मनुष्य के ८४ जन्मो की अदभुत कहानी
मनुष्यात्मा सारे कल्प में अधिक से अधि कुल ८४ जन्म लेती है, वह ८४ लाख योनियों में पुनर्जन्म नहीं लेती है मनुष्यात्माओ के ८४ जन्मो के चक्र को ही यहाँ ८४ सीडियों के रूप में चित्रित किया गया है I चूँकि प्रजापिता ब्रह्मा और जगदम्बा सरस्वती मनुष्य समाज के अदि-पिता और अदि-माता है, इसलिए उनके ८४ जन्मो का सन्क्शिओत उल्लेख करने से अन्य म्नुश्यात्माओ का भी उनके अंतर्गत आ जायेगा हम यह तो बता आये है कि ब्रह्मा और सरस्वती संगम युग में परमपिता शिव के ज्ञान और योग द्वारा आरंभ में श्री नारायण और श्री लक्ष्मी पद पाते है
सतयुग और त्रेतायुग में २१ जन्म पूज्य देव पद : अब चित्र में दिखलाया गया है कि सतयुग के १२५० वेर्शो में श्रीलक्ष्मी, श्रीनारायण १०० प्रतिशत सुख शांति संपन्न ८ जन्म लेते है इसलिए भारत में ८ की संख्या शुभ मानी गयी है और कई लोग केवल ८ मनको की माला सिमरते है तथा अष्ट देवताओ का पूजन भी करते है पूज्य स्थिति वाले इन ८ नारायणी जन्मो को यहाँ ८ सीडियो के रूप में चित्रित किया गया है फिर त्रेतायुग के १२५० वर्षो में १४ कला सम्पूर्ण सीता और रामचंद्र के वंश में पूज्य रजा-रानी अथवा उच्च प्रजा के रूप में कुल १२ या १३ जन्म लेते है इस प्रकार सतयुग और त्रेतायुग के २५०० वर्षो में सम्पूर्ण पवित्रता, सुख, शांति और स्वास्थ्य संपन्न २१ दैवी जन्म लेते है इसलिए ही प्रसिद्द है की ज्ञान द्वारा मनुष्य २१ जन्म अथवा २१ पीडिया सुधर जाती है अथवा मनुष्य २१ पीड़ियो के लिए तर जाता है I
द्वापर और कलियुग में कुल ६३ जन्म जीवन-बद्ध : फिर सुख की प्रारब्ध समाप्त होने के बाद, वे द्वापर के आरम्भ में पुजारी स्थिति को प्राप्त होते है सबसे पहले तो निराकार परमपिता परमातम शिव को हीरे की प्रतिमा बनाकर अनन्य भावना से उसकी पूजा करते है यहाँ चित्र में उन्हें एक पुजारी राजा के रूप में शिव-पूजा करते दिखाया गया है I धीरे-धीरे वे सूक्ष्म देवताओ, अर्थात विष्णु तथा शंकर की भी पूजा शुरू करते है बाद में अज्यनता तथा आत्म-विस्मृति के कारण वे अपने ही पहले वाले श्री नारायण तथा श्री लक्ष्मी रूप की भी पूजा शुरू कर देते है I इसलिए, कहावत प्रसिद्द है कि "जो स्वयं कभी पूज्य थे, बाद में वे अपने- आप ही के पुजारी बन गए श्री लक्ष्मी और श्री नारायण कि आत्माओं ने स्वपर्युग के १२५० वर्षो में इसी पुजारी स्थिति में भिन्न-भिन्न नाम-रूप से, वैश्य-वंशी भक्त-शिरोमणि राजा,रानी अथवा सुखी प्रजा के रूप में कुल २१ जन्म लिए I
इसके बाद कलियुग का आरम्भ हुआ अब तो सूक्ष्म लोक तथा साकार लोक के देवी-देवताओ कि पूजा इत्यादि के अतिरिक्त तत्व पूजा भी शुरू हो गई इस प्रकार, भक्ति भी व्यभिचारी हो गई यह अवस्था सृष्टि की तमोप्रधन अथवा शुद्र अवस्था थी इस काल में काम, क्रोध,मोह,लोभ और अहंकार उग्र - रूप धारण करते चले गए कलियुग के अंत में उन्होंने तथा उनके वंश के दुसरे लोगो ने कुल ४२ जन्म लिए I
उपर्युक्त से स्पष्ट है की कुल ५००० वर्षो में उनकी आत्मा पूज्य और पुजारी अवस्था में कुल ८४ जन्म लेती है अब वह पुराणी, पतित दुनिया में ८३ जन्म ले चुकी है I अब उनके अंतिम अर्थात ८४वे जन्म की वानप्रस्थ अवस्था में, परमपिता परमपिता शिव ने उनका नाम "प्रजापिता ब्रह्मा" तथा उनकी मुख -वंशी कन्या का नाम "जगदम्बा सरस्वती" रखा है इस प्रकार, देवता-वंश की अन्य आत्माए भी ५००० वर्ष में अधिकाधिक ८४ जन्म लेती है I इसलिए भारत में जन्म-मरण के चक्र को " चौरासी का चक्कर" भी कहते है और कई देवियों के मन्दिरों में ८४ घंटे भी लगे होते है तथा उन्हें " ८४ घंटे वाली देवी" नाम से लोग याद करते है
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