Saturday, November 12, 2011

सृष्टि रूपी उल्टा व् अदभुत वृक्ष और उसके बीजरूप परमात्मा भगवान ने इस सृष्टि रूपी वृक्ष की तुलना एक उल्टे वृक्ष से की है क्योंकि अन्य

सृष्टि रूपी उल्टा व् अदभुत वृक्ष और उसके बीजरूप परमात्मा
भगवान ने इस सृष्टि रूपी वृक्ष की तुलना एक उल्टे वृक्ष से की है क्योंकि अन्य वृक्षों के बीज तो पृथ्वी के अन्दर बोये जाते है और वृक्ष ऊपर को उगते है I परन्तु मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष के जो अविनाशी और चेतन बीज रूप परमपिता परमात्मा शिव है, वह स्वयं उपर परमधाम अथवा ब्रह्मलोक में निवास करते है I
चित्र में सबसे निचे कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ का संगम दिखलाया गया है I वहां श्वेत-वस्त्रधारी प्रजापिता ब्रह्मा, जगदम्बा सरस्वती तथा कुछ ब्राह्मणिया और ब्राह्मण सहज राजयोग की स्थिति में बैठे है I इस चित्र द्वारा यह रहस्य प्रगट किया गया है कि कलियुग के अंत में अजयन रूपी रात्रि के समय, सृष्टि के बीज रूप, कल्याणकारी, ज्ञान सागर परमपिता शिव नई, पवित्र सृष्टि रचने के संकल्प से प्रजापिता ब्रह्मा के तन में अवतरित (प्रविष्ट) हुए और उन्होंने प्रजापिता ब्रह्मा के कमल-मुख द्वारा गीता-ज्ञान तथा सहज राजयोग की शिक्षा दी, जिसे धारण करने वाले नर-नारी "पवित्र ब्राह्मण कहलाये I ये ब्राह्मण और ब्राह्मणिया- सरस्वती इत्यादि --जिन्हें शिव-शक्तिया भी कहा जाता है, प्रजापिता ब्रह्मा के मुख से (ज्ञान द्वारा) उत्पन्न हुए वह युग सृष्टि का धर्माऊयुग भी कहलाता है और इसे ही "पुरुषोत्तम युग" अथवा "गीता-युग" भी कहा जा सकता है I
सतयुग में श्री लक्ष्मी और श्री नारायण का अटल,अखंड,निर्विघ्न, और अति सुखकारी राज्य था I प्रसिद्द है कि उस समय दूध और घी की नदियाँ बहती थी तथा शेर और गाय भी एक घाट पर पानी पीते थे I उस समय भारत डबल सिरताज था सभी सदा स्वस्थ, सदा धनवान और सदा सुखी थे उस समय काम-क्रोधादि विकारो की लड़ाई अथवा हिंसा का तथा अशांति अवं दुखो का नाम-निशान भी नहीं था उस समय के भारत को "स्वर्ग", "वैकुण्ठ", "बहिश्त", "सुखधाम" अथवा हेवन्ली एबोड कहा है I उस समय सभी जीवनमुक्त और पूज्य थे और उनकी औसत आयु लगभग १५० वर्ष थी उस युग के लोगो को "देवता वर्ण" कहा जाता है I पूज्य विश्व महारानी श्री लक्ष्मी तथा पूज्य विश्व महाराजन श्री नारायण के सूर्य वंश में कुल ८ सूर्यवंशी महारानी तथा महाराज हुए जिन्होंने की १२५० वर्षो तक चक्रवर्ती राज्य किया I
त्रेतायुग में श्री सीता और श्री राम चंद्रवंशी, १४ कला गुणवान और सम्पूर्ण निर्विकारी थे I उनके राज्य की भी भारत में बहुत महिमा है I सतयुग और त्रेतायुग का "अदि सनातन देवी देवता धर्म-वंश" ही इस मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष का ताना और मूल है जिससे ही बाद में अनेक धर्म रूपी शाखाये निकली I द्वापर में देह-अभिमान तथा काम-क्रोधादि विकारो का प्रादुर्भाव हुआ देवी स्वाभाव का स्थान आसुरी स्वभाव ने लेना शुरू किया I सृष्टि में दुःख और अशांति का भी राज्य शुरू किया उनसे बचने के लिए मनुष्य ने पूजा तथा भक्ति शुरू की ऋषि लीग शास्त्रों की रचना करने लगे यज्ञ तप आदि शुरुआत हुई I
कलियुग में लोग परमात्मा शिव की तथा देवताओ की पूजा के अतिरिक्त सुर्य की, पीपल के वृक्ष की, अग्नि की तथा अन्यान्य जड़ तत्वों की भी पूजा करने लगे और बिलकुल देह-अभिमानी, विकारी और पतित बन गए उनका आहार-व्यवहार. दृष्टी वृत्ति, मन, वचन और कर्म तमोगुणी और विकाराधीन हो गया I
कलियुग के अंत में सभी मनुष्य तमोप्रधन और आसुरी लक्षणों वाले होते है अत: सतयुग और त्रेतायुग की सतोगुणी, दैवी सृष्टि स्वर्ग (वैकुण्ठ) और उसकी तुलना में द्वापरयुग तथा कलियुग की सृष्टि ही नरक है I

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