Saturday, November 12, 2011

परमात्मा का दिव्य अवतरण शिव का अर्थ हे - कल्याणकारी परमात्मा का यह नाम इसलिए हे वह धर्म ग्लानी के समय, जब सभी मनुष्यात्माये माया ( पञ्च विकारो ) के

परमात्मा का दिव्य अवतरण
शिव का अर्थ हे - कल्याणकारी परमात्मा का यह नाम इसलिए हे वह धर्म ग्लानी के समय, जब सभी मनुष्यात्माये माया ( पञ्च विकारो ) के कारण दुखी, अशांत. पतित बन जाती है तब उनको पुन: पावन तथा सम्पूर्ण सुखी बनाने का कल्याणकारी कर्तव्य करते है शिव ब्रह्मलोक में निवास करते है और वे कर्म भ्रष्ट तथा धर्म-भ्रष्ट संसार का उद्धार करने के लिए ब्रह्मलोक से निचे उतर कर एक मनुष्य के शरीर का आधार लेते है परमात्मा शिव के इस अवतरण अथवा दिव्य एवं अलौकिक जन्म की पुनीत -स्मृति में ही "शिवरात्रि" अर्थात शिव जयंती का त्यौहार मनाया जाता है
परमात्मा शिव जो साधारण एवं वृद्ध मनुष्य के तन में अवतरित होते है, उसको वे परिवर्तन के बाद "प्रजापिता ब्रह्मा" नाम देते है उन्ही की याद में शिव की प्रतिमा के सामने ही उनका वाहन "नंदी-गण" दिखाया जाता है क्योंकि परमात्मा सर्व आत्माओं के माता-पिता है, इसलिए वे किसी माता के गर्भ से जन्म नही लेते बल्कि ब्रह्मा के तन में सनिवेश ही उनका दिव्य-जन्म अथवा अवतरण है
अजन्मा परमात्मा शिव के दिव्य-जन्म की रीति न्यारी
परमात्मा शिव किसी पुरुष के बीज से अथवा किसी माता के गर्भ से जन्म नही लेते क्योकि वे तो स्वयं ही सबके माता-पिता है, मनुष्य सृष्टि के चेतन बीज रूप है और जन्म-मरण तथा कर्म-बंधन से रहित है I अत: वे एक साधारण मनुष्य के वृद्धावस्था वाले तन में प्रवेश करते है इसे ही परमात्मा शिव का "दिव्य-जन्म" अथवा "अवतरण" भी कहा जाता है क्योंकि जिस तन में वे प्रवेश करते है वह एक जन्म-मरण तथा कर्म-बंधन के चक्कर में आने वाली मनुष्यात्मा ही का शरीर होता है, वह परमात्मा का "अपना" शरीर नही होता I
अत: चित्र में दिखाया गया है की जब साडी सृष्टि माया ( अर्थात कम,क्रोध,लोभ,मोह,अहंकार अदि पांच विकारो) क्व पंजे में फस जाती है तब परमपिता परमात्मा शिव, जो की आवागमन के चक्कर से मुक्त है, मनुष्यात्माओ को पवित्रता, सुख और शांति का वरदान देकर माया के पंजे से छुडाते है I वे ही सहज ज्ञान और राजयोग की शिक्षा देते है तथा सभी आत्माओं को परमधाम में ले जाते है तथा मुक्ति एवं जीवनमुक्ति का वरदान देते है I
शिवरात्रि का त्यौहार फाल्गुन मास, जो की विकृमी संवत का अंतिम मास होता है, में अत है उस समय कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी होती है और पूर्ण अंधकार होता है उसके पश्चात्, शुक्ल पक्ष का आरंभ होता है और कुछ ही दिनों बाद नया संवत आरंभ होता है I अत: रात्रि की तरह फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी भी आत्माओं को अजयन अंधकार, विकार अथवा असुरी लक्षणों की पराकाष्ठ के अंतिम चरण का बोधक है इसके पश्चात् आत्माओं का शुक्ल पक्ष अथवा नया कल्प प्रारम्भ होता है, अर्थात अजयन और दुःख के समय का अंत होकर पवित्र तथा सुख का समय शुरू होता है I
परमात्मा शिव अवतरित होकर अपने ज्ञान, योग तथा पवित्रता द्वारा अध्यात्मिक जाग्रति उत्पन्न करते है वसी महत के फलस्वरूप भक्त लोग शिव रात्रि को जागरण करते है I इस दिन मनुष्य उपवास, व्रत आदि भी रखते है उपवास ( उप-निकट, वास-रहना) का वास्तविक अर्थ है ही परमात्मा के समीप हो जाना अब परमात्मा से युक्त होने के लिए पवित्रता का व्रत लेना जरुरी है I

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