मनुष्यात्मा ८४ लाख योनियाँ धारण नही करती
परमपिता परमात्मा शिव ने वर्तमान समय जैसे हमें ईश्वरीय ज्ञान के अन्य अनेक मधुर रहस्य समझाए है, वैसे ही यह भी एक नई बात समझाई है की वास्तव में मनुष्यात्मा पाशविक योनियों में जन्म नही लेती यह हमारे लिए बड़ी ही ख़ुशी की बात है I परन्तु फिर भी कई एसे लोग है जो यह कहते है कि मनुष्यात्मा, पशु , पक्षी इत्यादि ८४ लाख योनियों में जन्म-पुनर्जन्म लेती है I
वे कहते है कि -" जैसे किसी देश की सरकार अपराधी को दंड देने के लिए उसकी स्वतंत्रता को छीन लेती है और उसे एक कोठरी में बंद कर देती है I और उसे सुख सुविधा से कुछ काल के लिए वंचित कर देती है, वैसे ही यदि मनुष्य कोई बुरे कर्म करता है तो उसे उसके दंड के रूप में पशु, पक्षी इत्यादि, भोग योनियों में दुःख तथा परतंत्रता भोगनी पड़ती है" I
परन्तु अब परमपिता परमात्मा शिव ने समझाया है कि मनुष्यात्माये अपने बुरे कर्मो का दंड मनुष्य-योनी में ही भोगती है I परमात्मा कहते है कि मनुष्य बुरे गुण-कर्म-स्वभाव के कारण पशु से भी अधिक बुरा तो बन ही जाता है और पशु पक्षी से अधिक दुखी भी होता है, परन्तु वह पशु,पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म नही लेता यह तो हम देखते सुनते भी है कि मनुष्य, गूंगे, अंधे, बहरे, लंगड़े,, कोढ़ी चिर-रोगी तथा कंगाल होते है, यह भी हम देखते है कि कई पशु भी मनुष्यों से अधिक स्वतंत्र तथा सुखी होते है, उन्हें डबल रोटी तथा मक्खन खिलाया जाता है, सोफे पर सुलाया जाता है, मोटर कार में यात्रा कराई जाती है और बहुत ही प्यार और प्रेम से पला जाता है परन्तु इसे कितने ही मनुष्य संसार में है जो भूखे और अर्धनग्न जीवन व्यतीत करते है और जब वे पैसा या दो पैसा मांगने के लिए मनुष्यों के आगे हाथ फैलाते है तो अन्य मनुष्य उनहे अपमानित करते है कितने ही मनुष्य है जो सर्दी में ठिठुर कर, अथवा रोगियों कि हालत में सड़क कि पटरियों पर कुत्ते से भी बुरी मौत मर जाते है I और कितने ही मनुष्य तो अत्यंत वेदना और दुःख के वश अपने ही हाथो अपने आपको मर डालते है I अत: जब हम स्पष्ट देखते है कि मनुष्य योनी भी भोग योनी है और कि मनुष्य योनी में मानुष पशुओं से भी अधिक दुखी हो सकता है तो यह क्यों माना जाये कि मनुष्यात्मा को पशु-पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म लेना पड़ता है ?
जैसा बीज वैसा वृक्ष :
इसके अतिरिक्त, हरेक मनुष्यात्मा में अपने जन्म-जन्मान्तर का पार्ट अनादी काल से अव्यक्त रूप से भरा हुआ है और, इसीलिए. मनुष्यात्माए अनादी काल से परस्पर भिन्न-भिन्न गुण, कर्म, स्वभाव से अनादी काल से भिन्न है I अत: जैसे आम की गुठली में मिर्च पैदा नही हो सकती बल्कि "जैसा बीज वैसा ही वृक्ष होता है" ठीक वैसे ही मनुष्यात्माओ कि श्रेणी तो अलग ही है I मनुष्यात्माए पशु-पक्षी अदि ८४ लाख योनियों में जन्म नही लेती बल्कि मनुष्यात्माए सारे कल्प में मनुष्य योनी में ही अधिक से अधिक ८४ जन्म, पुनर्जन्म लेकर अपने-अपने कर्मो के अनुरूप सुख दुःख भोगती है I
यदि मनुष्यात्मा पशु योनी में पुनर्जन्म लेती तो मनुष्य गणना बढती न जाती:
आप स्वयं ही सोचिये कि यदि बुरे कर्मो के कारण मनुष्यात्मा का जन्म पशु योनी में होता, तब तो हर वर्ष मानुष-गणना बढती न जाती, बल्कि घटती जाती क्योंकि आज सभी के कर्म, विकारो के कारण विकर्म बन रहे है I परन्तु आप देखते है कि फिर भी मनुष्य गणना बढती ही जाती है क्योंकि मनुष्य पशु-पक्षी या कीट पतंग आदि योनियों में पुनर्जन्म नही ले रहे है I
वे कहते है कि -" जैसे किसी देश की सरकार अपराधी को दंड देने के लिए उसकी स्वतंत्रता को छीन लेती है और उसे एक कोठरी में बंद कर देती है I और उसे सुख सुविधा से कुछ काल के लिए वंचित कर देती है, वैसे ही यदि मनुष्य कोई बुरे कर्म करता है तो उसे उसके दंड के रूप में पशु, पक्षी इत्यादि, भोग योनियों में दुःख तथा परतंत्रता भोगनी पड़ती है" I
परन्तु अब परमपिता परमात्मा शिव ने समझाया है कि मनुष्यात्माये अपने बुरे कर्मो का दंड मनुष्य-योनी में ही भोगती है I परमात्मा कहते है कि मनुष्य बुरे गुण-कर्म-स्वभाव के कारण पशु से भी अधिक बुरा तो बन ही जाता है और पशु पक्षी से अधिक दुखी भी होता है, परन्तु वह पशु,पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म नही लेता यह तो हम देखते सुनते भी है कि मनुष्य, गूंगे, अंधे, बहरे, लंगड़े,, कोढ़ी चिर-रोगी तथा कंगाल होते है, यह भी हम देखते है कि कई पशु भी मनुष्यों से अधिक स्वतंत्र तथा सुखी होते है, उन्हें डबल रोटी तथा मक्खन खिलाया जाता है, सोफे पर सुलाया जाता है, मोटर कार में यात्रा कराई जाती है और बहुत ही प्यार और प्रेम से पला जाता है परन्तु इसे कितने ही मनुष्य संसार में है जो भूखे और अर्धनग्न जीवन व्यतीत करते है और जब वे पैसा या दो पैसा मांगने के लिए मनुष्यों के आगे हाथ फैलाते है तो अन्य मनुष्य उनहे अपमानित करते है कितने ही मनुष्य है जो सर्दी में ठिठुर कर, अथवा रोगियों कि हालत में सड़क कि पटरियों पर कुत्ते से भी बुरी मौत मर जाते है I और कितने ही मनुष्य तो अत्यंत वेदना और दुःख के वश अपने ही हाथो अपने आपको मर डालते है I अत: जब हम स्पष्ट देखते है कि मनुष्य योनी भी भोग योनी है और कि मनुष्य योनी में मानुष पशुओं से भी अधिक दुखी हो सकता है तो यह क्यों माना जाये कि मनुष्यात्मा को पशु-पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म लेना पड़ता है ?
जैसा बीज वैसा वृक्ष :
इसके अतिरिक्त, हरेक मनुष्यात्मा में अपने जन्म-जन्मान्तर का पार्ट अनादी काल से अव्यक्त रूप से भरा हुआ है और, इसीलिए. मनुष्यात्माए अनादी काल से परस्पर भिन्न-भिन्न गुण, कर्म, स्वभाव से अनादी काल से भिन्न है I अत: जैसे आम की गुठली में मिर्च पैदा नही हो सकती बल्कि "जैसा बीज वैसा ही वृक्ष होता है" ठीक वैसे ही मनुष्यात्माओ कि श्रेणी तो अलग ही है I मनुष्यात्माए पशु-पक्षी अदि ८४ लाख योनियों में जन्म नही लेती बल्कि मनुष्यात्माए सारे कल्प में मनुष्य योनी में ही अधिक से अधिक ८४ जन्म, पुनर्जन्म लेकर अपने-अपने कर्मो के अनुरूप सुख दुःख भोगती है I
यदि मनुष्यात्मा पशु योनी में पुनर्जन्म लेती तो मनुष्य गणना बढती न जाती:
आप स्वयं ही सोचिये कि यदि बुरे कर्मो के कारण मनुष्यात्मा का जन्म पशु योनी में होता, तब तो हर वर्ष मानुष-गणना बढती न जाती, बल्कि घटती जाती क्योंकि आज सभी के कर्म, विकारो के कारण विकर्म बन रहे है I परन्तु आप देखते है कि फिर भी मनुष्य गणना बढती ही जाती है क्योंकि मनुष्य पशु-पक्षी या कीट पतंग आदि योनियों में पुनर्जन्म नही ले रहे है I
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