Saturday, November 12, 2011

एक महान भूल यह कितने आश्चर्य की बात है की आज एक और तो लोग परमात्मा को "माता-पिता" और "पतित-पावन" मानते है और दूसरी और कहते है की परमात्मा सर्व-व्या

एक महान भूल
यह कितने आश्चर्य की बात है की आज एक और तो लोग परमात्मा को "माता-पिता" और "पतित-पावन" मानते है और दूसरी और कहते है की परमात्मा सर्व-व्यापक" है अर्थात वह तो ठिकर-पत्थर, सर्प, बिच्छु, वराह, मगरमच्छ, चोर और डाकू सभी में है ओह, अपने परम प्यारे, परम पावन, परमपिता के बारे में यह कहना की वह कुत्ते में, बिल्ली में सभी में है - यह कितनी बड़ी भूल है ! यह कितना बड़ा पाप है ! ! जो पिता हमें मुक्ति और जीवनमुक्ति की विरासत( जन्म सिद्ध अधिकार) देता है, और हमें पतित से पावन बनाकर स्वर्ग का राज्य देता है, उसके लिए इसे शब्द कहना गोया कृत्ग्न बनना ही तो है ! ! !
यदि परमात्मा सर्वयापी होते तो उसके शिवलिंग रूप की पूजा क्यों होती ? यदि वह यत्र-तत्र-सर्वत्र होते तो वह "दिव्य जन्म कैसे लेते, मनुष्य उसके अवतरण के लिए उन्हें क्यों पुकारते और शिवरात्रि का त्यौहार क्यों मनाया जाता ? यदि परमात्मा सर्व्यापक होते तो वह गीता ज्ञान कैसे देते और गीता में लिखे हुए उनके यह महावाक्य कैसे सत्य सिद्ध होते की " मैं परम पुरुष( पुरुषोत्तम) हूँ, मैं सूर्य और तारागण के प्रकाश के पहुँच से भी परे परमधाम का वासी हूँ, यह सृष्टि एक उल्टा वृक्ष है और में इसका बीज हूँ जो की उपर रहता हूँ I"
यह जो मान्यता है की "परमातम सर्वव्यापी है"-- इससे बकती,ज्ञान,योग इत्यादि सभी का खंडन हो गया है क्योंकि यदि ज्योतिस्वरूप भगवन का कोई नाम और रूप ही न हो तो न उनसे सम्बन्ध (योग) जोड़ा जा सकता है, न ही उनके प्रति स्नेह और भक्ति ही प्रगट की जा सकती है और न ही उनके नाम और कर्तव्यो की चर्चा हो सकती है I जबकि ज्ञान का तो अर्थ ही किसी के नाम,रूप,धाम,कर्म,स्वभाव,सम्बन्ध, उससे होने वाली प्राप्ति इत्यादि का परिचय है अत: परमात्मा को सर्वव्यापक मानने के कारण आज अम्नुश्य "मन्मनाभाव" तथा मामेकं शरणम् व्रज ईश्वेराग्या पर नही चल सकते अर्थात बुद्दि में एक ज्योतिस्वरूप परमपिता पमात्मा शिव की याद धारण नही कर सकते और उससे स्नेह सम्बन्ध नही जोड़ सकते बल्कि उनका मन भटकता रहता है परमात्मा तो चैतन्य है, वह तो हमारे परमपिता है, पिता तो कभी सर्वव्यापी नही होता ! अत: परमपिता पर्मता को सर्वव्यापी मानने से ही सभी नर-नारी योग-भृष्ट और पतित हो गए है और उस परमपिता की पवित्रता सुख शांति रूपी बपौती (विरासत) से वंचित हो दु:खी तथा अशांत है I
अत: स्पष्ट है कि भक्तो का जो यह कथन है कि -" परमात्मा तो घाट-घाट का वासी है" इसका भी शब्दार्थ लेना ठीक नही है वास्तव में "घाट" अथवा "हदय" को प्रेम अवं याद का स्थान माना गया है द्वापरयुग के शुरू के लोगो में ईश्वर -भक्ति अथवा प्रभु में आस्था अवं श्रृद्धा बहुत थी I कोई विरला ही ऐसा व्यक्ति होता था जो परमत्मा को न मानता हो अत: उस समय भाव-विभोर भक्त यह कह दिया करते थे कि ईश्वर तो घाट-घाट वासी हे अर्थात उसे तो सभी याद और प्यार करते है और सभी के मन में ईश्वर का चित्र बस रहा है I इन शब्दों का अर्थ यह लेने कि स्वयं ईश्वर ही सबके र्ह्दयो में बस रहा है, भूल है I

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