है ?
आत्मा क्या है और मन क्या है ?
अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की " आप कौन है ?" अथवा "आपका क्या परिचय है ?" तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I
वास्तव में " में " शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता "आत्मा " का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है I मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है I जैसे शरीर पञ्च तत्वों ( जल, वायु ,अग्नि , आकाश और पृथ्वी ) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन बुद्दि और संस्कारमय होती है I आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है I तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है I
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता है I जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है , तब भी वह यहीं हाथ लगता है I आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगो में यहा ही बिंदी अथवा तिलक लगाने क़ी प्रथा है I यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिस्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध शरीर में फैले ज्ञान-तंतुओ से है I आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिस्क तथा तंतुओ द्वारा व्यक्त होता है I आत्मा ही शांति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है I अत: मन और बुद्दि आत्मा से अलग नहीं है I परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह -स्त्री , पुरुष ,बुड़ा , जवान इत्यादी मान बैठी है I यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है इ
उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है इ शरीर मोटर के समान है तथ आतम इसका ड्राईवर है , अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है , उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियत्रण करती है I आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है , जैसे ड्राईवर के बिना मोटर I अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य ( गंतव्य स्थान ) पर पहुँच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कर चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (एक्सिडेंट) का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नही है वह स्वयं तो दु:खी और अशांत होता ही है, साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दु:खी व् अशांत बना देता है I अत: सच्चे सुख व् सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है I
अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की " आप कौन है ?" अथवा "आपका क्या परिचय है ?" तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I
वास्तव में " में " शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता "आत्मा " का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है I मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है I जैसे शरीर पञ्च तत्वों ( जल, वायु ,अग्नि , आकाश और पृथ्वी ) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन बुद्दि और संस्कारमय होती है I आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है I तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है I
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता है I जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है , तब भी वह यहीं हाथ लगता है I आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगो में यहा ही बिंदी अथवा तिलक लगाने क़ी प्रथा है I यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिस्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध शरीर में फैले ज्ञान-तंतुओ से है I आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिस्क तथा तंतुओ द्वारा व्यक्त होता है I आत्मा ही शांति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है I अत: मन और बुद्दि आत्मा से अलग नहीं है I परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह -स्त्री , पुरुष ,बुड़ा , जवान इत्यादी मान बैठी है I यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है इ
उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है इ शरीर मोटर के समान है तथ आतम इसका ड्राईवर है , अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है , उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियत्रण करती है I आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है , जैसे ड्राईवर के बिना मोटर I अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य ( गंतव्य स्थान ) पर पहुँच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कर चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (एक्सिडेंट) का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नही है वह स्वयं तो दु:खी और अशांत होता ही है, साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दु:खी व् अशांत बना देता है I अत: सच्चे सुख व् सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है I
ब्रह्माकुमारीज मानतात की, ५००० वर्षांचं मानव संसार चक्र आत्ता त्याच्या अंतिम चरणांत आहे
जीवन आनंदाचा पर्याय झाला पाहीजे हे मनुष्याचं चिरकालीन स्वप्न आहे. व्यक्ति, परिस्थिती त्याचा अभिगम तसेच त्याची अभिव्यक्ति- या सर्वांची बेरीज म्हणजे जीवन. विज्ञाना द्वारा झालेल्या भौतिक प्रगतीने परिस्थितीला सुविधात्मक केली आहे. पण व्यक्तिच्या जीवना कडे पाहण्याची द्रुष्टी सुविधांना सुखमय करू शकत नाही. त्यामुळे संघर्ष व ताण, दुःख, अशांति, अनेक रोग तसेच असंतोष आणि असुरक्षिततेचा अनुभव होत असतो. या सर्वांत व्यक्ति केंद्र स्थानी असते. सकारात्मक विचारसरणी , खर्या व चांगल्या व्यक्तिमत्वाची शिकवण आणि संपूर्ण आरोग्याच्या प्राप्तीसाठी अध्यात्मिक जागॄतीची आवश्यकता आहे. उच्च चारित्र्य व जीवनाच्या नैतिक मुल्यांच्या अविचल स्थानाला स्विकारण्याची जरूर आहे. अनेक शिक्षण केंद्रामध्ये उपजिविकेसाठीचं शिक्षण तर दिलं जातं, पण जीवन जगण्याची कला शिकण्यासाठी राजयोगाच्या अभ्यासाची जरूर आहे. राजयोगाच्या नियमित अभ्यासाद्वारे सर्व संघर्ष व समस्यांचं समाधान मिळतं. तसेच जीवनाच्या उच्चतम आनंदाचा, सुख व संतोषाचा अनुभव येतो. प्रजापिता ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालया तर्फे राजयोगाचं विनामूल्य शिक्षण देण्यांत येते.
या संस्थेची स्थापना १९३७ मध्ये हल्लीच्या पाकीस्तानांतील सिंध प्रांतांत झाली. त्यावेळी सिंध मधील हिंदु समाजाची धार्मिक अवस्था फारच खराब झाली होती. भक्ति म्हणजे फक्त पूजा-पाठ, पण बरोबर मनांत धनलोभ, व्यापारांत कपट, व्यवहारांत क्रोध, घर-संसारांत मोह आणि मन वासनांनी भरलेलं असायचं. तेव्हां हैदराबाद सिंधच्या दादा लेखराज ज्यांचा जन्म १८७६ मध्ये कॄपलानी कुळांत झाला होता आणि जे स्वतःच्या चमत्कारिक बुद्धि व सतत पुरुषार्था द्वारा गव्हाच्या एका सामान्य व्यापार्यातून प्रसिद्ध सोने-चांदी-हिरे-मोती यांचे फार मोठे व्यापारी झाले होते, त्यांना त्यांच्या वयाच्या ६० व्या वर्षी अचानकच अद्वितीय अनुभव झाला आणि भगवान विष्णूच्या चतूर्भूज रूपाचा साक्षात्कार झाला. परमपिता शिव भगवानांनी त्यांच्यांत प्रवेश करून जगाला अध्यात्मिक रस्त्यावर नेण्यासाठी कार्य करण्याचा संदेश दिला. एके दिवशी त्यांनी भविष्यांत होणार्या महाविनशाचं स्वप्न पाहीलं आणि त्यांच मन व्यवसायांतून उठलं. स्वतःचा सर्व पैसा ईश्वरीय सेवेंत लावण्याचं नक्की करून त्यांनी स्वतःच्या घरीच ओम मंडळी या नांवांने सत्संग सुरु केला. हळु हळु त्यांत ३००-४०० भक्तगण एकत्र होऊ लागले. ज्या मुली व स्त्रिया तेथे येत त्यांना त्या वेळच्या समाजाचा फार विरोध सहन करावा लागला. म्हणून दादांनी त्यांच्यासाठी स्वतःच्या महाला सारख्या विशाल घरांतच राहण्याची व शिक्षणाची व्यवस्था केली. बोर्डींगची दिनचर्या खूप सात्विक ठेवण्यांत आली. सनातनी लोकांचा विरोध इतका वाढला की एके दिवशी त्यांच्या सत्संग भवनाला आग सुद्धा लावण्यांत आली. घरा बाहेर पिकेटींग करण्यांत आलं. परंतु दादा भक्कम उभे राहीले.
फाळणी नंतर १९५० मध्ये ते स्वतःच्या सर्व ब्रह्मकुमारी व कुमारां बरोबर भारतांतील आबु येथे आले. बराच त्रास व समस्या सहन करून स्वतःचे कुटूंबीय व ब्रह्मकुमारीच्या सहकार्याने प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालयाची स्थापना केली आणि राजयोगाच्या शिक्षणाने नैतिकता व जीवन मूल्यांचा व्यवहारू संदेश सर्वांना दिला. ते सांगत असत की विश्वशांतिच्या स्थापने साठी तर सर्व प्रथम व्यक्तिच्या मनांत शांति असणं आवश्यक आहे. त्यांच्या अविरत सेवेमुळे लहान रोपट्यांतून विशाल वटवॄक्षाचं रूप धारण केलेल्या, विश्वभरांत १३० देशांमध्ये असलेल्या ८५०० सेवाकेंद्रां द्वारा स्वपरिवर्तन , स्वानुशासन,जीवनांत दिव्य गुण आणि मुल्यांची धारणा तसेच राजयोगा तर्फे समाजाला उन्नत बनविणारी ही एक अध्यात्मिक संस्था तयार झाली आहे. समाजाच्या सर्व क्षेत्रांना समावून घेऊन मेडीकल, प्रशासक, इंजिनियर, वैज्ञानिक, महीला, युवा, समाज सेवा, ग्राम विकास, मिडिया, स्पोर्टस, बीझीनेस इत्यादि १८ वाहीन्यां मधून व्यक्तित्व विकास व समाज उत्थानाचे कार्य होत आहे. संस्था युनिसेफच्या व युनोच्या आर्थिक-सामाजिक सल्लागार समितीची सदस्य आहे. मॉरिशियस सरकारने हीला ‘वर्ल्ड स्पिरिचुअल युनिवर्सीटी” म्हणून मान्यता दिली आहे. तेथे ३ दिवसांच्या राजयोग शिबीरांचं नियमित आयोजन होतं. विविध क्षेत्र जसे की, मेडीकल, लीगल, ईंजीनीयरींग, शिक्षण, राजकीय, युवा, मुलं, महीला, व्यापारी, कला, साहीत्य यांवरील निरनिराळ्या विषयांवर सेमीनार, वर्कशॉप, चर्चा इत्यदिं चं आयोजन केलं जातं. शहरांत तसेच ग्राम्य विस्तारांत विश्व नव निर्माण, मानव एकता, ग्राम विकास, संपूर्ण आरोग्य, शिक्षणाची नवी दिशा, नारी उत्थान, पर्यावरण जागॄति इत्यादि प्रदर्शनं भरली जातात. कारखाने व ऑफिसिस मध्ये मानवीय संबंध,सेल्फ/स्ट्रेस/कॉनफ्लीक्ट/माईंड/ टाइम मॅनेजमेंट., पॉझीटीव्ह चेंज कोर्स, कर्म फीलॉसॉफी, मेडिटेशन व मेडीसीन, व्यसन मुक्ति इत्यादि विषयांवर ट्रेनिंग प्रोग्राम केले जातात
ब्रह्माकुमारीज मानतात की, ५००० वर्षांचं मानव संसार चक्र आत्ता त्याच्या अंतिम चरणांत आहे. विज्ञान व टेक्नोलॉजी तर्फे अनेक सुविधांमुळे आभासी सुख आणि अल्पकालीन आनंद यांचा डोंगर केला आहे. परंतु मनुष्य अनेक विकराळ समस्या– भुक, गरीबी, बेरोजगारी, प्रांतवाद व आतंकवाद –समोर संघर्ष करीत दुःख, अशांति, असुरक्षा व ताण या सर्वांचा सतत अनुभव करीत आहे. व्यक्तिगत मानव आणि समग्र विश्व महा संकटाच्या/ महा परिवर्तनाच्या समोर उभे ठाकले आहे. तेव्हा आशेचं एक किरण….विश्वाच्या क्षितिजावर परम पवित्र सर्व शक्तिंच्या बीजरूप विश्व कल्याणकारी विश्वपिता ज्ञान सूर्य परमशक्तिचा उदय झाला आहे. परम पिता सर्व मानव आत्म्यांना प्रेम व करूणेसह संदेश देत आहेत ” हे माझ्या बाळांनो, सर्व दुःख , अशांति, समस्या, नकारात्मक विचार आणि काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, आळस इत्यादि विकार व देह अभिमान युक्त व्यवहार अर्थात कर्म आहे. पवित्रताच सुख-शांतिची जननी आहे. विचारांना सात्विक सकारात्मक करण्यासाठी मला ओळखा. मला शरण या, माझ्या तर्फे दिल्या जाणार्या ज्ञानाला ऐका, जीवनांत धारण करा आणि मन माझ्यांत लावा . पवित्र व्हा, राजयोगी व्हा आणि या विश्वांत परत सुखमय संसार बनविण्याच्या माझ्या कामांत सहभागी व्हा.”
या संस्थेची स्थापना १९३७ मध्ये हल्लीच्या पाकीस्तानांतील सिंध प्रांतांत झाली. त्यावेळी सिंध मधील हिंदु समाजाची धार्मिक अवस्था फारच खराब झाली होती. भक्ति म्हणजे फक्त पूजा-पाठ, पण बरोबर मनांत धनलोभ, व्यापारांत कपट, व्यवहारांत क्रोध, घर-संसारांत मोह आणि मन वासनांनी भरलेलं असायचं. तेव्हां हैदराबाद सिंधच्या दादा लेखराज ज्यांचा जन्म १८७६ मध्ये कॄपलानी कुळांत झाला होता आणि जे स्वतःच्या चमत्कारिक बुद्धि व सतत पुरुषार्था द्वारा गव्हाच्या एका सामान्य व्यापार्यातून प्रसिद्ध सोने-चांदी-हिरे-मोती यांचे फार मोठे व्यापारी झाले होते, त्यांना त्यांच्या वयाच्या ६० व्या वर्षी अचानकच अद्वितीय अनुभव झाला आणि भगवान विष्णूच्या चतूर्भूज रूपाचा साक्षात्कार झाला. परमपिता शिव भगवानांनी त्यांच्यांत प्रवेश करून जगाला अध्यात्मिक रस्त्यावर नेण्यासाठी कार्य करण्याचा संदेश दिला. एके दिवशी त्यांनी भविष्यांत होणार्या महाविनशाचं स्वप्न पाहीलं आणि त्यांच मन व्यवसायांतून उठलं. स्वतःचा सर्व पैसा ईश्वरीय सेवेंत लावण्याचं नक्की करून त्यांनी स्वतःच्या घरीच ओम मंडळी या नांवांने सत्संग सुरु केला. हळु हळु त्यांत ३००-४०० भक्तगण एकत्र होऊ लागले. ज्या मुली व स्त्रिया तेथे येत त्यांना त्या वेळच्या समाजाचा फार विरोध सहन करावा लागला. म्हणून दादांनी त्यांच्यासाठी स्वतःच्या महाला सारख्या विशाल घरांतच राहण्याची व शिक्षणाची व्यवस्था केली. बोर्डींगची दिनचर्या खूप सात्विक ठेवण्यांत आली. सनातनी लोकांचा विरोध इतका वाढला की एके दिवशी त्यांच्या सत्संग भवनाला आग सुद्धा लावण्यांत आली. घरा बाहेर पिकेटींग करण्यांत आलं. परंतु दादा भक्कम उभे राहीले.
फाळणी नंतर १९५० मध्ये ते स्वतःच्या सर्व ब्रह्मकुमारी व कुमारां बरोबर भारतांतील आबु येथे आले. बराच त्रास व समस्या सहन करून स्वतःचे कुटूंबीय व ब्रह्मकुमारीच्या सहकार्याने प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालयाची स्थापना केली आणि राजयोगाच्या शिक्षणाने नैतिकता व जीवन मूल्यांचा व्यवहारू संदेश सर्वांना दिला. ते सांगत असत की विश्वशांतिच्या स्थापने साठी तर सर्व प्रथम व्यक्तिच्या मनांत शांति असणं आवश्यक आहे. त्यांच्या अविरत सेवेमुळे लहान रोपट्यांतून विशाल वटवॄक्षाचं रूप धारण केलेल्या, विश्वभरांत १३० देशांमध्ये असलेल्या ८५०० सेवाकेंद्रां द्वारा स्वपरिवर्तन , स्वानुशासन,जीवनांत दिव्य गुण आणि मुल्यांची धारणा तसेच राजयोगा तर्फे समाजाला उन्नत बनविणारी ही एक अध्यात्मिक संस्था तयार झाली आहे. समाजाच्या सर्व क्षेत्रांना समावून घेऊन मेडीकल, प्रशासक, इंजिनियर, वैज्ञानिक, महीला, युवा, समाज सेवा, ग्राम विकास, मिडिया, स्पोर्टस, बीझीनेस इत्यादि १८ वाहीन्यां मधून व्यक्तित्व विकास व समाज उत्थानाचे कार्य होत आहे. संस्था युनिसेफच्या व युनोच्या आर्थिक-सामाजिक सल्लागार समितीची सदस्य आहे. मॉरिशियस सरकारने हीला ‘वर्ल्ड स्पिरिचुअल युनिवर्सीटी” म्हणून मान्यता दिली आहे. तेथे ३ दिवसांच्या राजयोग शिबीरांचं नियमित आयोजन होतं. विविध क्षेत्र जसे की, मेडीकल, लीगल, ईंजीनीयरींग, शिक्षण, राजकीय, युवा, मुलं, महीला, व्यापारी, कला, साहीत्य यांवरील निरनिराळ्या विषयांवर सेमीनार, वर्कशॉप, चर्चा इत्यदिं चं आयोजन केलं जातं. शहरांत तसेच ग्राम्य विस्तारांत विश्व नव निर्माण, मानव एकता, ग्राम विकास, संपूर्ण आरोग्य, शिक्षणाची नवी दिशा, नारी उत्थान, पर्यावरण जागॄति इत्यादि प्रदर्शनं भरली जातात. कारखाने व ऑफिसिस मध्ये मानवीय संबंध,सेल्फ/स्ट्रेस/कॉनफ्लीक्ट/माईंड/ टाइम मॅनेजमेंट., पॉझीटीव्ह चेंज कोर्स, कर्म फीलॉसॉफी, मेडिटेशन व मेडीसीन, व्यसन मुक्ति इत्यादि विषयांवर ट्रेनिंग प्रोग्राम केले जातात
ब्रह्माकुमारीज मानतात की, ५००० वर्षांचं मानव संसार चक्र आत्ता त्याच्या अंतिम चरणांत आहे. विज्ञान व टेक्नोलॉजी तर्फे अनेक सुविधांमुळे आभासी सुख आणि अल्पकालीन आनंद यांचा डोंगर केला आहे. परंतु मनुष्य अनेक विकराळ समस्या– भुक, गरीबी, बेरोजगारी, प्रांतवाद व आतंकवाद –समोर संघर्ष करीत दुःख, अशांति, असुरक्षा व ताण या सर्वांचा सतत अनुभव करीत आहे. व्यक्तिगत मानव आणि समग्र विश्व महा संकटाच्या/ महा परिवर्तनाच्या समोर उभे ठाकले आहे. तेव्हा आशेचं एक किरण….विश्वाच्या क्षितिजावर परम पवित्र सर्व शक्तिंच्या बीजरूप विश्व कल्याणकारी विश्वपिता ज्ञान सूर्य परमशक्तिचा उदय झाला आहे. परम पिता सर्व मानव आत्म्यांना प्रेम व करूणेसह संदेश देत आहेत ” हे माझ्या बाळांनो, सर्व दुःख , अशांति, समस्या, नकारात्मक विचार आणि काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, आळस इत्यादि विकार व देह अभिमान युक्त व्यवहार अर्थात कर्म आहे. पवित्रताच सुख-शांतिची जननी आहे. विचारांना सात्विक सकारात्मक करण्यासाठी मला ओळखा. मला शरण या, माझ्या तर्फे दिल्या जाणार्या ज्ञानाला ऐका, जीवनांत धारण करा आणि मन माझ्यांत लावा . पवित्र व्हा, राजयोगी व्हा आणि या विश्वांत परत सुखमय संसार बनविण्याच्या माझ्या कामांत सहभागी व्हा.”
ब्रह्माकुमारीज
जीवन आनंदाचा पर्याय झाला पाहीजे हे मनुष्याचं चिरकालीन स्वप्न आहे. व्यक्ति, परिस्थिती त्याचा अभिगम तसेच त्याची अभिव्यक्ति- या सर्वांची बेरीज म्हणजे जीवन. विज्ञाना द्वारा झालेल्या भौतिक प्रगतीने परिस्थितीला सुविधात्मक केली आहे. पण व्यक्तिच्या जीवना कडे पाहण्याची द्रुष्टी सुविधांना सुखमय करू शकत नाही. त्यामुळे संघर्ष व ताण, दुःख, अशांति, अनेक रोग तसेच असंतोष आणि असुरक्षिततेचा अनुभव होत असतो. या सर्वांत व्यक्ति केंद्र स्थानी असते. सकारात्मक विचारसरणी , खर्या व चांगल्या व्यक्तिमत्वाची शिकवण आणि संपूर्ण आरोग्याच्या प्राप्तीसाठी अध्यात्मिक जागॄतीची आवश्यकता आहे. उच्च चारित्र्य व जीवनाच्या नैतिक मुल्यांच्या अविचल स्थानाला स्विकारण्याची जरूर आहे. अनेक शिक्षण केंद्रामध्ये उपजिविकेसाठीचं शिक्षण तर दिलं जातं, पण जीवन जगण्याची कला शिकण्यासाठी राजयोगाच्या अभ्यासाची जरूर आहे. राजयोगाच्या नियमित अभ्यासाद्वारे सर्व संघर्ष व समस्यांचं समाधान मिळतं. तसेच जीवनाच्या उच्चतम आनंदाचा, सुख व संतोषाचा अनुभव येतो. प्रजापिता ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालया तर्फे राजयोगाचं विनामूल्य शिक्षण देण्यांत येते.
या संस्थेची स्थापना १९३७ मध्ये हल्लीच्या पाकीस्तानांतील सिंध प्रांतांत झाली. त्यावेळी सिंध मधील हिंदु समाजाची धार्मिक अवस्था फारच खराब झाली होती. भक्ति म्हणजे फक्त पूजा-पाठ, पण बरोबर मनांत धनलोभ, व्यापारांत कपट, व्यवहारांत क्रोध, घर-संसारांत मोह आणि मन वासनांनी भरलेलं असायचं. तेव्हां हैदराबाद सिंधच्या दादा लेखराज ज्यांचा जन्म १८७६ मध्ये कॄपलानी कुळांत झाला होता आणि जे स्वतःच्या चमत्कारिक बुद्धि व सतत पुरुषार्था द्वारा गव्हाच्या एका सामान्य व्यापार्यातून प्रसिद्ध सोने-चांदी-हिरे-मोती यांचे फार मोठे व्यापारी झाले होते, त्यांना त्यांच्या वयाच्या ६० व्या वर्षी अचानकच अद्वितीय अनुभव झाला आणि भगवान विष्णूच्या चतूर्भूज रूपाचा साक्षात्कार झाला. परमपिता शिव भगवानांनी त्यांच्यांत प्रवेश करून जगाला अध्यात्मिक रस्त्यावर नेण्यासाठी कार्य करण्याचा संदेश दिला. एके दिवशी त्यांनी भविष्यांत होणार्या महाविनशाचं स्वप्न पाहीलं आणि त्यांच मन व्यवसायांतून उठलं. स्वतःचा सर्व पैसा ईश्वरीय सेवेंत लावण्याचं नक्की करून त्यांनी स्वतःच्या घरीच ओम मंडळी या नांवांने सत्संग सुरु केला. हळु हळु त्यांत ३००-४०० भक्तगण एकत्र होऊ लागले. ज्या मुली व स्त्रिया तेथे येत त्यांना त्या वेळच्या समाजाचा फार विरोध सहन करावा लागला. म्हणून दादांनी त्यांच्यासाठी स्वतःच्या महाला सारख्या विशाल घरांतच राहण्याची व शिक्षणाची व्यवस्था केली. बोर्डींगची दिनचर्या खूप सात्विक ठेवण्यांत आली. सनातनी लोकांचा विरोध इतका वाढला की एके दिवशी त्यांच्या सत्संग भवनाला आग सुद्धा लावण्यांत आली. घरा बाहेर पिकेटींग करण्यांत आलं. परंतु दादा भक्कम उभे राहीले.
फाळणी नंतर १९५० मध्ये ते स्वतःच्या सर्व ब्रह्मकुमारी व कुमारां बरोबर भारतांतील आबु येथे आले. बराच त्रास व समस्या सहन करून स्वतःचे कुटूंबीय व ब्रह्मकुमारीच्या सहकार्याने प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालयाची स्थापना केली आणि राजयोगाच्या शिक्षणाने नैतिकता व जीवन मूल्यांचा व्यवहारू संदेश सर्वांना दिला. ते सांगत असत की विश्वशांतिच्या स्थापने साठी तर सर्व प्रथम व्यक्तिच्या मनांत शांति असणं आवश्यक आहे. त्यांच्या अविरत सेवेमुळे लहान रोपट्यांतून विशाल वटवॄक्षाचं रूप धारण केलेल्या, विश्वभरांत १३० देशांमध्ये असलेल्या ८५०० सेवाकेंद्रां द्वारा स्वपरिवर्तन , स्वानुशासन,जीवनांत दिव्य गुण आणि मुल्यांची धारणा तसेच राजयोगा तर्फे समाजाला उन्नत बनविणारी ही एक अध्यात्मिक संस्था तयार झाली आहे. समाजाच्या सर्व क्षेत्रांना समावून घेऊन मेडीकल, प्रशासक, इंजिनियर, वैज्ञानिक, महीला, युवा, समाज सेवा, ग्राम विकास, मिडिया, स्पोर्टस, बीझीनेस इत्यादि १८ वाहीन्यां मधून व्यक्तित्व विकास व समाज उत्थानाचे कार्य होत आहे. संस्था युनिसेफच्या व युनोच्या आर्थिक-सामाजिक सल्लागार समितीची सदस्य आहे. मॉरिशियस सरकारने हीला ‘वर्ल्ड स्पिरिचुअल युनिवर्सीटी” म्हणून मान्यता दिली आहे. तेथे ३ दिवसांच्या राजयोग शिबीरांचं नियमित आयोजन होतं. विविध क्षेत्र जसे की, मेडीकल, लीगल, ईंजीनीयरींग, शिक्षण, राजकीय, युवा, मुलं, महीला, व्यापारी, कला, साहीत्य यांवरील निरनिराळ्या विषयांवर सेमीनार, वर्कशॉप, चर्चा इत्यदिं चं आयोजन केलं जातं. शहरांत तसेच ग्राम्य विस्तारांत विश्व नव निर्माण, मानव एकता, ग्राम विकास, संपूर्ण आरोग्य, शिक्षणाची नवी दिशा, नारी उत्थान, पर्यावरण जागॄति इत्यादि प्रदर्शनं भरली जातात. कारखाने व ऑफिसिस मध्ये मानवीय संबंध,सेल्फ/स्ट्रेस/कॉनफ्लीक्ट/माईंड/ टाइम मॅनेजमेंट., पॉझीटीव्ह चेंज कोर्स, कर्म फीलॉसॉफी, मेडिटेशन व मेडीसीन, व्यसन मुक्ति इत्यादि विषयांवर ट्रेनिंग प्रोग्राम केले जातात
ब्रह्माकुमारीज मानतात की, ५००० वर्षांचं मानव संसार चक्र आत्ता त्याच्या अंतिम चरणांत आहे. विज्ञान व टेक्नोलॉजी तर्फे अनेक सुविधांमुळे आभासी सुख आणि अल्पकालीन आनंद यांचा डोंगर केला आहे. परंतु मनुष्य अनेक विकराळ समस्या– भुक, गरीबी, बेरोजगारी, प्रांतवाद व आतंकवाद –समोर संघर्ष करीत दुःख, अशांति, असुरक्षा व ताण या सर्वांचा सतत अनुभव करीत आहे. व्यक्तिगत मानव आणि समग्र विश्व महा संकटाच्या/ महा परिवर्तनाच्या समोर उभे ठाकले आहे. तेव्हा आशेचं एक किरण….विश्वाच्या क्षितिजावर परम पवित्र सर्व शक्तिंच्या बीजरूप विश्व कल्याणकारी विश्वपिता ज्ञान सूर्य परमशक्तिचा उदय झाला आहे. परम पिता सर्व मानव आत्म्यांना प्रेम व करूणेसह संदेश देत आहेत ” हे माझ्या बाळांनो, सर्व दुःख , अशांति, समस्या, नकारात्मक विचार आणि काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, आळस इत्यादि विकार व देह अभिमान युक्त व्यवहार अर्थात कर्म आहे. पवित्रताच सुख-शांतिची जननी आहे. विचारांना सात्विक सकारात्मक करण्यासाठी मला ओळखा. मला शरण या, माझ्या तर्फे दिल्या जाणार्या ज्ञानाला ऐका, जीवनांत धारण करा आणि मन माझ्यांत लावा . पवित्र व्हा, राजयोगी व्हा आणि या विश्वांत परत सुखमय संसार बनविण्याच्या माझ्या कामांत सहभागी व्हा.”
या संस्थेची स्थापना १९३७ मध्ये हल्लीच्या पाकीस्तानांतील सिंध प्रांतांत झाली. त्यावेळी सिंध मधील हिंदु समाजाची धार्मिक अवस्था फारच खराब झाली होती. भक्ति म्हणजे फक्त पूजा-पाठ, पण बरोबर मनांत धनलोभ, व्यापारांत कपट, व्यवहारांत क्रोध, घर-संसारांत मोह आणि मन वासनांनी भरलेलं असायचं. तेव्हां हैदराबाद सिंधच्या दादा लेखराज ज्यांचा जन्म १८७६ मध्ये कॄपलानी कुळांत झाला होता आणि जे स्वतःच्या चमत्कारिक बुद्धि व सतत पुरुषार्था द्वारा गव्हाच्या एका सामान्य व्यापार्यातून प्रसिद्ध सोने-चांदी-हिरे-मोती यांचे फार मोठे व्यापारी झाले होते, त्यांना त्यांच्या वयाच्या ६० व्या वर्षी अचानकच अद्वितीय अनुभव झाला आणि भगवान विष्णूच्या चतूर्भूज रूपाचा साक्षात्कार झाला. परमपिता शिव भगवानांनी त्यांच्यांत प्रवेश करून जगाला अध्यात्मिक रस्त्यावर नेण्यासाठी कार्य करण्याचा संदेश दिला. एके दिवशी त्यांनी भविष्यांत होणार्या महाविनशाचं स्वप्न पाहीलं आणि त्यांच मन व्यवसायांतून उठलं. स्वतःचा सर्व पैसा ईश्वरीय सेवेंत लावण्याचं नक्की करून त्यांनी स्वतःच्या घरीच ओम मंडळी या नांवांने सत्संग सुरु केला. हळु हळु त्यांत ३००-४०० भक्तगण एकत्र होऊ लागले. ज्या मुली व स्त्रिया तेथे येत त्यांना त्या वेळच्या समाजाचा फार विरोध सहन करावा लागला. म्हणून दादांनी त्यांच्यासाठी स्वतःच्या महाला सारख्या विशाल घरांतच राहण्याची व शिक्षणाची व्यवस्था केली. बोर्डींगची दिनचर्या खूप सात्विक ठेवण्यांत आली. सनातनी लोकांचा विरोध इतका वाढला की एके दिवशी त्यांच्या सत्संग भवनाला आग सुद्धा लावण्यांत आली. घरा बाहेर पिकेटींग करण्यांत आलं. परंतु दादा भक्कम उभे राहीले.
फाळणी नंतर १९५० मध्ये ते स्वतःच्या सर्व ब्रह्मकुमारी व कुमारां बरोबर भारतांतील आबु येथे आले. बराच त्रास व समस्या सहन करून स्वतःचे कुटूंबीय व ब्रह्मकुमारीच्या सहकार्याने प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालयाची स्थापना केली आणि राजयोगाच्या शिक्षणाने नैतिकता व जीवन मूल्यांचा व्यवहारू संदेश सर्वांना दिला. ते सांगत असत की विश्वशांतिच्या स्थापने साठी तर सर्व प्रथम व्यक्तिच्या मनांत शांति असणं आवश्यक आहे. त्यांच्या अविरत सेवेमुळे लहान रोपट्यांतून विशाल वटवॄक्षाचं रूप धारण केलेल्या, विश्वभरांत १३० देशांमध्ये असलेल्या ८५०० सेवाकेंद्रां द्वारा स्वपरिवर्तन , स्वानुशासन,जीवनांत दिव्य गुण आणि मुल्यांची धारणा तसेच राजयोगा तर्फे समाजाला उन्नत बनविणारी ही एक अध्यात्मिक संस्था तयार झाली आहे. समाजाच्या सर्व क्षेत्रांना समावून घेऊन मेडीकल, प्रशासक, इंजिनियर, वैज्ञानिक, महीला, युवा, समाज सेवा, ग्राम विकास, मिडिया, स्पोर्टस, बीझीनेस इत्यादि १८ वाहीन्यां मधून व्यक्तित्व विकास व समाज उत्थानाचे कार्य होत आहे. संस्था युनिसेफच्या व युनोच्या आर्थिक-सामाजिक सल्लागार समितीची सदस्य आहे. मॉरिशियस सरकारने हीला ‘वर्ल्ड स्पिरिचुअल युनिवर्सीटी” म्हणून मान्यता दिली आहे. तेथे ३ दिवसांच्या राजयोग शिबीरांचं नियमित आयोजन होतं. विविध क्षेत्र जसे की, मेडीकल, लीगल, ईंजीनीयरींग, शिक्षण, राजकीय, युवा, मुलं, महीला, व्यापारी, कला, साहीत्य यांवरील निरनिराळ्या विषयांवर सेमीनार, वर्कशॉप, चर्चा इत्यदिं चं आयोजन केलं जातं. शहरांत तसेच ग्राम्य विस्तारांत विश्व नव निर्माण, मानव एकता, ग्राम विकास, संपूर्ण आरोग्य, शिक्षणाची नवी दिशा, नारी उत्थान, पर्यावरण जागॄति इत्यादि प्रदर्शनं भरली जातात. कारखाने व ऑफिसिस मध्ये मानवीय संबंध,सेल्फ/स्ट्रेस/कॉनफ्लीक्ट/माईंड/ टाइम मॅनेजमेंट., पॉझीटीव्ह चेंज कोर्स, कर्म फीलॉसॉफी, मेडिटेशन व मेडीसीन, व्यसन मुक्ति इत्यादि विषयांवर ट्रेनिंग प्रोग्राम केले जातात
ब्रह्माकुमारीज मानतात की, ५००० वर्षांचं मानव संसार चक्र आत्ता त्याच्या अंतिम चरणांत आहे. विज्ञान व टेक्नोलॉजी तर्फे अनेक सुविधांमुळे आभासी सुख आणि अल्पकालीन आनंद यांचा डोंगर केला आहे. परंतु मनुष्य अनेक विकराळ समस्या– भुक, गरीबी, बेरोजगारी, प्रांतवाद व आतंकवाद –समोर संघर्ष करीत दुःख, अशांति, असुरक्षा व ताण या सर्वांचा सतत अनुभव करीत आहे. व्यक्तिगत मानव आणि समग्र विश्व महा संकटाच्या/ महा परिवर्तनाच्या समोर उभे ठाकले आहे. तेव्हा आशेचं एक किरण….विश्वाच्या क्षितिजावर परम पवित्र सर्व शक्तिंच्या बीजरूप विश्व कल्याणकारी विश्वपिता ज्ञान सूर्य परमशक्तिचा उदय झाला आहे. परम पिता सर्व मानव आत्म्यांना प्रेम व करूणेसह संदेश देत आहेत ” हे माझ्या बाळांनो, सर्व दुःख , अशांति, समस्या, नकारात्मक विचार आणि काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, आळस इत्यादि विकार व देह अभिमान युक्त व्यवहार अर्थात कर्म आहे. पवित्रताच सुख-शांतिची जननी आहे. विचारांना सात्विक सकारात्मक करण्यासाठी मला ओळखा. मला शरण या, माझ्या तर्फे दिल्या जाणार्या ज्ञानाला ऐका, जीवनांत धारण करा आणि मन माझ्यांत लावा . पवित्र व्हा, राजयोगी व्हा आणि या विश्वांत परत सुखमय संसार बनविण्याच्या माझ्या कामांत सहभागी व्हा.”
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्
सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
बिरोबा देव मंदिर,सरगरवस्ती, तळेवाडी.
सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
Biroba is a form of Hindu god Shiva. Biroba is the Kuldaivat of Dhanagars of Maharashtra State. There are many temples of Biroba in villages of Maharashtra. In Arewadi (Dist: Sangli),Katphal TAl :Sangola, Pattankodoli . This is recently re-newed by all Devotional villagers.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
Biroba is a form of Hindu god Shiva. Biroba is the Kuldaivat of Dhanagars of Maharashtra State. There are many temples of Biroba in villages of Maharashtra. In Arewadi (Dist: Sangli),Katphal TAl :Sangola, Pattankodoli . This is recently re-newed by all Devotional villagers.
Thursday, October 27, 2011
परमात्मा किसी से भेद नहीं करता। जिसने सबका सृजन किया है वह किसी से भेद करेगा भी क्यूं? माया के भ्ावरजाल में फंसकर उससे दूरी तो हमने ही बना रखी है। उससे नाता जोड़ना चाहते हो तो प्रेमपूर्वक आकर मिलो। लग जाओ साधना में नि
परमात्मा किसी से भेद नहीं करता। जिसने सबका सृजन किया है वह किसी से भेद करेगा भी क्यूं? माया के भ्ावरजाल में फंसकर उससे दूरी तो हमने ही बना रखी है। उससे नाता जोड़ना चाहते हो तो प्रेमपूर्वक आकर मिलो। लग जाओ साधना में नि:स्वार्थ भाव से वह तुम्हारे स्वागत को आतुर है।
उक्त विचार रेलवे स्टेडियम प्रांगण में चल रहे गीता सार प्रवचन में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विवि की ख्याति लब्ध विद्वान ब्र.कु. उषा बहन ने व्यक्त किये। रविवार को प्रसंग को आगे बढ़ाते हुये उन्होंने कहा कि गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को परमात्मा से मिलन का रहस्य समझाते हैं। भगवान कहते हैं कि जो मेरी अनन्य भाव से सेवा करता है वह मेरा मित्र तथा मैं उसका मित्र हूं। गृहस्थ जीवन में रहकर भी भक्ति साधना करते रहने के बारे में उन्हों ने कहा कि कुछ भी कार्य-व्यवहार करते समय भगवान को नहीं भूलना चाहिए। भक्ति जानना चाहते हो तो विष्णु भगवान के शंख, सुदर्शन चक्र, गदा और कमल से सीख लो। शंख का स्वभाव ओम् ध्वनि का उच्चारण करना है। सुदर्शन का भाव हर एक के अंदर शुभ का दर्शन करना, गदा का ज्ञान का प्रतीक है तथा कमल से सीख मिलती है कि कीचड़ में रहकर भी पवित्रता के शीर्ष पर रहो।
इससे पूर्व महापौर श्रीमती अंजू चौधरी ने उषा बहन को स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मान दिया और प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा किये जा रहे सेवाकार्यो की सराहना की।
इंसर्ट- बीमारी के बावजूद नही टूटा प्रवचन करने हौसला
गोरखपुर। ब्र.कु. उषा बहन जबसे गोरखपुर आयी हैं उनका समय बेहद व्यस्त रहा है। प्रतिदिन सुबह 6.30 से 8 बजे तथा शाम को भी इसी वक्त कथा और ध्यान में उनका समय गुजर रहा है। इसके अलावा दिन के समय शहर में किसी न किसी आध्यात्मिक कार्यक्रमों आदि में उनका आना जाना रहता है। रविवार को सुबह कथा के बाद सिविल लाइन्स स्थित गोकुल अतिथि भवन में उनका कार्यक्रम था। थकान की वजह से उनकी तबियत खराब हो गयी बावजूद इसके उन्होंने शाम का प्रवचन नही छोड़ा।
उक्त विचार रेलवे स्टेडियम प्रांगण में चल रहे गीता सार प्रवचन में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विवि की ख्याति लब्ध विद्वान ब्र.कु. उषा बहन ने व्यक्त किये। रविवार को प्रसंग को आगे बढ़ाते हुये उन्होंने कहा कि गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को परमात्मा से मिलन का रहस्य समझाते हैं। भगवान कहते हैं कि जो मेरी अनन्य भाव से सेवा करता है वह मेरा मित्र तथा मैं उसका मित्र हूं। गृहस्थ जीवन में रहकर भी भक्ति साधना करते रहने के बारे में उन्हों ने कहा कि कुछ भी कार्य-व्यवहार करते समय भगवान को नहीं भूलना चाहिए। भक्ति जानना चाहते हो तो विष्णु भगवान के शंख, सुदर्शन चक्र, गदा और कमल से सीख लो। शंख का स्वभाव ओम् ध्वनि का उच्चारण करना है। सुदर्शन का भाव हर एक के अंदर शुभ का दर्शन करना, गदा का ज्ञान का प्रतीक है तथा कमल से सीख मिलती है कि कीचड़ में रहकर भी पवित्रता के शीर्ष पर रहो।
इससे पूर्व महापौर श्रीमती अंजू चौधरी ने उषा बहन को स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मान दिया और प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा किये जा रहे सेवाकार्यो की सराहना की।
इंसर्ट- बीमारी के बावजूद नही टूटा प्रवचन करने हौसला
गोरखपुर। ब्र.कु. उषा बहन जबसे गोरखपुर आयी हैं उनका समय बेहद व्यस्त रहा है। प्रतिदिन सुबह 6.30 से 8 बजे तथा शाम को भी इसी वक्त कथा और ध्यान में उनका समय गुजर रहा है। इसके अलावा दिन के समय शहर में किसी न किसी आध्यात्मिक कार्यक्रमों आदि में उनका आना जाना रहता है। रविवार को सुबह कथा के बाद सिविल लाइन्स स्थित गोकुल अतिथि भवन में उनका कार्यक्रम था। थकान की वजह से उनकी तबियत खराब हो गयी बावजूद इसके उन्होंने शाम का प्रवचन नही छोड़ा।
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आप
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले
परमात्मा किसी से भेद नहीं करता। जिसने सबका सृजन किया है वह किसी से भेद करेगा भी क्यूं? माया के भ्ावरजाल में फंसकर उससे दूरी तो हमने ही बना रखी है। उससे नाता जोड़ना चाहते हो तो प्रेमपूर्वक आकर मिलो। लग जाओ साधना में नि:स्वार्थ भाव से वह तुम्हारे स्वागत को आतुर है।
उक्त विचार रेलवे स्टेडियम प्रांगण में चल रहे गीता सार प्रवचन में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विवि की ख्याति लब्ध विद्वान ब्र.कु. उषा बहन ने व्यक्त किये। रविवार को प्रसंग को आगे बढ़ाते हुये उन्होंने कहा कि गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को परमात्मा से मिलन का रहस्य समझाते हैं। भगवान कहते हैं कि जो मेरी अनन्य भाव से सेवा करता है वह मेरा मित्र तथा मैं उसका मित्र हूं। गृहस्थ जीवन में रहकर भी भक्ति साधना करते रहने के बारे में उन्हों ने कहा कि कुछ भी कार्य-व्यवहार करते समय भगवान को नहीं भूलना चाहिए। भक्ति जानना चाहते हो तो विष्णु भगवान के शंख, सुदर्शन चक्र, गदा और कमल से सीख लो। शंख का स्वभाव ओम् ध्वनि का उच्चारण करना है। सुदर्शन का भाव हर एक के अंदर शुभ का दर्शन करना, गदा का ज्ञान का प्रतीक है तथा कमल से सीख मिलती है कि कीचड़ में रहकर भी पवित्रता के शीर्ष पर रहो।
इससे पूर्व महापौर श्रीमती अंजू चौधरी ने उषा बहन को स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मान दिया और प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा किये जा रहे सेवाकार्यो की सराहना की।
इंसर्ट- बीमारी के बावजूद नही टूटा प्रवचन करने हौसला
गोरखपुर। ब्र.कु. उषा बहन जबसे गोरखपुर आयी हैं उनका समय बेहद व्यस्त रहा है। प्रतिदिन सुबह 6.30 से 8 बजे तथा शाम को भी इसी वक्त कथा और ध्यान में उनका समय गुजर रहा है। इसके अलावा दिन के समय शहर में किसी न किसी आध्यात्मिक कार्यक्रमों आदि में उनका आना जाना रहता है। रविवार को सुबह कथा के बाद सिविल लाइन्स स्थित गोकुल अतिथि भवन में उनका कार्यक्रम था। थकान की वजह से उनकी तबियत खराब हो गयी बावजूद इसके उन्होंने शाम का प्रवचन नही छोड़ा।
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले
परमात्मा किसी से भेद नहीं करता। जिसने सबका सृजन किया है वह किसी से भेद करेगा भी क्यूं? माया के भ्ावरजाल में फंसकर उससे दूरी तो हमने ही बना रखी है। उससे नाता जोड़ना चाहते हो तो प्रेमपूर्वक आकर मिलो। लग जाओ साधना में नि:स्वार्थ भाव से वह तुम्हारे स्वागत को आतुर है।
उक्त विचार रेलवे स्टेडियम प्रांगण में चल रहे गीता सार प्रवचन में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विवि की ख्याति लब्ध विद्वान ब्र.कु. उषा बहन ने व्यक्त किये। रविवार को प्रसंग को आगे बढ़ाते हुये उन्होंने कहा कि गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को परमात्मा से मिलन का रहस्य समझाते हैं। भगवान कहते हैं कि जो मेरी अनन्य भाव से सेवा करता है वह मेरा मित्र तथा मैं उसका मित्र हूं। गृहस्थ जीवन में रहकर भी भक्ति साधना करते रहने के बारे में उन्हों ने कहा कि कुछ भी कार्य-व्यवहार करते समय भगवान को नहीं भूलना चाहिए। भक्ति जानना चाहते हो तो विष्णु भगवान के शंख, सुदर्शन चक्र, गदा और कमल से सीख लो। शंख का स्वभाव ओम् ध्वनि का उच्चारण करना है। सुदर्शन का भाव हर एक के अंदर शुभ का दर्शन करना, गदा का ज्ञान का प्रतीक है तथा कमल से सीख मिलती है कि कीचड़ में रहकर भी पवित्रता के शीर्ष पर रहो।
इससे पूर्व महापौर श्रीमती अंजू चौधरी ने उषा बहन को स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मान दिया और प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा किये जा रहे सेवाकार्यो की सराहना की।
इंसर्ट- बीमारी के बावजूद नही टूटा प्रवचन करने हौसला
गोरखपुर। ब्र.कु. उषा बहन जबसे गोरखपुर आयी हैं उनका समय बेहद व्यस्त रहा है। प्रतिदिन सुबह 6.30 से 8 बजे तथा शाम को भी इसी वक्त कथा और ध्यान में उनका समय गुजर रहा है। इसके अलावा दिन के समय शहर में किसी न किसी आध्यात्मिक कार्यक्रमों आदि में उनका आना जाना रहता है। रविवार को सुबह कथा के बाद सिविल लाइन्स स्थित गोकुल अतिथि भवन में उनका कार्यक्रम था। थकान की वजह से उनकी तबियत खराब हो गयी बावजूद इसके उन्होंने शाम का प्रवचन नही छोड़ा।
बदला लेने की बजाय स्वयं को बदलो: भगवानभाई
बदला लेने की बजाय स्वयं को बदलो: भगवानभाई
बालोतरा & प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की शाखा बालोतरा की ओर से शुक्रवार को बालोतरा उप कारागृह में संस्कार परिवर्तन एवं व्यवहार शुद्धि पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर माउंट आबू के राजयोगी ब्रह्मकुमार भगवान भाई ने कहा कि कर्मों की गति बड़ी निराली है। कर्मों के आधार पर ही यह संसार चलता है। कर्म से ही मनुष्य महान बनता है। उन्होंने कहा कि मनुष्यों के कर्म से ही वात्या जैसे डाकू से वाल्मिकी जैसे रामायण लिखने वाले महान व्यक्ति समान माने जाते हैं। मनुष्य जीवन बड़ा ही अनमोल है, उसे ऐसे ही व्यर्थ कर्म कर व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। मनुष्यों की गलतियां ही उसे सही रूप में इंसान बना सकती है। केवल हमें उसकी गलतियों को स्वयं ही महसूस कर उसे बदलना है। भगवानभाई ने कहा कि यह कारागृह बंदियों के लिए तपस्थली है। इसमें एकांत में बैठकर स्वयं के बारे में सोचना है कि मै इस संसार में क्यों आया हूं, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, भगवान ने मुझे किस उद्देश्य से इस संसार में भेजा है और मैं यहां आकर क्या कर रहा हूं। उन्होंने बंदियों को इन बातों पर चिंतन कर बदला लेने की भावना की बजाय स्वयं को बदलने की पे्ररणा दी। स्थानीय ब्रह्माकुमारी राजयोग केंद्र की संचालिका बीके उमाबहन ने कहा कि हमें परमात्मा ने ये इंद्रियां दी है, उसका दुरुपयोग नहीं करना है। हम लोभ, लालच में आकर उसका दुरुपयोग करते हैं तो फिर अगले जन्म में ये इंद्रियां अधूरे रूप में होंगी। जेल अधीक्षक सुरेंद्रसिंह ने कहा कि जब हम अपना मनोबल कमजोर करते हैं तब हम अपने आप को आंतरिक रूप से अकेले महसूस करते हैं। मनोबल कमजोर होने से शांति, एकाग्रता भंग हो जाती है। कार्यक्रम में बीके भलाराम ने ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के बारे में जानकारी दी।
बालोतरा & प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की शाखा बालोतरा की ओर से शुक्रवार को बालोतरा उप कारागृह में संस्कार परिवर्तन एवं व्यवहार शुद्धि पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर माउंट आबू के राजयोगी ब्रह्मकुमार भगवान भाई ने कहा कि कर्मों की गति बड़ी निराली है। कर्मों के आधार पर ही यह संसार चलता है। कर्म से ही मनुष्य महान बनता है। उन्होंने कहा कि मनुष्यों के कर्म से ही वात्या जैसे डाकू से वाल्मिकी जैसे रामायण लिखने वाले महान व्यक्ति समान माने जाते हैं। मनुष्य जीवन बड़ा ही अनमोल है, उसे ऐसे ही व्यर्थ कर्म कर व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। मनुष्यों की गलतियां ही उसे सही रूप में इंसान बना सकती है। केवल हमें उसकी गलतियों को स्वयं ही महसूस कर उसे बदलना है। भगवानभाई ने कहा कि यह कारागृह बंदियों के लिए तपस्थली है। इसमें एकांत में बैठकर स्वयं के बारे में सोचना है कि मै इस संसार में क्यों आया हूं, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, भगवान ने मुझे किस उद्देश्य से इस संसार में भेजा है और मैं यहां आकर क्या कर रहा हूं। उन्होंने बंदियों को इन बातों पर चिंतन कर बदला लेने की भावना की बजाय स्वयं को बदलने की पे्ररणा दी। स्थानीय ब्रह्माकुमारी राजयोग केंद्र की संचालिका बीके उमाबहन ने कहा कि हमें परमात्मा ने ये इंद्रियां दी है, उसका दुरुपयोग नहीं करना है। हम लोभ, लालच में आकर उसका दुरुपयोग करते हैं तो फिर अगले जन्म में ये इंद्रियां अधूरे रूप में होंगी। जेल अधीक्षक सुरेंद्रसिंह ने कहा कि जब हम अपना मनोबल कमजोर करते हैं तब हम अपने आप को आंतरिक रूप से अकेले महसूस करते हैं। मनोबल कमजोर होने से शांति, एकाग्रता भंग हो जाती है। कार्यक्रम में बीके भलाराम ने ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के बारे में जानकारी दी।
युवा कुसंगति व व्यसन त्यागें: भगवान भाई News Bhaskar 2010-02-07: भास्कर न्यूज. बालोतरा अखिल भारतीय शैक्षणिक अभियान के तहत राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय व राउमावि छात्र में शनिवार को व्यक्
युवा कुसंगति व व्यसन त्यागें: भगवान भाई
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Bhaskar 2010-02-07: भास्कर न्यूज. बालोतरा अखिल भारतीय शैक्षणिक अभियान के तहत राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय व राउमावि छात्र में शनिवार को व्यक्तित्व विकास विषयक संगोष्ठियों का.
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Bhaskar 2010-02-07: भास्कर न्यूज. बालोतरा अखिल भारतीय शैक्षणिक अभियान के तहत राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय व राउमावि छात्र में शनिवार को व्यक्तित्व विकास विषयक संगोष्ठियों का.
भास्कर न्यूज & आबूरोड प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय शांतिवन के भगवान भाई का नाम इंडिया बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज किया गया। यह सम्मान उन्हें पांच हजार स्कूलों के हजारों बच्चों को मूल्यनिष्ठ शिक्षा के जरिए
भास्कर न्यूज & आबूरोड
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय शांतिवन के भगवान भाई का नाम इंडिया बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज किया गया। यह सम्मान उन्हें पांच हजार स्कूलों के हजारों बच्चों को मूल्यनिष्ठ शिक्षा के जरिए नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए लगातार पढ़ाए जाने तथा आठ सौ जेलों के हजारों कैदियों से अपराध छोड़ अपने जीवन में सद्भावना, मूल्य तथा मानवता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित किए गए हजारों कार्यक्रमों के जरिए संदेश देने के अथक प्रयास के कारण मिला है।दिल्ली के कनॉट प्लेस में 22 अप्रैल को यह सर्टिफिकेट इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड के चीफ एडिटर विश्वरूप राय चौधरी की तरफ से आयोजित एक समारोह में दिया गया।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय शांतिवन के भगवान भाई का नाम इंडिया बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज किया गया। यह सम्मान उन्हें पांच हजार स्कूलों के हजारों बच्चों को मूल्यनिष्ठ शिक्षा के जरिए नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए लगातार पढ़ाए जाने तथा आठ सौ जेलों के हजारों कैदियों से अपराध छोड़ अपने जीवन में सद्भावना, मूल्य तथा मानवता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित किए गए हजारों कार्यक्रमों के जरिए संदेश देने के अथक प्रयास के कारण मिला है।दिल्ली के कनॉट प्लेस में 22 अप्रैल को यह सर्टिफिकेट इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड के चीफ एडिटर विश्वरूप राय चौधरी की तरफ से आयोजित एक समारोह में दिया गया।
ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्
सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले
ब्रह्माकुमार भगवानभाईंच्या नावाची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नोंद
ब्रह्माकुमार भगवानभाईंच्या नावाची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नोंद
ऐक्य समूह
Friday, September 16, 2011 AT 12:36 AM (IST)
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सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
फोटो गॅलरी
ऐक्य समूह
Friday, September 16, 2011 AT 12:36 AM (IST)
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सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
फोटो गॅलरी
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया
दिल्ली दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद
सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले
"इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी प्रजापिता ब्रह्माकुमारी
सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले
SHIVA RATRI
Shivaratri is the most important festival for the entire humanity because it signifies the incarnation of incorporeal God Shiva for re-establishing heaven on earth, On Shivaratri devout people in India observe fast which is symbolic of the purification of body and soul. People also keep awake the whole night, and this signifies the vigil against looting by dacoits who have looted human soul of its innate qualities of peace, purity, power, truth, love, happiness and bliss. People visit Shiva temples where they pour milk and water over the Shivlinga, the oval stone representing incorporeal God, Shiva. This offering is poured into a vessel suspended above the Linga, on which the fluid falls drop by drop, symbolizes the deep contemplation on Godly versions, one by one, by His children. Through this contemplation the souls not only get clarity on points of spiritual knowledge, but also the souls get purified. Such purification is very important for ensuring one's presence in the Golden Age which God re-establishes during the Auspicious Confluence Age that starts with the incarnation of God Shiva and lasts until the establishment of the Golden Age, whereby starting a new cycle of the 'Eternal World Drama'. Some people consume potions of Bhang, an intoxicating herb, and this practice signifies the spiritual intoxication of human souls during the Confluence Age. It is paradoxical that those who practice these rituals are usually unaware of the spiritual significance stated above, and hence are deprived of the full reward, I.e. Deity-hood in the Golden Age.
Let us now try to understand the correct spiritual significance of Shivaratri so that we can benefit fully from Godly knowledge that is available only during the Auspicious Confluence Age. First of all we have to understand that a human being is a combination of material body and nonmaterial soul, spirit, Atma, Rooh or psyche. The non-material soul does not belong to the material world where we live. It originally belongs to the soul-world called Brahmalok, Shanti Dham, Nirvan Dham or Mool Vatan in Hindi. It is also called incorporeal world because it is devoid of any matter that constitute corporeal forms. This realm is the farthest from the corporeal world, and is filled with Brahm, the golden red light which is sometimes called the sixth element. In this silence world dwells God Shiva, the Supreme Father along with His children - the human souls. The souls in Paramdham are devoid of the faculties of mind, intellect, and body, and hence there is no vibration of thought, speech or deed. That is why Supreme silence prevails here. Silence is the original attribute of the soul and hence every soul longs for peace. All great achievements of the human beings are attained through contemplation in silence.
Souls are made up of seven basic attributes - knowledge, peace, love, joy, purity, power and bliss. In fact these attributes are metaphysical energies and these come into play through the faculties of mind, intellect and personality traits, called Sanskaras in Hindi, when the soul is embodied in the corporeal world. The cosmic egg (Brahmand) is constituted by three worlds - the incorporeal world of souls and the Supreme Soul is the outer most and is referred to as the silence-world, the corporeal world of matter, sound and action- at the level of thought , speech and deed-is the inner most realm which is referred to as the 'movie-talky-world. In between these two is the subtle world where there is no matter and no sound and it is the realm of subtle deities - Brahma, Vishnu and Shankar who communicate through thought vibrations. The soul is metaphorically compared to an actor who plays his varied roles by getting embodied in the corporeal world. The body is his costume, planet earth is a revolving drama stage, the sun, moon and stars provide lighting for the stage, plants, flowers, animals and birds provide stage decoration. As this drama is eternal, the events in this drama have to repeat exactly after a period, which God has revealed to be only 5000 years.
That means, every 5000 years you will be reading the same article at the same time, date, month and year. In order to sustain such a huge drama eternally, enormous amount of energy is required, and as per the second law of thermodynamics, this energy source is bound to dwindle and come to a halt. The implication is that some external agency would be required in order to sustain the cycle of the world drama eternally, and this agency should be outside the physical world, where the 'Law of Entropy' is not operative. Hence it stands to reason that God only can be that agency who functions as the eternal source of energy. How is God able to do this? In order to understand the answer to the above question, we have to view the whole creation as an eternal interplay of three point-sources of energy, both physical and metaphysical.
God is the eternal generator of metaphysical energy, while souls are like batteries or point-sources of meta-physical energy, and atom is the point-source of physical energy. The eternal drama is an eternal interplay between these three energy sources. There is a general consensus among scientists and philosophers that when human consciousness (soul) gets localized in a body which is made of five gross elements of nature - earth, water, fire. air and space, former rules over the latter through its subtle energies of mind and intellect. Metaphorically, we may consider the body as a car and the soul as its driver. The soul localizes in the center of the brain, in between three endocrine glands - pituitary, pineal and hypothalamus. Sitting over here soul controls the body through the nervous and endocrine systems. For this the spiritual energy has to reach every cell of the body. Thus the embodied soul is bound to the 100 trillion cells of the body. Although the somatic cells are endowed with the faculty of life, by which they are able to multiply independent of the soul, when suitable biological environment is provided, they cannot function as an organ system in the absence of the regulatory role of the soul.
In fact God interferes directly with the world drama, only when the souls and atoms, through their interactions, deplete the 'available energy' and when the replenishment is urgently required, this critical situation is currently on since there is maximum entropy and consequent disorder and chaos in the world now. God, being the Creator, Director and Principal Actor of the eternal drama, appears on the drama stage by incarnating into the body of an aged person, and starts speaking Godly knowledge, revealing the secrets about soul, Supreme Soul, eternal world drama, law of Karma, and teach Rajyoga, the technology for recharging the soul by linking the self with the Supreme Soul, the eternal generator of spiritual powers. Once the required number of human souls gets transformed, from profane to divine, the transformation of the physical world takes place automatically. When the human beings become divine beings, the world of deities, the paradise on earth becomes a reality.
The celebration of Shivaratri is in remembrance of this benevolent act of God Shiva in each cycle (Kalpa) of the eternal world drama. The human medium used for this act of God has been renamed by Him as Prajapita Brahma, and he has been instrumental for establishing the Prajapita Brahma Kumaris Ishwariya Vishwa Vidyalaya which now has over 9000 branches in 132 countries in all the five continents. Godly knowledge and Rajyoga are taught in these institutions free of charge. From a humble beginning of a personal Satsang in 1937, at Hyderabad, Sindh Province (now in Pakistan), it has grown into a non-governmental organization (NGO) having consultative status with U.N. affiliates - UNICEF and ECOSOC. This institution is celebrating Shivaratri as 75th Shivajayanti this year by conducting various public functions for disseminating Godly knowledge to the public without any discrimination on the basis of caste, faith, age, gender, educational or social status. Let us all make use of their services for personal and universal transformation, and become partners in God's enterprise and thus ensure your presence in the forthcoming new world of spiritual and human values.
Let us now try to understand the correct spiritual significance of Shivaratri so that we can benefit fully from Godly knowledge that is available only during the Auspicious Confluence Age. First of all we have to understand that a human being is a combination of material body and nonmaterial soul, spirit, Atma, Rooh or psyche. The non-material soul does not belong to the material world where we live. It originally belongs to the soul-world called Brahmalok, Shanti Dham, Nirvan Dham or Mool Vatan in Hindi. It is also called incorporeal world because it is devoid of any matter that constitute corporeal forms. This realm is the farthest from the corporeal world, and is filled with Brahm, the golden red light which is sometimes called the sixth element. In this silence world dwells God Shiva, the Supreme Father along with His children - the human souls. The souls in Paramdham are devoid of the faculties of mind, intellect, and body, and hence there is no vibration of thought, speech or deed. That is why Supreme silence prevails here. Silence is the original attribute of the soul and hence every soul longs for peace. All great achievements of the human beings are attained through contemplation in silence.
Souls are made up of seven basic attributes - knowledge, peace, love, joy, purity, power and bliss. In fact these attributes are metaphysical energies and these come into play through the faculties of mind, intellect and personality traits, called Sanskaras in Hindi, when the soul is embodied in the corporeal world. The cosmic egg (Brahmand) is constituted by three worlds - the incorporeal world of souls and the Supreme Soul is the outer most and is referred to as the silence-world, the corporeal world of matter, sound and action- at the level of thought , speech and deed-is the inner most realm which is referred to as the 'movie-talky-world. In between these two is the subtle world where there is no matter and no sound and it is the realm of subtle deities - Brahma, Vishnu and Shankar who communicate through thought vibrations. The soul is metaphorically compared to an actor who plays his varied roles by getting embodied in the corporeal world. The body is his costume, planet earth is a revolving drama stage, the sun, moon and stars provide lighting for the stage, plants, flowers, animals and birds provide stage decoration. As this drama is eternal, the events in this drama have to repeat exactly after a period, which God has revealed to be only 5000 years.
That means, every 5000 years you will be reading the same article at the same time, date, month and year. In order to sustain such a huge drama eternally, enormous amount of energy is required, and as per the second law of thermodynamics, this energy source is bound to dwindle and come to a halt. The implication is that some external agency would be required in order to sustain the cycle of the world drama eternally, and this agency should be outside the physical world, where the 'Law of Entropy' is not operative. Hence it stands to reason that God only can be that agency who functions as the eternal source of energy. How is God able to do this? In order to understand the answer to the above question, we have to view the whole creation as an eternal interplay of three point-sources of energy, both physical and metaphysical.
God is the eternal generator of metaphysical energy, while souls are like batteries or point-sources of meta-physical energy, and atom is the point-source of physical energy. The eternal drama is an eternal interplay between these three energy sources. There is a general consensus among scientists and philosophers that when human consciousness (soul) gets localized in a body which is made of five gross elements of nature - earth, water, fire. air and space, former rules over the latter through its subtle energies of mind and intellect. Metaphorically, we may consider the body as a car and the soul as its driver. The soul localizes in the center of the brain, in between three endocrine glands - pituitary, pineal and hypothalamus. Sitting over here soul controls the body through the nervous and endocrine systems. For this the spiritual energy has to reach every cell of the body. Thus the embodied soul is bound to the 100 trillion cells of the body. Although the somatic cells are endowed with the faculty of life, by which they are able to multiply independent of the soul, when suitable biological environment is provided, they cannot function as an organ system in the absence of the regulatory role of the soul.
In fact God interferes directly with the world drama, only when the souls and atoms, through their interactions, deplete the 'available energy' and when the replenishment is urgently required, this critical situation is currently on since there is maximum entropy and consequent disorder and chaos in the world now. God, being the Creator, Director and Principal Actor of the eternal drama, appears on the drama stage by incarnating into the body of an aged person, and starts speaking Godly knowledge, revealing the secrets about soul, Supreme Soul, eternal world drama, law of Karma, and teach Rajyoga, the technology for recharging the soul by linking the self with the Supreme Soul, the eternal generator of spiritual powers. Once the required number of human souls gets transformed, from profane to divine, the transformation of the physical world takes place automatically. When the human beings become divine beings, the world of deities, the paradise on earth becomes a reality.
The celebration of Shivaratri is in remembrance of this benevolent act of God Shiva in each cycle (Kalpa) of the eternal world drama. The human medium used for this act of God has been renamed by Him as Prajapita Brahma, and he has been instrumental for establishing the Prajapita Brahma Kumaris Ishwariya Vishwa Vidyalaya which now has over 9000 branches in 132 countries in all the five continents. Godly knowledge and Rajyoga are taught in these institutions free of charge. From a humble beginning of a personal Satsang in 1937, at Hyderabad, Sindh Province (now in Pakistan), it has grown into a non-governmental organization (NGO) having consultative status with U.N. affiliates - UNICEF and ECOSOC. This institution is celebrating Shivaratri as 75th Shivajayanti this year by conducting various public functions for disseminating Godly knowledge to the public without any discrimination on the basis of caste, faith, age, gender, educational or social status. Let us all make use of their services for personal and universal transformation, and become partners in God's enterprise and thus ensure your presence in the forthcoming new world of spiritual and human values.
SHIVA RATRI
nificance Of SHIVA RATRI
Shivaratri is the most important festival for the entire humanity because it signifies the incarnation of incorporeal God Shiva for re-establishing heaven on earth, On Shivaratri devout people in India observe fast which is symbolic of the purification of body and soul. People also keep awake the whole night, and this signifies the vigil against looting by dacoits who have looted human soul of its innate qualities of peace, purity, power, truth, love, happiness and bliss. People visit Shiva temples where they pour milk and water over the Shivlinga, the oval stone representing incorporeal God, Shiva. This offering is poured into a vessel suspended above the Linga, on which the fluid falls drop by drop, symbolizes the deep contemplation on Godly versions, one by one, by His children. Through this contemplation the souls not only get clarity on points of spiritual knowledge, but also the souls get purified. Such purification is very important for ensuring one's presence in the Golden Age which God re-establishes during the Auspicious Confluence Age that starts with the incarnation of God Shiva and lasts until the establishment of the Golden Age, whereby starting a new cycle of the 'Eternal World Drama'. Some people consume potions of Bhang, an intoxicating herb, and this practice signifies the spiritual intoxication of human souls during the Confluence Age. It is paradoxical that those who practice these rituals are usually unaware of the spiritual significance stated above, and hence are deprived of the full reward, I.e. Deity-hood in the Golden Age.
Let us now try to understand the correct spiritual significance of Shivaratri so that we can benefit fully from Godly knowledge that is available only during the Auspicious Confluence Age. First of all we have to understand that a human being is a combination of material body and nonmaterial soul, spirit, Atma, Rooh or psyche. The non-material soul does not belong to the material world where we live. It originally belongs to the soul-world called Brahmalok, Shanti Dham, Nirvan Dham or Mool Vatan in Hindi. It is also called incorporeal world because it is devoid of any matter that constitute corporeal forms. This realm is the farthest from the corporeal world, and is filled with Brahm, the golden red light which is sometimes called the sixth element. In this silence world dwells God Shiva, the Supreme Father along with His children - the human souls. The souls in Paramdham are devoid of the faculties of mind, intellect, and body, and hence there is no vibration of thought, speech or deed. That is why Supreme silence prevails here. Silence is the original attribute of the soul and hence every soul longs for peace. All great achievements of the human beings are attained through contemplation in silence.
Souls are made up of seven basic attributes - knowledge, peace, love, joy, purity, power and bliss. In fact these attributes are metaphysical energies and these come into play through the faculties of mind, intellect and personality traits, called Sanskaras in Hindi, when the soul is embodied in the corporeal world. The cosmic egg (Brahmand) is constituted by three worlds - the incorporeal world of souls and the Supreme Soul is the outer most and is referred to as the silence-world, the corporeal world of matter, sound and action- at the level of thought , speech and deed-is the inner most realm which is referred to as the 'movie-talky-world. In between these two is the subtle world where there is no matter and no sound and it is the realm of subtle deities - Brahma, Vishnu and Shankar who communicate through thought vibrations. The soul is metaphorically compared to an actor who plays his varied roles by getting embodied in the corporeal world. The body is his costume, planet earth is a revolving drama stage, the sun, moon and stars provide lighting for the stage, plants, flowers, animals and birds provide stage decoration. As this drama is eternal, the events in this drama have to repeat exactly after a period, which God has revealed to be only 5000 years.
That means, every 5000 years you will be reading the same article at the same time, date, month and year. In order to sustain such a huge drama eternally, enormous amount of energy is required, and as per the second law of thermodynamics, this energy source is bound to dwindle and come to a halt. The implication is that some external agency would be required in order to sustain the cycle of the world drama eternally, and this agency should be outside the physical world, where the 'Law of Entropy' is not operative. Hence it stands to reason that God only can be that agency who functions as the eternal source of energy. How is God able to do this? In order to understand the answer to the above question, we have to view the whole creation as an eternal interplay of three point-sources of energy, both physical and metaphysical.
God is the eternal generator of metaphysical energy, while souls are like batteries or point-sources of meta-physical energy, and atom is the point-source of physical energy. The eternal drama is an eternal interplay between these three energy sources. There is a general consensus among scientists and philosophers that when human consciousness (soul) gets localized in a body which is made of five gross elements of nature - earth, water, fire. air and space, former rules over the latter through its subtle energies of mind and intellect. Metaphorically, we may consider the body as a car and the soul as its driver. The soul localizes in the center of the brain, in between three endocrine glands - pituitary, pineal and hypothalamus. Sitting over here soul controls the body through the nervous and endocrine systems. For this the spiritual energy has to reach every cell of the body. Thus the embodied soul is bound to the 100 trillion cells of the body. Although the somatic cells are endowed with the faculty of life, by which they are able to multiply independent of the soul, when suitable biological environment is provided, they cannot function as an organ system in the absence of the regulatory role of the soul.
In fact God interferes directly with the world drama, only when the souls and atoms, through their interactions, deplete the 'available energy' and when the replenishment is urgently required, this critical situation is currently on since there is maximum entropy and consequent disorder and chaos in the world now. God, being the Creator, Director and Principal Actor of the eternal drama, appears on the drama stage by incarnating into the body of an aged person, and starts speaking Godly knowledge, revealing the secrets about soul, Supreme Soul, eternal world drama, law of Karma, and teach Rajyoga, the technology for recharging the soul by linking the self with the Supreme Soul, the eternal generator of spiritual powers. Once the required number of human souls gets transformed, from profane to divine, the transformation of the physical world takes place automatically. When the human beings become divine beings, the world of deities, the paradise on earth becomes a reality.
The celebration of Shivaratri is in remembrance of this benevolent act of God Shiva in each cycle (Kalpa) of the eternal world drama. The human medium used for this act of God has been renamed by Him as Prajapita Brahma, and he has been instrumental for establishing the Prajapita Brahma Kumaris Ishwariya Vishwa Vidyalaya which now has over 9000 branches in 132 countries in all the five continents. Godly knowledge and Rajyoga are taught in these institutions free of charge. From a humble beginning of a personal Satsang in 1937, at Hyderabad, Sindh Province (now in Pakistan), it has grown into a non-governmental organization (NGO) having consultative status with U.N. affiliates - UNICEF and ECOSOC. This institution is celebrating Shivaratri as 75th Shivajayanti this year by conducting various public functions for disseminating Godly knowledge to the public without any discrimination on the basis of caste, faith, age, gender, educational or social status. Let us all make use of their services for personal and universal transformation, and become partners in God's enterprise and thus ensure your presence in the forthcoming new world of spiritual and human values.
Shivaratri is the most important festival for the entire humanity because it signifies the incarnation of incorporeal God Shiva for re-establishing heaven on earth, On Shivaratri devout people in India observe fast which is symbolic of the purification of body and soul. People also keep awake the whole night, and this signifies the vigil against looting by dacoits who have looted human soul of its innate qualities of peace, purity, power, truth, love, happiness and bliss. People visit Shiva temples where they pour milk and water over the Shivlinga, the oval stone representing incorporeal God, Shiva. This offering is poured into a vessel suspended above the Linga, on which the fluid falls drop by drop, symbolizes the deep contemplation on Godly versions, one by one, by His children. Through this contemplation the souls not only get clarity on points of spiritual knowledge, but also the souls get purified. Such purification is very important for ensuring one's presence in the Golden Age which God re-establishes during the Auspicious Confluence Age that starts with the incarnation of God Shiva and lasts until the establishment of the Golden Age, whereby starting a new cycle of the 'Eternal World Drama'. Some people consume potions of Bhang, an intoxicating herb, and this practice signifies the spiritual intoxication of human souls during the Confluence Age. It is paradoxical that those who practice these rituals are usually unaware of the spiritual significance stated above, and hence are deprived of the full reward, I.e. Deity-hood in the Golden Age.
Let us now try to understand the correct spiritual significance of Shivaratri so that we can benefit fully from Godly knowledge that is available only during the Auspicious Confluence Age. First of all we have to understand that a human being is a combination of material body and nonmaterial soul, spirit, Atma, Rooh or psyche. The non-material soul does not belong to the material world where we live. It originally belongs to the soul-world called Brahmalok, Shanti Dham, Nirvan Dham or Mool Vatan in Hindi. It is also called incorporeal world because it is devoid of any matter that constitute corporeal forms. This realm is the farthest from the corporeal world, and is filled with Brahm, the golden red light which is sometimes called the sixth element. In this silence world dwells God Shiva, the Supreme Father along with His children - the human souls. The souls in Paramdham are devoid of the faculties of mind, intellect, and body, and hence there is no vibration of thought, speech or deed. That is why Supreme silence prevails here. Silence is the original attribute of the soul and hence every soul longs for peace. All great achievements of the human beings are attained through contemplation in silence.
Souls are made up of seven basic attributes - knowledge, peace, love, joy, purity, power and bliss. In fact these attributes are metaphysical energies and these come into play through the faculties of mind, intellect and personality traits, called Sanskaras in Hindi, when the soul is embodied in the corporeal world. The cosmic egg (Brahmand) is constituted by three worlds - the incorporeal world of souls and the Supreme Soul is the outer most and is referred to as the silence-world, the corporeal world of matter, sound and action- at the level of thought , speech and deed-is the inner most realm which is referred to as the 'movie-talky-world. In between these two is the subtle world where there is no matter and no sound and it is the realm of subtle deities - Brahma, Vishnu and Shankar who communicate through thought vibrations. The soul is metaphorically compared to an actor who plays his varied roles by getting embodied in the corporeal world. The body is his costume, planet earth is a revolving drama stage, the sun, moon and stars provide lighting for the stage, plants, flowers, animals and birds provide stage decoration. As this drama is eternal, the events in this drama have to repeat exactly after a period, which God has revealed to be only 5000 years.
That means, every 5000 years you will be reading the same article at the same time, date, month and year. In order to sustain such a huge drama eternally, enormous amount of energy is required, and as per the second law of thermodynamics, this energy source is bound to dwindle and come to a halt. The implication is that some external agency would be required in order to sustain the cycle of the world drama eternally, and this agency should be outside the physical world, where the 'Law of Entropy' is not operative. Hence it stands to reason that God only can be that agency who functions as the eternal source of energy. How is God able to do this? In order to understand the answer to the above question, we have to view the whole creation as an eternal interplay of three point-sources of energy, both physical and metaphysical.
God is the eternal generator of metaphysical energy, while souls are like batteries or point-sources of meta-physical energy, and atom is the point-source of physical energy. The eternal drama is an eternal interplay between these three energy sources. There is a general consensus among scientists and philosophers that when human consciousness (soul) gets localized in a body which is made of five gross elements of nature - earth, water, fire. air and space, former rules over the latter through its subtle energies of mind and intellect. Metaphorically, we may consider the body as a car and the soul as its driver. The soul localizes in the center of the brain, in between three endocrine glands - pituitary, pineal and hypothalamus. Sitting over here soul controls the body through the nervous and endocrine systems. For this the spiritual energy has to reach every cell of the body. Thus the embodied soul is bound to the 100 trillion cells of the body. Although the somatic cells are endowed with the faculty of life, by which they are able to multiply independent of the soul, when suitable biological environment is provided, they cannot function as an organ system in the absence of the regulatory role of the soul.
In fact God interferes directly with the world drama, only when the souls and atoms, through their interactions, deplete the 'available energy' and when the replenishment is urgently required, this critical situation is currently on since there is maximum entropy and consequent disorder and chaos in the world now. God, being the Creator, Director and Principal Actor of the eternal drama, appears on the drama stage by incarnating into the body of an aged person, and starts speaking Godly knowledge, revealing the secrets about soul, Supreme Soul, eternal world drama, law of Karma, and teach Rajyoga, the technology for recharging the soul by linking the self with the Supreme Soul, the eternal generator of spiritual powers. Once the required number of human souls gets transformed, from profane to divine, the transformation of the physical world takes place automatically. When the human beings become divine beings, the world of deities, the paradise on earth becomes a reality.
The celebration of Shivaratri is in remembrance of this benevolent act of God Shiva in each cycle (Kalpa) of the eternal world drama. The human medium used for this act of God has been renamed by Him as Prajapita Brahma, and he has been instrumental for establishing the Prajapita Brahma Kumaris Ishwariya Vishwa Vidyalaya which now has over 9000 branches in 132 countries in all the five continents. Godly knowledge and Rajyoga are taught in these institutions free of charge. From a humble beginning of a personal Satsang in 1937, at Hyderabad, Sindh Province (now in Pakistan), it has grown into a non-governmental organization (NGO) having consultative status with U.N. affiliates - UNICEF and ECOSOC. This institution is celebrating Shivaratri as 75th Shivajayanti this year by conducting various public functions for disseminating Godly knowledge to the public without any discrimination on the basis of caste, faith, age, gender, educational or social status. Let us all make use of their services for personal and universal transformation, and become partners in God's enterprise and thus ensure your presence in the forthcoming new world of spiritual and human values.
दैनिक भास्कर से खास मुलाकात करते हुए बीके भगवान भाई ने बताया कि
दैनिक भास्कर से खास मुलाकात करते हुए बीके भगवान भाई ने बताया कि व्यक्ति का दुश्मन व्यक्ति नहीं है। मनुष्य के भीतर बसी बुराइयां उसकी दुश्मन हैं। कर्म ही शत्रु हैं और वहीं मित्र हैं। हमारे साथ जो कुछ भी होता है वह भले के लिए ही होता है, कल्याणकारी होता है। भीतरी बुराइयों को दूर करने के लिए इंद्रियों पर संयम रखना सीखें। भगवान भाई ने अपने जीवन के रहस्य खोलते हुए कहा कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, जिसके चलते 11 साल की उम्र तक वे स्कूल नहीं गए। पढऩे की ललक होने के कारण गांव के स्कूल पहुंचे तो उन्हें टीचर्स ने कक्षा 5वीं में बैठाया। उन्होंने 5वीं से ही पढऩा शुरू किया। दुकानदार से पुरानी लिखी डायरियां लाकर पानी से साफ कर वे फिर इसका इस्तेमाल करते थे, ऐसे में एक दिन ब्रह्माकुमारी संस्था की डायरी हाथ लगी, जिससे पढ़कर वे काफी प्रभावित हुए। मुसाफिरों को पानी बेचकर 10 रुपए कमाए और माउंटआबू संस्था को भेजकर राजयोग की जानकारी मंगाई। पढऩे के बाद से जीवन में बदलाव आ गया और वे पूरी तरह संस्था के लिए समर्पित हो गए। 3000 से अधिक विषयों पर वे लेख लिख चुके हैं, जो हिंदी ज्ञानामृत, अंग्रेजी-द वल्र्ड रिनिवल, मराठी-अमृत कुंभ, उडिय़ा-ज्ञानदर्पण में छपते रहते हैं। इसके साथ ही वीडियो क्लासेस, ब्लॉग्स द्वारा ईश्वरीय संदेश देते हैं।
नैतिक शिक्षा से बनेगा सौहार्दपूर्ण समाज
बीके भगवान 1987 से भारत के विभिन्न प्रांतों में जाकर हजारों स्कूली बच्चों व जेलों में बंद कैदियों में मानवता का बीज बोते रहे। मिडिल व हाईस्कूलों के अलावा कॉलेज, आईटीआई सहित कई संस्थाओं में उनके आह्वान पर युवा अध्यात्म की राह पर चल पड़े हैं। अपने मिशन को सफलता दिलाने के लिए उन्होंने पदयात्रा, मोटरसाइकिल व साइकिल यात्रा सहित शिक्षा अभियान, ग्राम विकास अभियान कार्यक्रम संचालित किए। बीके भगवान भाई के अनुसार अगर समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, कुरीतियां, बुराइयां, व्यसन,नशा को समाप्त करना है तो स्कूलों में शिक्षा में परिवर्तन करने होंगे।
नैतिक शिक्षा --राजयोगी भगवानभाई
बीके भगवान 1987 से भारत के विभिन्न प्रांतों में जाकर हजारों स्कूली बच्चों व जेलों में बंद कैदियों में मानवता का बीज बोते रहे। मिडिल व हाईस्कूलों के अलावा कॉलेज, आईटीआई सहित कई संस्थाओं में उनके आह्वान पर युवा अध्यात्म की राह पर चल पड़े हैं। अपने मिशन को सफलता दिलाने के लिए उन्होंने पदयात्रा, मोटरसाइकिल व साइकिल यात्रा सहित शिक्षा अभियान, ग्राम विकास अभियान कार्यक्रम संचालित किए। बीके भगवान भाई के अनुसार अगर समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, कुरीतियां, बुराइयां, व्यसन,नशा को समाप्त करना है तो स्कूलों में शिक्षा में परिवर्तन करने होंगे।
भगवान भाई ने अपने जीवन के रहस्य खोलते हुए कहा कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, जिसके चलते 11 साल की उम्र तक वे स्कूल नहीं गए। पढऩे की ललक होने के कारण गांव के स्कूल पहुंचे तो उन्हें टीचर्स ने कक्षा 5वीं में बैठाया। उन्होंने 5वीं से ही पढऩा शुरू किया। दुकानदार से पुरानी लिखी डायरियां लाकर पानी से साफ कर वे फिर इसका इस्तेमाल करते थे, ऐसे में एक दिन ब्रह्माकुमारी संस्था की डायरी हाथ लगी, जिससे पढ़कर वे काफी प्रभावित हुए। मुसाफिरों को पानी बेचकर 10 रुपए कमाए और माउंटआबू संस्था को भेजकर राजयोग की जानकारी मंगाई। पढऩे के बाद से जीवन में बदलाव आ गया और वे पूरी तरह संस्था के लिए समर्पित हो गए। 3000 से अधिक विषयों पर वे लेख लिख चुके हैं, जो हिंदी ज्ञानामृत, अंग्रेजी-द वल्र्ड रिनिवल, मराठी-अमृत कुंभ, उडिय़ा-ज्ञानदर्पण में छपते रहते हैं। इसके साथ ही वीडियो क्लासेस, ब्लॉग्स द्वारा ईश्वरीय संदेश देते हैं।
नैतिक शिक्षा से बनेगा सौहार्दपूर्ण समाज
कटनी। आज हम विकसित देशों की श्रेणी में खड़े होने का भरपूर प्रयास कर रहे है। इसके साथ सफलता भी मिल रही है। परंतु समाज में फैल रही दुर्भावना और हिंसा चिंता का सबब बनती जा रही है। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्तिगत स्तर पर सकारात्मक आंतरिक चेतना के विकास को महत्व दिया जाए। उक्त उद्गार प्रजापति ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के पूरे भारत में 5 हजार स्कूल में नैतिक शिक्षा का अलख जगाकर इंडिया बुक आॅफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाले राजयोगी डायमंड इंग्लिश उच्च माध्यमिक विद्यालय माधव नगर के विद्यार्थियों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व विषय पर संबोधित करते हुए राजयोगी भगवानभाई ने कहा कि आज समाज, देश व विश्व की क्या स्थिति है इसके बारे में हम अच्छी तरह जानते है कि केवल भौतिक विकास से ही हमारा सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता। नैतिक विकास से समाज और परिवार में मूल्य विकसित होते है। इससे ही पारिवारिक सामाजिक और वैश्विक स्तर पर संपूर्ण रूप से विकसित हो सकेंगे। उन्होंने आगे बताया कि आज जितना हम विकास पर ध्यान रखेंगे अपने आंतरिक शक्तियों को जागृत करेंगे उतना युवाओं सशक्तिकरण आएगा। युवाओं को अपने शक्तियां रचनात्मक कार्य में लगाये। उन्होंने कहा कि यदि अपराधमुक्त समाज चाहित तो मानवीय, नैतिक शिक्षा द्वारा संस्कारित युवाओं की निर्मित करे। इसके लिए युवाओं को आगे आना चाहिए। उन्होंने युवाओं को आंतरिक रूप से सशक्त होकर लोगों की सेवा करने के लिए आगे जाने का आव्हान किया।
नैतिक शिक्षा --राजयोगी भगवानभाई
बीके भगवान 1987 से भारत के विभिन्न प्रांतों में जाकर हजारों स्कूली बच्चों व जेलों में बंद कैदियों में मानवता का बीज बोते रहे। मिडिल व हाईस्कूलों के अलावा कॉलेज, आईटीआई सहित कई संस्थाओं में उनके आह्वान पर युवा अध्यात्म की राह पर चल पड़े हैं। अपने मिशन को सफलता दिलाने के लिए उन्होंने पदयात्रा, मोटरसाइकिल व साइकिल यात्रा सहित शिक्षा अभियान, ग्राम विकास अभियान कार्यक्रम संचालित किए। बीके भगवान भाई के अनुसार अगर समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, कुरीतियां, बुराइयां, व्यसन,नशा को समाप्त करना है तो स्कूलों में शिक्षा में परिवर्तन करने होंगे।
भगवान भाई ने अपने जीवन के रहस्य खोलते हुए कहा कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, जिसके चलते 11 साल की उम्र तक वे स्कूल नहीं गए। पढऩे की ललक होने के कारण गांव के स्कूल पहुंचे तो उन्हें टीचर्स ने कक्षा 5वीं में बैठाया। उन्होंने 5वीं से ही पढऩा शुरू किया। दुकानदार से पुरानी लिखी डायरियां लाकर पानी से साफ कर वे फिर इसका इस्तेमाल करते थे, ऐसे में एक दिन ब्रह्माकुमारी संस्था की डायरी हाथ लगी, जिससे पढ़कर वे काफी प्रभावित हुए। मुसाफिरों को पानी बेचकर 10 रुपए कमाए और माउंटआबू संस्था को भेजकर राजयोग की जानकारी मंगाई। पढऩे के बाद से जीवन में बदलाव आ गया और वे पूरी तरह संस्था के लिए समर्पित हो गए। 3000 से अधिक विषयों पर वे लेख लिख चुके हैं, जो हिंदी ज्ञानामृत, अंग्रेजी-द वल्र्ड रिनिवल, मराठी-अमृत कुंभ, उडिय़ा-ज्ञानदर्पण में छपते रहते हैं। इसके साथ ही वीडियो क्लासेस, ब्लॉग्स द्वारा ईश्वरीय संदेश देते हैं।
नैतिक शिक्षा से बनेगा सौहार्दपूर्ण समाज
कटनी। आज हम विकसित देशों की श्रेणी में खड़े होने का भरपूर प्रयास कर रहे है। इसके साथ सफलता भी मिल रही है। परंतु समाज में फैल रही दुर्भावना और हिंसा चिंता का सबब बनती जा रही है। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्तिगत स्तर पर सकारात्मक आंतरिक चेतना के विकास को महत्व दिया जाए। उक्त उद्गार प्रजापति ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के पूरे भारत में 5 हजार स्कूल में नैतिक शिक्षा का अलख जगाकर इंडिया बुक आॅफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाले राजयोगी डायमंड इंग्लिश उच्च माध्यमिक विद्यालय माधव नगर के विद्यार्थियों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व विषय पर संबोधित करते हुए राजयोगी भगवानभाई ने कहा कि आज समाज, देश व विश्व की क्या स्थिति है इसके बारे में हम अच्छी तरह जानते है कि केवल भौतिक विकास से ही हमारा सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता। नैतिक विकास से समाज और परिवार में मूल्य विकसित होते है। इससे ही पारिवारिक सामाजिक और वैश्विक स्तर पर संपूर्ण रूप से विकसित हो सकेंगे। उन्होंने आगे बताया कि आज जितना हम विकास पर ध्यान रखेंगे अपने आंतरिक शक्तियों को जागृत करेंगे उतना युवाओं सशक्तिकरण आएगा। युवाओं को अपने शक्तियां रचनात्मक कार्य में लगाये। उन्होंने कहा कि यदि अपराधमुक्त समाज चाहित तो मानवीय, नैतिक शिक्षा द्वारा संस्कारित युवाओं की निर्मित करे। इसके लिए युवाओं को आगे आना चाहिए। उन्होंने युवाओं को आंतरिक रूप से सशक्त होकर लोगों की सेवा करने के लिए आगे जाने का आव्हान किया।
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