Saturday, November 12, 2011

प्रभु मिलन का गुप्त युग भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को

प्रभु मिलन का गुप्त युग
भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को भी मानते है इस मास में लोग तीर्थ यात्रा का विशेष महात्म्य मानते है और बहुत दान-पुन्य भी करते है तथा अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा में भी काफी समय देते है वे प्रात: अम्रुत्वेले ही गंगा स्नान करने में बहुत पुन्य समझते है I
वास्तव में "पुरुषोत्तम" शब्द परमपिता परमात्मा ही का वाचक है जैसे "आत्मा" को पुरुष भी कहा जाता है, वैसे ही परमात्मा के लिए "परम पुरुष" अथवा "पुरुषोत्तम" शब्द का प्रयोग होता है क्योकि वह सभी पुरुषो (आत्माओं) से ज्ञान, शांति,पवित्रता और शक्ति से उत्तम है " पुरुषोत्तम मास" कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ के संगम्युग की याद दिलाता है क्योंकि इस युग में पुरुषोत्तम (परमपिता) परमात्मा का अवतरण होता है I सतयुग के आरंभ से लेकर कलियुग के अंत तक मनुष्यात्माओ का जन्म तो मनुशात्माओं का जन्म -पुनर्जन्म होता ही रहता है परन्तु कलियुग के अंत में सतयुग और सतधर्म की तथा उत्तम मर्यादा की पुन: स्थापना के लिए पुरुषोत्तम (परमात्मा) को आना पड़ता है I इस "संगमयुग" में परमपिता परमात्मा मनुष्यात्माओ को ज्ञान और सहज राजयोग सीखकर वापिस परमधाम अथवा ब्रह्मलोक में ले जाते है इस प्रकार सभी मनुष्यात्माए शिवपुरी अथवा विष्णुपुरी की अव्यक्ति अवं अध्यात्मिक यात्रा करती है और ज्ञान चर्चा अथवा ज्ञान गंगा में स्नान करके पावन बनती है परन्तु आज लोग इन रहस्यों को न जानने के कारण गंगा नदी में स्नान करते है और शिव तथा विष्णु की स्थूल यादगारों की यात्रा करते है वास्तव में "पुरुषोत्तम" मास में जिस दान का महत्व है, वह दान पञ्च विकारो का है परमपिता परमात्मा जब पुरुषोत्तम युग में अवतरित होते है तो मनुष्य आत्माओं को बुराईयों तथा विकारो का दान देने की शिक्षा देते है इस प्रकार, वे काम-क्रोधादि विकारो को त्यागकर उत्तम मर्यादा वाले बन जाते है और उसके बाद सतयुग, देवयुग का आरंभ हो जाता है आज यदि इन रहस्यों को
जानकर मनुष्य विकारो का दान दे, ज्ञान-गंगा में नित्य स्नान करे और योग द्वारा देह से न्यारा होकर सच्ची अध्यात्मिक यात्रा करे तो विश्व में पुन: सुख,शांति संपन्न राम-राज्य(स्वर्ग) की स्थापना हो जाएगी और नर तथा नारी नरक से निकल स्वर्ग में पहुँच जायेंगे चित्र में भी इस रहस्य को प्रदर्शित किया गया है I
यहाँ संगमयुग में श्वेत वस्त्रधारी प्रजापिता ब्रह्मा, जगदम्बा सरस्वती तथा कुछेक मुख्वंशी ब्राह्मण और ब्राह्मनियो को परमपिता परमात्मा शिव से योग लगते दिखाया गया है इस राजयोग द्वारा ही मन का मेल धुलता है, पिछले विकर्म दग्ध होते है और संस्कार सतोप्रधन बनते है अत: नीचे की ओर नरक के व्यक्ति ज्ञान एवं योग-अग्नि प्रज्वलित करके काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार को इस सूक्ष्म अग्नि में स्वः कटे दिखाए गए है I इसी के फलस्वरूप,वे नर से श्री नारायण और नारी से श्री लक्ष्मी बनकर अर्थात "मनुष्य से देवता" पद का अधिकार पाकर सुखधाम- वैकुण्ठ अथवा स्वर्ग में पवित्र एवं सम्पूर्ण सुख शांति संपन्न स्वराज्य के अधिकारी बने है I
मालूम रहे पर्त्मन समय यह संगम युग ही चल रहा है I अव यह कलियुगी सृष्टि नरक अर्थात दुख्धाम
है I अब निकट भविष्य में सतयुग आने वाला है जबकि यही सृष्टि सुखधाम होगी अत: अब हमें पवित्र एवं योगी बनना ही चाहिए I

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