परमात्मा का दिव्य अवतरण
शिव का अर्थ हे - कल्याणकारी परमात्मा का यह नाम इसलिए हे वह धर्म ग्लानी के समय, जब सभी मनुष्यात्माये माया ( पञ्च विकारो ) के कारण दुखी, अशांत. पतित बन जाती है तब उनको पुन: पावन तथा सम्पूर्ण सुखी बनाने का कल्याणकारी कर्तव्य करते है शिव ब्रह्मलोक में निवास करते है और वे कर्म भ्रष्ट तथा धर्म-भ्रष्ट संसार का उद्धार करने के लिए ब्रह्मलोक से निचे उतर कर एक मनुष्य के शरीर का आधार लेते है परमात्मा शिव के इस अवतरण अथवा दिव्य एवं अलौकिक जन्म की पुनीत -स्मृति में ही "शिवरात्रि" अर्थात शिव जयंती का त्यौहार मनाया जाता है
परमात्मा शिव जो साधारण एवं वृद्ध मनुष्य के तन में अवतरित होते है, उसको वे परिवर्तन के बाद "प्रजापिता ब्रह्मा" नाम देते है उन्ही की याद में शिव की प्रतिमा के सामने ही उनका वाहन "नंदी-गण" दिखाया जाता है क्योंकि परमात्मा सर्व आत्माओं के माता-पिता है, इसलिए वे किसी माता के गर्भ से जन्म नही लेते बल्कि ब्रह्मा के तन में सनिवेश ही उनका दिव्य-जन्म अथवा अवतरण है
अजन्मा परमात्मा शिव के दिव्य-जन्म की रीति न्यारी
परमात्मा शिव किसी पुरुष के बीज से अथवा किसी माता के गर्भ से जन्म नही लेते क्योकि वे तो स्वयं ही सबके माता-पिता है, मनुष्य सृष्टि के चेतन बीज रूप है और जन्म-मरण तथा कर्म-बंधन से रहित है I अत: वे एक साधारण मनुष्य के वृद्धावस्था वाले तन में प्रवेश करते है इसे ही परमात्मा शिव का "दिव्य-जन्म" अथवा "अवतरण" भी कहा जाता है क्योंकि जिस तन में वे प्रवेश करते है वह एक जन्म-मरण तथा कर्म-बंधन के चक्कर में आने वाली मनुष्यात्मा ही का शरीर होता है, वह परमात्मा का "अपना" शरीर नही होता I
अत: चित्र में दिखाया गया है की जब साडी सृष्टि माया ( अर्थात कम,क्रोध,लोभ,मोह,अहंकार अदि पांच विकारो) क्व पंजे में फस जाती है तब परमपिता परमात्मा शिव, जो की आवागमन के चक्कर से मुक्त है, मनुष्यात्माओ को पवित्रता, सुख और शांति का वरदान देकर माया के पंजे से छुडाते है I वे ही सहज ज्ञान और राजयोग की शिक्षा देते है तथा सभी आत्माओं को परमधाम में ले जाते है तथा मुक्ति एवं जीवनमुक्ति का वरदान देते है I
शिवरात्रि का त्यौहार फाल्गुन मास, जो की विकृमी संवत का अंतिम मास होता है, में अत है उस समय कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी होती है और पूर्ण अंधकार होता है उसके पश्चात्, शुक्ल पक्ष का आरंभ होता है और कुछ ही दिनों बाद नया संवत आरंभ होता है I अत: रात्रि की तरह फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी भी आत्माओं को अजयन अंधकार, विकार अथवा असुरी लक्षणों की पराकाष्ठ के अंतिम चरण का बोधक है इसके पश्चात् आत्माओं का शुक्ल पक्ष अथवा नया कल्प प्रारम्भ होता है, अर्थात अजयन और दुःख के समय का अंत होकर पवित्र तथा सुख का समय शुरू होता है I
परमात्मा शिव अवतरित होकर अपने ज्ञान, योग तथा पवित्रता द्वारा अध्यात्मिक जाग्रति उत्पन्न करते है वसी महत के फलस्वरूप भक्त लोग शिव रात्रि को जागरण करते है I इस दिन मनुष्य उपवास, व्रत आदि भी रखते है उपवास ( उप-निकट, वास-रहना) का वास्तविक अर्थ है ही परमात्मा के समीप हो जाना अब परमात्मा से युक्त होने के लिए पवित्रता का व्रत लेना जरुरी है I
ब्रह्माकुमार भगवान भाई ब्रह्माकुमारीज़ माउंट आबू राजस्थान भारत ने अब तक 5000 स्कूल , कॉलेजों और 800 जेल में प्रोग्राम कर इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज किया है ,नैतिक मूल्य पर लगभग 2000 अधिक लेख भी लिखे है ३२ वर्षो से माउंट आबू में ईश्वरीय सेवा में समर्पित है
Saturday, November 12, 2011
एक महान भूल यह कितने आश्चर्य की बात है की आज एक और तो लोग परमात्मा को "माता-पिता" और "पतित-पावन" मानते है और दूसरी और कहते है की परमात्मा सर्व-व्या
एक महान भूल
यह कितने आश्चर्य की बात है की आज एक और तो लोग परमात्मा को "माता-पिता" और "पतित-पावन" मानते है और दूसरी और कहते है की परमात्मा सर्व-व्यापक" है अर्थात वह तो ठिकर-पत्थर, सर्प, बिच्छु, वराह, मगरमच्छ, चोर और डाकू सभी में है ओह, अपने परम प्यारे, परम पावन, परमपिता के बारे में यह कहना की वह कुत्ते में, बिल्ली में सभी में है - यह कितनी बड़ी भूल है ! यह कितना बड़ा पाप है ! ! जो पिता हमें मुक्ति और जीवनमुक्ति की विरासत( जन्म सिद्ध अधिकार) देता है, और हमें पतित से पावन बनाकर स्वर्ग का राज्य देता है, उसके लिए इसे शब्द कहना गोया कृत्ग्न बनना ही तो है ! ! !
यदि परमात्मा सर्वयापी होते तो उसके शिवलिंग रूप की पूजा क्यों होती ? यदि वह यत्र-तत्र-सर्वत्र होते तो वह "दिव्य जन्म कैसे लेते, मनुष्य उसके अवतरण के लिए उन्हें क्यों पुकारते और शिवरात्रि का त्यौहार क्यों मनाया जाता ? यदि परमात्मा सर्व्यापक होते तो वह गीता ज्ञान कैसे देते और गीता में लिखे हुए उनके यह महावाक्य कैसे सत्य सिद्ध होते की " मैं परम पुरुष( पुरुषोत्तम) हूँ, मैं सूर्य और तारागण के प्रकाश के पहुँच से भी परे परमधाम का वासी हूँ, यह सृष्टि एक उल्टा वृक्ष है और में इसका बीज हूँ जो की उपर रहता हूँ I"
यह जो मान्यता है की "परमातम सर्वव्यापी है"-- इससे बकती,ज्ञान,योग इत्यादि सभी का खंडन हो गया है क्योंकि यदि ज्योतिस्वरूप भगवन का कोई नाम और रूप ही न हो तो न उनसे सम्बन्ध (योग) जोड़ा जा सकता है, न ही उनके प्रति स्नेह और भक्ति ही प्रगट की जा सकती है और न ही उनके नाम और कर्तव्यो की चर्चा हो सकती है I जबकि ज्ञान का तो अर्थ ही किसी के नाम,रूप,धाम,कर्म,स्वभाव,सम्बन्ध, उससे होने वाली प्राप्ति इत्यादि का परिचय है अत: परमात्मा को सर्वव्यापक मानने के कारण आज अम्नुश्य "मन्मनाभाव" तथा मामेकं शरणम् व्रज ईश्वेराग्या पर नही चल सकते अर्थात बुद्दि में एक ज्योतिस्वरूप परमपिता पमात्मा शिव की याद धारण नही कर सकते और उससे स्नेह सम्बन्ध नही जोड़ सकते बल्कि उनका मन भटकता रहता है परमात्मा तो चैतन्य है, वह तो हमारे परमपिता है, पिता तो कभी सर्वव्यापी नही होता ! अत: परमपिता पर्मता को सर्वव्यापी मानने से ही सभी नर-नारी योग-भृष्ट और पतित हो गए है और उस परमपिता की पवित्रता सुख शांति रूपी बपौती (विरासत) से वंचित हो दु:खी तथा अशांत है I
अत: स्पष्ट है कि भक्तो का जो यह कथन है कि -" परमात्मा तो घाट-घाट का वासी है" इसका भी शब्दार्थ लेना ठीक नही है वास्तव में "घाट" अथवा "हदय" को प्रेम अवं याद का स्थान माना गया है द्वापरयुग के शुरू के लोगो में ईश्वर -भक्ति अथवा प्रभु में आस्था अवं श्रृद्धा बहुत थी I कोई विरला ही ऐसा व्यक्ति होता था जो परमत्मा को न मानता हो अत: उस समय भाव-विभोर भक्त यह कह दिया करते थे कि ईश्वर तो घाट-घाट वासी हे अर्थात उसे तो सभी याद और प्यार करते है और सभी के मन में ईश्वर का चित्र बस रहा है I इन शब्दों का अर्थ यह लेने कि स्वयं ईश्वर ही सबके र्ह्दयो में बस रहा है, भूल है I
यह कितने आश्चर्य की बात है की आज एक और तो लोग परमात्मा को "माता-पिता" और "पतित-पावन" मानते है और दूसरी और कहते है की परमात्मा सर्व-व्यापक" है अर्थात वह तो ठिकर-पत्थर, सर्प, बिच्छु, वराह, मगरमच्छ, चोर और डाकू सभी में है ओह, अपने परम प्यारे, परम पावन, परमपिता के बारे में यह कहना की वह कुत्ते में, बिल्ली में सभी में है - यह कितनी बड़ी भूल है ! यह कितना बड़ा पाप है ! ! जो पिता हमें मुक्ति और जीवनमुक्ति की विरासत( जन्म सिद्ध अधिकार) देता है, और हमें पतित से पावन बनाकर स्वर्ग का राज्य देता है, उसके लिए इसे शब्द कहना गोया कृत्ग्न बनना ही तो है ! ! !
यदि परमात्मा सर्वयापी होते तो उसके शिवलिंग रूप की पूजा क्यों होती ? यदि वह यत्र-तत्र-सर्वत्र होते तो वह "दिव्य जन्म कैसे लेते, मनुष्य उसके अवतरण के लिए उन्हें क्यों पुकारते और शिवरात्रि का त्यौहार क्यों मनाया जाता ? यदि परमात्मा सर्व्यापक होते तो वह गीता ज्ञान कैसे देते और गीता में लिखे हुए उनके यह महावाक्य कैसे सत्य सिद्ध होते की " मैं परम पुरुष( पुरुषोत्तम) हूँ, मैं सूर्य और तारागण के प्रकाश के पहुँच से भी परे परमधाम का वासी हूँ, यह सृष्टि एक उल्टा वृक्ष है और में इसका बीज हूँ जो की उपर रहता हूँ I"
यह जो मान्यता है की "परमातम सर्वव्यापी है"-- इससे बकती,ज्ञान,योग इत्यादि सभी का खंडन हो गया है क्योंकि यदि ज्योतिस्वरूप भगवन का कोई नाम और रूप ही न हो तो न उनसे सम्बन्ध (योग) जोड़ा जा सकता है, न ही उनके प्रति स्नेह और भक्ति ही प्रगट की जा सकती है और न ही उनके नाम और कर्तव्यो की चर्चा हो सकती है I जबकि ज्ञान का तो अर्थ ही किसी के नाम,रूप,धाम,कर्म,स्वभाव,सम्बन्ध, उससे होने वाली प्राप्ति इत्यादि का परिचय है अत: परमात्मा को सर्वव्यापक मानने के कारण आज अम्नुश्य "मन्मनाभाव" तथा मामेकं शरणम् व्रज ईश्वेराग्या पर नही चल सकते अर्थात बुद्दि में एक ज्योतिस्वरूप परमपिता पमात्मा शिव की याद धारण नही कर सकते और उससे स्नेह सम्बन्ध नही जोड़ सकते बल्कि उनका मन भटकता रहता है परमात्मा तो चैतन्य है, वह तो हमारे परमपिता है, पिता तो कभी सर्वव्यापी नही होता ! अत: परमपिता पर्मता को सर्वव्यापी मानने से ही सभी नर-नारी योग-भृष्ट और पतित हो गए है और उस परमपिता की पवित्रता सुख शांति रूपी बपौती (विरासत) से वंचित हो दु:खी तथा अशांत है I
अत: स्पष्ट है कि भक्तो का जो यह कथन है कि -" परमात्मा तो घाट-घाट का वासी है" इसका भी शब्दार्थ लेना ठीक नही है वास्तव में "घाट" अथवा "हदय" को प्रेम अवं याद का स्थान माना गया है द्वापरयुग के शुरू के लोगो में ईश्वर -भक्ति अथवा प्रभु में आस्था अवं श्रृद्धा बहुत थी I कोई विरला ही ऐसा व्यक्ति होता था जो परमत्मा को न मानता हो अत: उस समय भाव-विभोर भक्त यह कह दिया करते थे कि ईश्वर तो घाट-घाट वासी हे अर्थात उसे तो सभी याद और प्यार करते है और सभी के मन में ईश्वर का चित्र बस रहा है I इन शब्दों का अर्थ यह लेने कि स्वयं ईश्वर ही सबके र्ह्दयो में बस रहा है, भूल है I
एक महान भूल यह कितने आश्चर्य की बात है की आज एक और तो लोग परमात्मा को "माता-पिता" और "पतित-पावन" मानते है और दूसरी और कहते है की परमात्मा सर्व-व्या
एक महान भूल
यह कितने आश्चर्य की बात है की आज एक और तो लोग परमात्मा को "माता-पिता" और "पतित-पावन" मानते है और दूसरी और कहते है की परमात्मा सर्व-व्यापक" है अर्थात वह तो ठिकर-पत्थर, सर्प, बिच्छु, वराह, मगरमच्छ, चोर और डाकू सभी में है ओह, अपने परम प्यारे, परम पावन, परमपिता के बारे में यह कहना की वह कुत्ते में, बिल्ली में सभी में है - यह कितनी बड़ी भूल है ! यह कितना बड़ा पाप है ! ! जो पिता हमें मुक्ति और जीवनमुक्ति की विरासत( जन्म सिद्ध अधिकार) देता है, और हमें पतित से पावन बनाकर स्वर्ग का राज्य देता है, उसके लिए इसे शब्द कहना गोया कृत्ग्न बनना ही तो है ! ! !
यदि परमात्मा सर्वयापी होते तो उसके शिवलिंग रूप की पूजा क्यों होती ? यदि वह यत्र-तत्र-सर्वत्र होते तो वह "दिव्य जन्म कैसे लेते, मनुष्य उसके अवतरण के लिए उन्हें क्यों पुकारते और शिवरात्रि का त्यौहार क्यों मनाया जाता ? यदि परमात्मा सर्व्यापक होते तो वह गीता ज्ञान कैसे देते और गीता में लिखे हुए उनके यह महावाक्य कैसे सत्य सिद्ध होते की " मैं परम पुरुष( पुरुषोत्तम) हूँ, मैं सूर्य और तारागण के प्रकाश के पहुँच से भी परे परमधाम का वासी हूँ, यह सृष्टि एक उल्टा वृक्ष है और में इसका बीज हूँ जो की उपर रहता हूँ I"
यह जो मान्यता है की "परमातम सर्वव्यापी है"-- इससे बकती,ज्ञान,योग इत्यादि सभी का खंडन हो गया है क्योंकि यदि ज्योतिस्वरूप भगवन का कोई नाम और रूप ही न हो तो न उनसे सम्बन्ध (योग) जोड़ा जा सकता है, न ही उनके प्रति स्नेह और भक्ति ही प्रगट की जा सकती है और न ही उनके नाम और कर्तव्यो की चर्चा हो सकती है I जबकि ज्ञान का तो अर्थ ही किसी के नाम,रूप,धाम,कर्म,स्वभाव,सम्बन्ध, उससे होने वाली प्राप्ति इत्यादि का परिचय है अत: परमात्मा को सर्वव्यापक मानने के कारण आज अम्नुश्य "मन्मनाभाव" तथा मामेकं शरणम् व्रज ईश्वेराग्या पर नही चल सकते अर्थात बुद्दि में एक ज्योतिस्वरूप परमपिता पमात्मा शिव की याद धारण नही कर सकते और उससे स्नेह सम्बन्ध नही जोड़ सकते बल्कि उनका मन भटकता रहता है परमात्मा तो चैतन्य है, वह तो हमारे परमपिता है, पिता तो कभी सर्वव्यापी नही होता ! अत: परमपिता पर्मता को सर्वव्यापी मानने से ही सभी नर-नारी योग-भृष्ट और पतित हो गए है और उस परमपिता की पवित्रता सुख शांति रूपी बपौती (विरासत) से वंचित हो दु:खी तथा अशांत है I
अत: स्पष्ट है कि भक्तो का जो यह कथन है कि -" परमात्मा तो घाट-घाट का वासी है" इसका भी शब्दार्थ लेना ठीक नही है वास्तव में "घाट" अथवा "हदय" को प्रेम अवं याद का स्थान माना गया है द्वापरयुग के शुरू के लोगो में ईश्वर -भक्ति अथवा प्रभु में आस्था अवं श्रृद्धा बहुत थी I कोई विरला ही ऐसा व्यक्ति होता था जो परमत्मा को न मानता हो अत: उस समय भाव-विभोर भक्त यह कह दिया करते थे कि ईश्वर तो घाट-घाट वासी हे अर्थात उसे तो सभी याद और प्यार करते है और सभी के मन में ईश्वर का चित्र बस रहा है I इन शब्दों का अर्थ यह लेने कि स्वयं ईश्वर ही सबके र्ह्दयो में बस रहा है, भूल है I
यह कितने आश्चर्य की बात है की आज एक और तो लोग परमात्मा को "माता-पिता" और "पतित-पावन" मानते है और दूसरी और कहते है की परमात्मा सर्व-व्यापक" है अर्थात वह तो ठिकर-पत्थर, सर्प, बिच्छु, वराह, मगरमच्छ, चोर और डाकू सभी में है ओह, अपने परम प्यारे, परम पावन, परमपिता के बारे में यह कहना की वह कुत्ते में, बिल्ली में सभी में है - यह कितनी बड़ी भूल है ! यह कितना बड़ा पाप है ! ! जो पिता हमें मुक्ति और जीवनमुक्ति की विरासत( जन्म सिद्ध अधिकार) देता है, और हमें पतित से पावन बनाकर स्वर्ग का राज्य देता है, उसके लिए इसे शब्द कहना गोया कृत्ग्न बनना ही तो है ! ! !
यदि परमात्मा सर्वयापी होते तो उसके शिवलिंग रूप की पूजा क्यों होती ? यदि वह यत्र-तत्र-सर्वत्र होते तो वह "दिव्य जन्म कैसे लेते, मनुष्य उसके अवतरण के लिए उन्हें क्यों पुकारते और शिवरात्रि का त्यौहार क्यों मनाया जाता ? यदि परमात्मा सर्व्यापक होते तो वह गीता ज्ञान कैसे देते और गीता में लिखे हुए उनके यह महावाक्य कैसे सत्य सिद्ध होते की " मैं परम पुरुष( पुरुषोत्तम) हूँ, मैं सूर्य और तारागण के प्रकाश के पहुँच से भी परे परमधाम का वासी हूँ, यह सृष्टि एक उल्टा वृक्ष है और में इसका बीज हूँ जो की उपर रहता हूँ I"
यह जो मान्यता है की "परमातम सर्वव्यापी है"-- इससे बकती,ज्ञान,योग इत्यादि सभी का खंडन हो गया है क्योंकि यदि ज्योतिस्वरूप भगवन का कोई नाम और रूप ही न हो तो न उनसे सम्बन्ध (योग) जोड़ा जा सकता है, न ही उनके प्रति स्नेह और भक्ति ही प्रगट की जा सकती है और न ही उनके नाम और कर्तव्यो की चर्चा हो सकती है I जबकि ज्ञान का तो अर्थ ही किसी के नाम,रूप,धाम,कर्म,स्वभाव,सम्बन्ध, उससे होने वाली प्राप्ति इत्यादि का परिचय है अत: परमात्मा को सर्वव्यापक मानने के कारण आज अम्नुश्य "मन्मनाभाव" तथा मामेकं शरणम् व्रज ईश्वेराग्या पर नही चल सकते अर्थात बुद्दि में एक ज्योतिस्वरूप परमपिता पमात्मा शिव की याद धारण नही कर सकते और उससे स्नेह सम्बन्ध नही जोड़ सकते बल्कि उनका मन भटकता रहता है परमात्मा तो चैतन्य है, वह तो हमारे परमपिता है, पिता तो कभी सर्वव्यापी नही होता ! अत: परमपिता पर्मता को सर्वव्यापी मानने से ही सभी नर-नारी योग-भृष्ट और पतित हो गए है और उस परमपिता की पवित्रता सुख शांति रूपी बपौती (विरासत) से वंचित हो दु:खी तथा अशांत है I
अत: स्पष्ट है कि भक्तो का जो यह कथन है कि -" परमात्मा तो घाट-घाट का वासी है" इसका भी शब्दार्थ लेना ठीक नही है वास्तव में "घाट" अथवा "हदय" को प्रेम अवं याद का स्थान माना गया है द्वापरयुग के शुरू के लोगो में ईश्वर -भक्ति अथवा प्रभु में आस्था अवं श्रृद्धा बहुत थी I कोई विरला ही ऐसा व्यक्ति होता था जो परमत्मा को न मानता हो अत: उस समय भाव-विभोर भक्त यह कह दिया करते थे कि ईश्वर तो घाट-घाट वासी हे अर्थात उसे तो सभी याद और प्यार करते है और सभी के मन में ईश्वर का चित्र बस रहा है I इन शब्दों का अर्थ यह लेने कि स्वयं ईश्वर ही सबके र्ह्दयो में बस रहा है, भूल है I
शिव तथा शंकर में अंतर बहुत से लोग शिव और शंकर को एक ही मानते है, परन्तु वास्तव में एन दोनों में भिन्नता है I आप देखते है की दोनों की प्रतिमाएं भी
शिव तथा शंकर में अंतर
बहुत से लोग शिव और शंकर को एक ही मानते है, परन्तु वास्तव में एन दोनों में भिन्नता है I आप देखते है की दोनों की प्रतिमाएं भी अलग-अलग आकर वाली होती है I शिव की प्रतिमा अंडाकार अथवा अन्गुष्ठाकर होती है जबकि महादेव शंकर की प्रतिमा शारीरिक आकार वाली होती है इ यह उन दोनों का अलग-अलग परिचय, जो की परमपिता परमात्मा शिव ने अब स्वयं हमें समझाया है तथा अनुभव कराया है स्पष्ट किया जा रहा है :-
बहुत से लोग शिव और शंकर को एक ही मानते है, परन्तु वास्तव में एन दोनों में भिन्नता है I आप देखते है की दोनों की प्रतिमाएं भी अलग-अलग आकर वाली होती है I शिव की प्रतिमा अंडाकार अथवा अन्गुष्ठाकर होती है जबकि महादेव शंकर की प्रतिमा शारीरिक आकार वाली होती है इ यह उन दोनों का अलग-अलग परिचय, जो की परमपिता परमात्मा शिव ने अब स्वयं हमें समझाया है तथा अनुभव कराया है स्पष्ट किया जा रहा है :-
शिव तथा शंकर में अंतर बहुत से लोग शिव और शंकर को एक ही मानते है, परन्तु वास्तव में एन दोनों में भिन्नता है I आप देखते है की दोनों की प्रतिमाएं भी
शिव तथा शंकर में अंतर
बहुत से लोग शिव और शंकर को एक ही मानते है, परन्तु वास्तव में एन दोनों में भिन्नता है I आप देखते है की दोनों की प्रतिमाएं भी अलग-अलग आकर वाली होती है I शिव की प्रतिमा अंडाकार अथवा अन्गुष्ठाकर होती है जबकि महादेव शंकर की प्रतिमा शारीरिक आकार वाली होती है इ यह उन दोनों का अलग-अलग परिचय, जो की परमपिता परमात्मा शिव ने अब स्वयं हमें समझाया है तथा अनुभव कराया है स्पष्ट किया जा रहा है :-
महादेव शंकर
०१. यह ब्रह्मा तथा विष्णु की तरह शरीरधारी है इन्हे "महादेव" कहा जाता है परन्तु इन्हे "परमात्मा" नही कहा जा सकता
०२. यह ब्रह्मा देवता तथा विष्णु देवता की तरह सूक्ष्मलोक में शंकरपुरी में निवास करते है I
०३. ब्रह्मा देवता तथा विष्णु देवता की तरह यह भी परमात्मा शिव की रचना है I
०४. यह केवल महाविनाश का कार्य करते है, स्थापना और पालना कस कर्तव्य इनके कर्तव्य नही है I
परमपिता परमात्मा शिव
०१. यह चेतन्य ज्योति-बिंदु है और इनका अपना कोई स्थूल या सूक्ष्म शरीर नही है, यह परमात्मा है I
०२. यह ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर के लोक, अर्थात सूक्ष्म देव लोक से भी परे ब्रह्म लोक ( मुक्तिधाम) में वास करते है I
०३. यह ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर के भी रचयिता अर्थात "त्रिमूर्ति" है I
०४. यह ब्रह्मा द्वारा स्थापना, शंकर द्वारा महाविनाश और विष्णु द्वारा विश्व का पालन करके विश्व का कल्याण करते है I
शिव का जन्मोत्सव रात्रि में क्यों ?
"रात्रि" वास्तव में अज्ञान, तमोगुण अथवा पापाचार की निशानी है I अत: द्वापरयुग और कलियुग के समय को "रात्रि" कहा जाता है I कलियुग के अंत में जबकि साधू,सन्यासी,गुरु,आचार्य इत्यादि सभी मनुष्य पतित तथा दुखी होते है और अज्ञान निंद्रा में सोये पड़े होते है, जब धर्म की ग्लानी होती है और जब यह भारत विषय-विकारो के कारकं वैशाली बन जाता है, तब पतित-पावन परमपिता परमात्मा शिव इस सृष्टि में दिव्य जन्म लेते है I इसलिए अन्य सबका जन्मोत्सव तो "जन्म दिन" के रूप में मनाया जाता है परन्तु परमात्मा शिव के जन्म दिन को "शिवरात्रि" ही कहा जाता है अत: यहाँ चित्र में जो कालिमा अथवा अंधकार दिखाया गया है वह अज्ञान अंधकार अथवा विषय-विकारो की रात्रि द्योतक है I
ज्ञान-सूर्य शिव के प्रकट होने से सृष्टि से अज्ञानान्धकार तथा
विकारो का नाश
जब इस प्रकार अवतरित होकर ज्ञान-सूर्य परमपिता परमात्मा शिव ज्ञान प्रकाश देते है तो कुछ ही समय में ज्ञान का प्रभाव सारे विश्व में फ़ैल जाता है और कलियुग तथा तमोगुण के स्थान पार संसार में सतयुग और सतोगुण की स्थापना हो जाती है और अज्ञान अंधकार का तथा विकारो का विनाश हो जाता है I सारे कल्प में परमपिता परमात्मा शिव के एक अलौकिक जन्म से थोड़े ही समय में यह सृष्टि वैश्यालय से बदल कर शिवालय बन जाती है I और नर को श्री नारायण तथा नारी को श्री लक्ष्मी पद की प्राप्ति हो जाती है इसलिए शिवरात्रि हीरे तुल्य है I
बहुत से लोग शिव और शंकर को एक ही मानते है, परन्तु वास्तव में एन दोनों में भिन्नता है I आप देखते है की दोनों की प्रतिमाएं भी अलग-अलग आकर वाली होती है I शिव की प्रतिमा अंडाकार अथवा अन्गुष्ठाकर होती है जबकि महादेव शंकर की प्रतिमा शारीरिक आकार वाली होती है इ यह उन दोनों का अलग-अलग परिचय, जो की परमपिता परमात्मा शिव ने अब स्वयं हमें समझाया है तथा अनुभव कराया है स्पष्ट किया जा रहा है :-
महादेव शंकर
०१. यह ब्रह्मा तथा विष्णु की तरह शरीरधारी है इन्हे "महादेव" कहा जाता है परन्तु इन्हे "परमात्मा" नही कहा जा सकता
०२. यह ब्रह्मा देवता तथा विष्णु देवता की तरह सूक्ष्मलोक में शंकरपुरी में निवास करते है I
०३. ब्रह्मा देवता तथा विष्णु देवता की तरह यह भी परमात्मा शिव की रचना है I
०४. यह केवल महाविनाश का कार्य करते है, स्थापना और पालना कस कर्तव्य इनके कर्तव्य नही है I
परमपिता परमात्मा शिव
०१. यह चेतन्य ज्योति-बिंदु है और इनका अपना कोई स्थूल या सूक्ष्म शरीर नही है, यह परमात्मा है I
०२. यह ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर के लोक, अर्थात सूक्ष्म देव लोक से भी परे ब्रह्म लोक ( मुक्तिधाम) में वास करते है I
०३. यह ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर के भी रचयिता अर्थात "त्रिमूर्ति" है I
०४. यह ब्रह्मा द्वारा स्थापना, शंकर द्वारा महाविनाश और विष्णु द्वारा विश्व का पालन करके विश्व का कल्याण करते है I
शिव का जन्मोत्सव रात्रि में क्यों ?
"रात्रि" वास्तव में अज्ञान, तमोगुण अथवा पापाचार की निशानी है I अत: द्वापरयुग और कलियुग के समय को "रात्रि" कहा जाता है I कलियुग के अंत में जबकि साधू,सन्यासी,गुरु,आचार्य इत्यादि सभी मनुष्य पतित तथा दुखी होते है और अज्ञान निंद्रा में सोये पड़े होते है, जब धर्म की ग्लानी होती है और जब यह भारत विषय-विकारो के कारकं वैशाली बन जाता है, तब पतित-पावन परमपिता परमात्मा शिव इस सृष्टि में दिव्य जन्म लेते है I इसलिए अन्य सबका जन्मोत्सव तो "जन्म दिन" के रूप में मनाया जाता है परन्तु परमात्मा शिव के जन्म दिन को "शिवरात्रि" ही कहा जाता है अत: यहाँ चित्र में जो कालिमा अथवा अंधकार दिखाया गया है वह अज्ञान अंधकार अथवा विषय-विकारो की रात्रि द्योतक है I
ज्ञान-सूर्य शिव के प्रकट होने से सृष्टि से अज्ञानान्धकार तथा
विकारो का नाश
जब इस प्रकार अवतरित होकर ज्ञान-सूर्य परमपिता परमात्मा शिव ज्ञान प्रकाश देते है तो कुछ ही समय में ज्ञान का प्रभाव सारे विश्व में फ़ैल जाता है और कलियुग तथा तमोगुण के स्थान पार संसार में सतयुग और सतोगुण की स्थापना हो जाती है और अज्ञान अंधकार का तथा विकारो का विनाश हो जाता है I सारे कल्प में परमपिता परमात्मा शिव के एक अलौकिक जन्म से थोड़े ही समय में यह सृष्टि वैश्यालय से बदल कर शिवालय बन जाती है I और नर को श्री नारायण तथा नारी को श्री लक्ष्मी पद की प्राप्ति हो जाती है इसलिए शिवरात्रि हीरे तुल्य है I
सृष्टि रूपी उल्टा व् अदभुत वृक्ष और उसके बीजरूप परमात्मा भगवान ने इस सृष्टि रूपी वृक्ष की तुलना एक उल्टे वृक्ष से की है क्योंकि अन्य
सृष्टि रूपी उल्टा व् अदभुत वृक्ष और उसके बीजरूप परमात्मा
भगवान ने इस सृष्टि रूपी वृक्ष की तुलना एक उल्टे वृक्ष से की है क्योंकि अन्य वृक्षों के बीज तो पृथ्वी के अन्दर बोये जाते है और वृक्ष ऊपर को उगते है I परन्तु मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष के जो अविनाशी और चेतन बीज रूप परमपिता परमात्मा शिव है, वह स्वयं उपर परमधाम अथवा ब्रह्मलोक में निवास करते है I
चित्र में सबसे निचे कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ का संगम दिखलाया गया है I वहां श्वेत-वस्त्रधारी प्रजापिता ब्रह्मा, जगदम्बा सरस्वती तथा कुछ ब्राह्मणिया और ब्राह्मण सहज राजयोग की स्थिति में बैठे है I इस चित्र द्वारा यह रहस्य प्रगट किया गया है कि कलियुग के अंत में अजयन रूपी रात्रि के समय, सृष्टि के बीज रूप, कल्याणकारी, ज्ञान सागर परमपिता शिव नई, पवित्र सृष्टि रचने के संकल्प से प्रजापिता ब्रह्मा के तन में अवतरित (प्रविष्ट) हुए और उन्होंने प्रजापिता ब्रह्मा के कमल-मुख द्वारा गीता-ज्ञान तथा सहज राजयोग की शिक्षा दी, जिसे धारण करने वाले नर-नारी "पवित्र ब्राह्मण कहलाये I ये ब्राह्मण और ब्राह्मणिया- सरस्वती इत्यादि --जिन्हें शिव-शक्तिया भी कहा जाता है, प्रजापिता ब्रह्मा के मुख से (ज्ञान द्वारा) उत्पन्न हुए वह युग सृष्टि का धर्माऊयुग भी कहलाता है और इसे ही "पुरुषोत्तम युग" अथवा "गीता-युग" भी कहा जा सकता है I
सतयुग में श्री लक्ष्मी और श्री नारायण का अटल,अखंड,निर्विघ्न, और अति सुखकारी राज्य था I प्रसिद्द है कि उस समय दूध और घी की नदियाँ बहती थी तथा शेर और गाय भी एक घाट पर पानी पीते थे I उस समय भारत डबल सिरताज था सभी सदा स्वस्थ, सदा धनवान और सदा सुखी थे उस समय काम-क्रोधादि विकारो की लड़ाई अथवा हिंसा का तथा अशांति अवं दुखो का नाम-निशान भी नहीं था उस समय के भारत को "स्वर्ग", "वैकुण्ठ", "बहिश्त", "सुखधाम" अथवा हेवन्ली एबोड कहा है I उस समय सभी जीवनमुक्त और पूज्य थे और उनकी औसत आयु लगभग १५० वर्ष थी उस युग के लोगो को "देवता वर्ण" कहा जाता है I पूज्य विश्व महारानी श्री लक्ष्मी तथा पूज्य विश्व महाराजन श्री नारायण के सूर्य वंश में कुल ८ सूर्यवंशी महारानी तथा महाराज हुए जिन्होंने की १२५० वर्षो तक चक्रवर्ती राज्य किया I
त्रेतायुग में श्री सीता और श्री राम चंद्रवंशी, १४ कला गुणवान और सम्पूर्ण निर्विकारी थे I उनके राज्य की भी भारत में बहुत महिमा है I सतयुग और त्रेतायुग का "अदि सनातन देवी देवता धर्म-वंश" ही इस मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष का ताना और मूल है जिससे ही बाद में अनेक धर्म रूपी शाखाये निकली I द्वापर में देह-अभिमान तथा काम-क्रोधादि विकारो का प्रादुर्भाव हुआ देवी स्वाभाव का स्थान आसुरी स्वभाव ने लेना शुरू किया I सृष्टि में दुःख और अशांति का भी राज्य शुरू किया उनसे बचने के लिए मनुष्य ने पूजा तथा भक्ति शुरू की ऋषि लीग शास्त्रों की रचना करने लगे यज्ञ तप आदि शुरुआत हुई I
कलियुग में लोग परमात्मा शिव की तथा देवताओ की पूजा के अतिरिक्त सुर्य की, पीपल के वृक्ष की, अग्नि की तथा अन्यान्य जड़ तत्वों की भी पूजा करने लगे और बिलकुल देह-अभिमानी, विकारी और पतित बन गए उनका आहार-व्यवहार. दृष्टी वृत्ति, मन, वचन और कर्म तमोगुणी और विकाराधीन हो गया I
कलियुग के अंत में सभी मनुष्य तमोप्रधन और आसुरी लक्षणों वाले होते है अत: सतयुग और त्रेतायुग की सतोगुणी, दैवी सृष्टि स्वर्ग (वैकुण्ठ) और उसकी तुलना में द्वापरयुग तथा कलियुग की सृष्टि ही नरक है I
भगवान ने इस सृष्टि रूपी वृक्ष की तुलना एक उल्टे वृक्ष से की है क्योंकि अन्य वृक्षों के बीज तो पृथ्वी के अन्दर बोये जाते है और वृक्ष ऊपर को उगते है I परन्तु मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष के जो अविनाशी और चेतन बीज रूप परमपिता परमात्मा शिव है, वह स्वयं उपर परमधाम अथवा ब्रह्मलोक में निवास करते है I
चित्र में सबसे निचे कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ का संगम दिखलाया गया है I वहां श्वेत-वस्त्रधारी प्रजापिता ब्रह्मा, जगदम्बा सरस्वती तथा कुछ ब्राह्मणिया और ब्राह्मण सहज राजयोग की स्थिति में बैठे है I इस चित्र द्वारा यह रहस्य प्रगट किया गया है कि कलियुग के अंत में अजयन रूपी रात्रि के समय, सृष्टि के बीज रूप, कल्याणकारी, ज्ञान सागर परमपिता शिव नई, पवित्र सृष्टि रचने के संकल्प से प्रजापिता ब्रह्मा के तन में अवतरित (प्रविष्ट) हुए और उन्होंने प्रजापिता ब्रह्मा के कमल-मुख द्वारा गीता-ज्ञान तथा सहज राजयोग की शिक्षा दी, जिसे धारण करने वाले नर-नारी "पवित्र ब्राह्मण कहलाये I ये ब्राह्मण और ब्राह्मणिया- सरस्वती इत्यादि --जिन्हें शिव-शक्तिया भी कहा जाता है, प्रजापिता ब्रह्मा के मुख से (ज्ञान द्वारा) उत्पन्न हुए वह युग सृष्टि का धर्माऊयुग भी कहलाता है और इसे ही "पुरुषोत्तम युग" अथवा "गीता-युग" भी कहा जा सकता है I
सतयुग में श्री लक्ष्मी और श्री नारायण का अटल,अखंड,निर्विघ्न, और अति सुखकारी राज्य था I प्रसिद्द है कि उस समय दूध और घी की नदियाँ बहती थी तथा शेर और गाय भी एक घाट पर पानी पीते थे I उस समय भारत डबल सिरताज था सभी सदा स्वस्थ, सदा धनवान और सदा सुखी थे उस समय काम-क्रोधादि विकारो की लड़ाई अथवा हिंसा का तथा अशांति अवं दुखो का नाम-निशान भी नहीं था उस समय के भारत को "स्वर्ग", "वैकुण्ठ", "बहिश्त", "सुखधाम" अथवा हेवन्ली एबोड कहा है I उस समय सभी जीवनमुक्त और पूज्य थे और उनकी औसत आयु लगभग १५० वर्ष थी उस युग के लोगो को "देवता वर्ण" कहा जाता है I पूज्य विश्व महारानी श्री लक्ष्मी तथा पूज्य विश्व महाराजन श्री नारायण के सूर्य वंश में कुल ८ सूर्यवंशी महारानी तथा महाराज हुए जिन्होंने की १२५० वर्षो तक चक्रवर्ती राज्य किया I
त्रेतायुग में श्री सीता और श्री राम चंद्रवंशी, १४ कला गुणवान और सम्पूर्ण निर्विकारी थे I उनके राज्य की भी भारत में बहुत महिमा है I सतयुग और त्रेतायुग का "अदि सनातन देवी देवता धर्म-वंश" ही इस मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष का ताना और मूल है जिससे ही बाद में अनेक धर्म रूपी शाखाये निकली I द्वापर में देह-अभिमान तथा काम-क्रोधादि विकारो का प्रादुर्भाव हुआ देवी स्वाभाव का स्थान आसुरी स्वभाव ने लेना शुरू किया I सृष्टि में दुःख और अशांति का भी राज्य शुरू किया उनसे बचने के लिए मनुष्य ने पूजा तथा भक्ति शुरू की ऋषि लीग शास्त्रों की रचना करने लगे यज्ञ तप आदि शुरुआत हुई I
कलियुग में लोग परमात्मा शिव की तथा देवताओ की पूजा के अतिरिक्त सुर्य की, पीपल के वृक्ष की, अग्नि की तथा अन्यान्य जड़ तत्वों की भी पूजा करने लगे और बिलकुल देह-अभिमानी, विकारी और पतित बन गए उनका आहार-व्यवहार. दृष्टी वृत्ति, मन, वचन और कर्म तमोगुणी और विकाराधीन हो गया I
कलियुग के अंत में सभी मनुष्य तमोप्रधन और आसुरी लक्षणों वाले होते है अत: सतयुग और त्रेतायुग की सतोगुणी, दैवी सृष्टि स्वर्ग (वैकुण्ठ) और उसकी तुलना में द्वापरयुग तथा कलियुग की सृष्टि ही नरक है I
प्रभु मिलन का गुप्त युग भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को
प्रभु मिलन का गुप्त युग
भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को भी मानते है इस मास में लोग तीर्थ यात्रा का विशेष महात्म्य मानते है और बहुत दान-पुन्य भी करते है तथा अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा में भी काफी समय देते है वे प्रात: अम्रुत्वेले ही गंगा स्नान करने में बहुत पुन्य समझते है I
वास्तव में "पुरुषोत्तम" शब्द परमपिता परमात्मा ही का वाचक है जैसे "आत्मा" को पुरुष भी कहा जाता है, वैसे ही परमात्मा के लिए "परम पुरुष" अथवा "पुरुषोत्तम" शब्द का प्रयोग होता है क्योकि वह सभी पुरुषो (आत्माओं) से ज्ञान, शांति,पवित्रता और शक्ति से उत्तम है " पुरुषोत्तम मास" कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ के संगम्युग की याद दिलाता है क्योंकि इस युग में पुरुषोत्तम (परमपिता) परमात्मा का अवतरण होता है I सतयुग के आरंभ से लेकर कलियुग के अंत तक मनुष्यात्माओ का जन्म तो मनुशात्माओं का जन्म -पुनर्जन्म होता ही रहता है परन्तु कलियुग के अंत में सतयुग और सतधर्म की तथा उत्तम मर्यादा की पुन: स्थापना के लिए पुरुषोत्तम (परमात्मा) को आना पड़ता है I इस "संगमयुग" में परमपिता परमात्मा मनुष्यात्माओ को ज्ञान और सहज राजयोग सीखकर वापिस परमधाम अथवा ब्रह्मलोक में ले जाते है इस प्रकार सभी मनुष्यात्माए शिवपुरी अथवा विष्णुपुरी की अव्यक्ति अवं अध्यात्मिक यात्रा करती है और ज्ञान चर्चा अथवा ज्ञान गंगा में स्नान करके पावन बनती है परन्तु आज लोग इन रहस्यों को न जानने के कारण गंगा नदी में स्नान करते है और शिव तथा विष्णु की स्थूल यादगारों की यात्रा करते है वास्तव में "पुरुषोत्तम" मास में जिस दान का महत्व है, वह दान पञ्च विकारो का है परमपिता परमात्मा जब पुरुषोत्तम युग में अवतरित होते है तो मनुष्य आत्माओं को बुराईयों तथा विकारो का दान देने की शिक्षा देते है इस प्रकार, वे काम-क्रोधादि विकारो को त्यागकर उत्तम मर्यादा वाले बन जाते है और उसके बाद सतयुग, देवयुग का आरंभ हो जाता है आज यदि इन रहस्यों को
जानकर मनुष्य विकारो का दान दे, ज्ञान-गंगा में नित्य स्नान करे और योग द्वारा देह से न्यारा होकर सच्ची अध्यात्मिक यात्रा करे तो विश्व में पुन: सुख,शांति संपन्न राम-राज्य(स्वर्ग) की स्थापना हो जाएगी और नर तथा नारी नरक से निकल स्वर्ग में पहुँच जायेंगे चित्र में भी इस रहस्य को प्रदर्शित किया गया है I
यहाँ संगमयुग में श्वेत वस्त्रधारी प्रजापिता ब्रह्मा, जगदम्बा सरस्वती तथा कुछेक मुख्वंशी ब्राह्मण और ब्राह्मनियो को परमपिता परमात्मा शिव से योग लगते दिखाया गया है इस राजयोग द्वारा ही मन का मेल धुलता है, पिछले विकर्म दग्ध होते है और संस्कार सतोप्रधन बनते है अत: नीचे की ओर नरक के व्यक्ति ज्ञान एवं योग-अग्नि प्रज्वलित करके काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार को इस सूक्ष्म अग्नि में स्वः कटे दिखाए गए है I इसी के फलस्वरूप,वे नर से श्री नारायण और नारी से श्री लक्ष्मी बनकर अर्थात "मनुष्य से देवता" पद का अधिकार पाकर सुखधाम- वैकुण्ठ अथवा स्वर्ग में पवित्र एवं सम्पूर्ण सुख शांति संपन्न स्वराज्य के अधिकारी बने है I
मालूम रहे पर्त्मन समय यह संगम युग ही चल रहा है I अव यह कलियुगी सृष्टि नरक अर्थात दुख्धाम
है I अब निकट भविष्य में सतयुग आने वाला है जबकि यही सृष्टि सुखधाम होगी अत: अब हमें पवित्र एवं योगी बनना ही चाहिए I
भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को भी मानते है इस मास में लोग तीर्थ यात्रा का विशेष महात्म्य मानते है और बहुत दान-पुन्य भी करते है तथा अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा में भी काफी समय देते है वे प्रात: अम्रुत्वेले ही गंगा स्नान करने में बहुत पुन्य समझते है I
वास्तव में "पुरुषोत्तम" शब्द परमपिता परमात्मा ही का वाचक है जैसे "आत्मा" को पुरुष भी कहा जाता है, वैसे ही परमात्मा के लिए "परम पुरुष" अथवा "पुरुषोत्तम" शब्द का प्रयोग होता है क्योकि वह सभी पुरुषो (आत्माओं) से ज्ञान, शांति,पवित्रता और शक्ति से उत्तम है " पुरुषोत्तम मास" कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ के संगम्युग की याद दिलाता है क्योंकि इस युग में पुरुषोत्तम (परमपिता) परमात्मा का अवतरण होता है I सतयुग के आरंभ से लेकर कलियुग के अंत तक मनुष्यात्माओ का जन्म तो मनुशात्माओं का जन्म -पुनर्जन्म होता ही रहता है परन्तु कलियुग के अंत में सतयुग और सतधर्म की तथा उत्तम मर्यादा की पुन: स्थापना के लिए पुरुषोत्तम (परमात्मा) को आना पड़ता है I इस "संगमयुग" में परमपिता परमात्मा मनुष्यात्माओ को ज्ञान और सहज राजयोग सीखकर वापिस परमधाम अथवा ब्रह्मलोक में ले जाते है इस प्रकार सभी मनुष्यात्माए शिवपुरी अथवा विष्णुपुरी की अव्यक्ति अवं अध्यात्मिक यात्रा करती है और ज्ञान चर्चा अथवा ज्ञान गंगा में स्नान करके पावन बनती है परन्तु आज लोग इन रहस्यों को न जानने के कारण गंगा नदी में स्नान करते है और शिव तथा विष्णु की स्थूल यादगारों की यात्रा करते है वास्तव में "पुरुषोत्तम" मास में जिस दान का महत्व है, वह दान पञ्च विकारो का है परमपिता परमात्मा जब पुरुषोत्तम युग में अवतरित होते है तो मनुष्य आत्माओं को बुराईयों तथा विकारो का दान देने की शिक्षा देते है इस प्रकार, वे काम-क्रोधादि विकारो को त्यागकर उत्तम मर्यादा वाले बन जाते है और उसके बाद सतयुग, देवयुग का आरंभ हो जाता है आज यदि इन रहस्यों को
जानकर मनुष्य विकारो का दान दे, ज्ञान-गंगा में नित्य स्नान करे और योग द्वारा देह से न्यारा होकर सच्ची अध्यात्मिक यात्रा करे तो विश्व में पुन: सुख,शांति संपन्न राम-राज्य(स्वर्ग) की स्थापना हो जाएगी और नर तथा नारी नरक से निकल स्वर्ग में पहुँच जायेंगे चित्र में भी इस रहस्य को प्रदर्शित किया गया है I
यहाँ संगमयुग में श्वेत वस्त्रधारी प्रजापिता ब्रह्मा, जगदम्बा सरस्वती तथा कुछेक मुख्वंशी ब्राह्मण और ब्राह्मनियो को परमपिता परमात्मा शिव से योग लगते दिखाया गया है इस राजयोग द्वारा ही मन का मेल धुलता है, पिछले विकर्म दग्ध होते है और संस्कार सतोप्रधन बनते है अत: नीचे की ओर नरक के व्यक्ति ज्ञान एवं योग-अग्नि प्रज्वलित करके काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार को इस सूक्ष्म अग्नि में स्वः कटे दिखाए गए है I इसी के फलस्वरूप,वे नर से श्री नारायण और नारी से श्री लक्ष्मी बनकर अर्थात "मनुष्य से देवता" पद का अधिकार पाकर सुखधाम- वैकुण्ठ अथवा स्वर्ग में पवित्र एवं सम्पूर्ण सुख शांति संपन्न स्वराज्य के अधिकारी बने है I
मालूम रहे पर्त्मन समय यह संगम युग ही चल रहा है I अव यह कलियुगी सृष्टि नरक अर्थात दुख्धाम
है I अब निकट भविष्य में सतयुग आने वाला है जबकि यही सृष्टि सुखधाम होगी अत: अब हमें पवित्र एवं योगी बनना ही चाहिए I
प्रभु मिलन का गुप्त युग भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को
प्रभु मिलन का गुप्त युग
भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को भी मानते है इस मास में लोग तीर्थ यात्रा का विशेष महात्म्य मानते है और बहुत दान-पुन्य भी करते है तथा अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा में भी काफी समय देते है वे प्रात: अम्रुत्वेले ही गंगा स्नान करने में बहुत पुन्य समझते है I
वास्तव में "पुरुषोत्तम" शब्द परमपिता परमात्मा ही का वाचक है जैसे "आत्मा" को पुरुष भी कहा जाता है, वैसे ही परमात्मा के लिए "परम पुरुष" अथवा "पुरुषोत्तम" शब्द का प्रयोग होता है क्योकि वह सभी पुरुषो (आत्माओं) से ज्ञान, शांति,पवित्रता और शक्ति से उत्तम है " पुरुषोत्तम मास" कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ के संगम्युग की याद दिलाता है क्योंकि इस युग में पुरुषोत्तम (परमपिता) परमात्मा का अवतरण होता है I सतयुग के आरंभ से लेकर कलियुग के अंत तक मनुष्यात्माओ का जन्म तो मनुशात्माओं का जन्म -पुनर्जन्म होता ही रहता है परन्तु कलियुग के अंत में सतयुग और सतधर्म की तथा उत्तम मर्यादा की पुन: स्थापना के लिए पुरुषोत्तम (परमात्मा) को आना पड़ता है I इस "संगमयुग" में परमपिता परमात्मा मनुष्यात्माओ को ज्ञान और सहज राजयोग सीखकर वापिस परमधाम अथवा ब्रह्मलोक में ले जाते है इस प्रकार सभी मनुष्यात्माए शिवपुरी अथवा विष्णुपुरी की अव्यक्ति अवं अध्यात्मिक यात्रा करती है और ज्ञान चर्चा अथवा ज्ञान गंगा में स्नान करके पावन बनती है परन्तु आज लोग इन रहस्यों को न जानने के कारण गंगा नदी में स्नान करते है और शिव तथा विष्णु की स्थूल यादगारों की यात्रा करते है वास्तव में "पुरुषोत्तम" मास में जिस दान का महत्व है, वह दान पञ्च विकारो का है परमपिता परमात्मा जब पुरुषोत्तम युग में अवतरित होते है तो मनुष्य आत्माओं को बुराईयों तथा विकारो का दान देने की शिक्षा देते है इस प्रकार, वे काम-क्रोधादि विकारो को त्यागकर उत्तम मर्यादा वाले बन जाते है और उसके बाद सतयुग, देवयुग का आरंभ हो जाता है आज यदि इन रहस्यों को
जानकर मनुष्य विकारो का दान दे, ज्ञान-गंगा में नित्य स्नान करे और योग द्वारा देह से न्यारा होकर सच्ची अध्यात्मिक यात्रा करे तो विश्व में पुन: सुख,शांति संपन्न राम-राज्य(स्वर्ग) की स्थापना हो जाएगी और नर तथा नारी नरक से निकल स्वर्ग में पहुँच जायेंगे चित्र में भी इस रहस्य को प्रदर्शित किया गया है I
यहाँ संगमयुग में श्वेत वस्त्रधारी प्रजापिता ब्रह्मा, जगदम्बा सरस्वती तथा कुछेक मुख्वंशी ब्राह्मण और ब्राह्मनियो को परमपिता परमात्मा शिव से योग लगते दिखाया गया है इस राजयोग द्वारा ही मन का मेल धुलता है, पिछले विकर्म दग्ध होते है और संस्कार सतोप्रधन बनते है अत: नीचे की ओर नरक के व्यक्ति ज्ञान एवं योग-अग्नि प्रज्वलित करके काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार को इस सूक्ष्म अग्नि में स्वः कटे दिखाए गए है I इसी के फलस्वरूप,वे नर से श्री नारायण और नारी से श्री लक्ष्मी बनकर अर्थात "मनुष्य से देवता" पद का अधिकार पाकर सुखधाम- वैकुण्ठ अथवा स्वर्ग में पवित्र एवं सम्पूर्ण सुख शांति संपन्न स्वराज्य के अधिकारी बने है I
मालूम रहे पर्त्मन समय यह संगम युग ही चल रहा है I अव यह कलियुगी सृष्टि नरक अर्थात दुख्धाम
है I अब निकट भविष्य में सतयुग आने वाला है जबकि यही सृष्टि सुखधाम होगी अत: अब हमें पवित्र एवं योगी बनना ही चाहिए I
भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को भी मानते है इस मास में लोग तीर्थ यात्रा का विशेष महात्म्य मानते है और बहुत दान-पुन्य भी करते है तथा अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा में भी काफी समय देते है वे प्रात: अम्रुत्वेले ही गंगा स्नान करने में बहुत पुन्य समझते है I
वास्तव में "पुरुषोत्तम" शब्द परमपिता परमात्मा ही का वाचक है जैसे "आत्मा" को पुरुष भी कहा जाता है, वैसे ही परमात्मा के लिए "परम पुरुष" अथवा "पुरुषोत्तम" शब्द का प्रयोग होता है क्योकि वह सभी पुरुषो (आत्माओं) से ज्ञान, शांति,पवित्रता और शक्ति से उत्तम है " पुरुषोत्तम मास" कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ के संगम्युग की याद दिलाता है क्योंकि इस युग में पुरुषोत्तम (परमपिता) परमात्मा का अवतरण होता है I सतयुग के आरंभ से लेकर कलियुग के अंत तक मनुष्यात्माओ का जन्म तो मनुशात्माओं का जन्म -पुनर्जन्म होता ही रहता है परन्तु कलियुग के अंत में सतयुग और सतधर्म की तथा उत्तम मर्यादा की पुन: स्थापना के लिए पुरुषोत्तम (परमात्मा) को आना पड़ता है I इस "संगमयुग" में परमपिता परमात्मा मनुष्यात्माओ को ज्ञान और सहज राजयोग सीखकर वापिस परमधाम अथवा ब्रह्मलोक में ले जाते है इस प्रकार सभी मनुष्यात्माए शिवपुरी अथवा विष्णुपुरी की अव्यक्ति अवं अध्यात्मिक यात्रा करती है और ज्ञान चर्चा अथवा ज्ञान गंगा में स्नान करके पावन बनती है परन्तु आज लोग इन रहस्यों को न जानने के कारण गंगा नदी में स्नान करते है और शिव तथा विष्णु की स्थूल यादगारों की यात्रा करते है वास्तव में "पुरुषोत्तम" मास में जिस दान का महत्व है, वह दान पञ्च विकारो का है परमपिता परमात्मा जब पुरुषोत्तम युग में अवतरित होते है तो मनुष्य आत्माओं को बुराईयों तथा विकारो का दान देने की शिक्षा देते है इस प्रकार, वे काम-क्रोधादि विकारो को त्यागकर उत्तम मर्यादा वाले बन जाते है और उसके बाद सतयुग, देवयुग का आरंभ हो जाता है आज यदि इन रहस्यों को
जानकर मनुष्य विकारो का दान दे, ज्ञान-गंगा में नित्य स्नान करे और योग द्वारा देह से न्यारा होकर सच्ची अध्यात्मिक यात्रा करे तो विश्व में पुन: सुख,शांति संपन्न राम-राज्य(स्वर्ग) की स्थापना हो जाएगी और नर तथा नारी नरक से निकल स्वर्ग में पहुँच जायेंगे चित्र में भी इस रहस्य को प्रदर्शित किया गया है I
यहाँ संगमयुग में श्वेत वस्त्रधारी प्रजापिता ब्रह्मा, जगदम्बा सरस्वती तथा कुछेक मुख्वंशी ब्राह्मण और ब्राह्मनियो को परमपिता परमात्मा शिव से योग लगते दिखाया गया है इस राजयोग द्वारा ही मन का मेल धुलता है, पिछले विकर्म दग्ध होते है और संस्कार सतोप्रधन बनते है अत: नीचे की ओर नरक के व्यक्ति ज्ञान एवं योग-अग्नि प्रज्वलित करके काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार को इस सूक्ष्म अग्नि में स्वः कटे दिखाए गए है I इसी के फलस्वरूप,वे नर से श्री नारायण और नारी से श्री लक्ष्मी बनकर अर्थात "मनुष्य से देवता" पद का अधिकार पाकर सुखधाम- वैकुण्ठ अथवा स्वर्ग में पवित्र एवं सम्पूर्ण सुख शांति संपन्न स्वराज्य के अधिकारी बने है I
मालूम रहे पर्त्मन समय यह संगम युग ही चल रहा है I अव यह कलियुगी सृष्टि नरक अर्थात दुख्धाम
है I अब निकट भविष्य में सतयुग आने वाला है जबकि यही सृष्टि सुखधाम होगी अत: अब हमें पवित्र एवं योगी बनना ही चाहिए I
प्रभु मिलन का गुप्त युग भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को
प्रभु मिलन का गुप्त युग
भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को भी मानते है इस मास में लोग तीर्थ यात्रा का विशेष महात्म्य मानते है और बहुत दान-पुन्य भी करते है तथा अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा में भी काफी समय देते है वे प्रात: अम्रुत्वेले ही गंगा स्नान करने में बहुत पुन्य समझते है I
वास्तव में "पुरुषोत्तम" शब्द परमपिता परमात्मा ही का वाचक है जैसे "आत्मा" को पुरुष भी कहा जाता है, वैसे ही परमात्मा के लिए "परम पुरुष" अथवा "पुरुषोत्तम" शब्द का प्रयोग होता है क्योकि वह सभी पुरुषो (आत्माओं) से ज्ञान, शांति,पवित्रता और शक्ति से उत्तम है " पुरुषोत्तम मास" कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ के संगम्युग की याद दिलाता है क्योंकि इस युग में पुरुषोत्तम (परमपिता) परमात्मा का अवतरण होता है I सतयुग के आरंभ से लेकर कलियुग के अंत तक मनुष्यात्माओ का जन्म तो मनुशात्माओं का जन्म -पुनर्जन्म होता ही रहता है परन्तु कलियुग के अंत में सतयुग और सतधर्म की तथा उत्तम मर्यादा की पुन: स्थापना के लिए पुरुषोत्तम (परमात्मा) को आना पड़ता है I इस "संगमयुग" में परमपिता परमात्मा मनुष्यात्माओ को ज्ञान और सहज राजयोग सीखकर वापिस परमधाम अथवा ब्रह्मलोक में ले जाते है इस प्रकार सभी मनुष्यात्माए शिवपुरी अथवा विष्णुपुरी की अव्यक्ति अवं अध्यात्मिक यात्रा करती है और ज्ञान चर्चा अथवा ज्ञान गंगा में स्नान करके पावन बनती है परन्तु आज लोग इन रहस्यों को न जानने के कारण गंगा नदी में स्नान करते है और शिव तथा विष्णु की स्थूल यादगारों की यात्रा करते है वास्तव में "पुरुषोत्तम" मास में जिस दान का महत्व है, वह दान पञ्च विकारो का है परमपिता परमात्मा जब पुरुषोत्तम युग में अवतरित होते है तो मनुष्य आत्माओं को बुराईयों तथा विकारो का दान देने की शिक्षा देते है इस प्रकार, वे काम-क्रोधादि विकारो को त्यागकर उत्तम मर्यादा वाले बन जाते है और उसके बाद सतयुग, देवयुग का आरंभ हो जाता है आज यदि इन रहस्यों को
जानकर मनुष्य विकारो का दान दे, ज्ञान-गंगा में नित्य स्नान करे और योग द्वारा देह से न्यारा होकर सच्ची अध्यात्मिक यात्रा करे तो विश्व में पुन: सुख,शांति संपन्न राम-राज्य(स्वर्ग) की स्थापना हो जाएगी और नर तथा नारी नरक से निकल स्वर्ग में पहुँच जायेंगे चित्र में भी इस रहस्य को प्रदर्शित किया गया है I
यहाँ संगमयुग में श्वेत वस्त्रधारी प्रजापिता ब्रह्मा, जगदम्बा सरस्वती तथा कुछेक मुख्वंशी ब्राह्मण और ब्राह्मनियो को परमपिता परमात्मा शिव से योग लगते दिखाया गया है इस राजयोग द्वारा ही मन का मेल धुलता है, पिछले विकर्म दग्ध होते है और संस्कार सतोप्रधन बनते है अत: नीचे की ओर नरक के व्यक्ति ज्ञान एवं योग-अग्नि प्रज्वलित करके काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार को इस सूक्ष्म अग्नि में स्वः कटे दिखाए गए है I इसी के फलस्वरूप,वे नर से श्री नारायण और नारी से श्री लक्ष्मी बनकर अर्थात "मनुष्य से देवता" पद का अधिकार पाकर सुखधाम- वैकुण्ठ अथवा स्वर्ग में पवित्र एवं सम्पूर्ण सुख शांति संपन्न स्वराज्य के अधिकारी बने है I
मालूम रहे पर्त्मन समय यह संगम युग ही चल रहा है I अव यह कलियुगी सृष्टि नरक अर्थात दुख्धाम
है I अब निकट भविष्य में सतयुग आने वाला है जबकि यही सृष्टि सुखधाम होगी अत: अब हमें पवित्र एवं योगी बनना ही चाहिए I
भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को भी मानते है इस मास में लोग तीर्थ यात्रा का विशेष महात्म्य मानते है और बहुत दान-पुन्य भी करते है तथा अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा में भी काफी समय देते है वे प्रात: अम्रुत्वेले ही गंगा स्नान करने में बहुत पुन्य समझते है I
वास्तव में "पुरुषोत्तम" शब्द परमपिता परमात्मा ही का वाचक है जैसे "आत्मा" को पुरुष भी कहा जाता है, वैसे ही परमात्मा के लिए "परम पुरुष" अथवा "पुरुषोत्तम" शब्द का प्रयोग होता है क्योकि वह सभी पुरुषो (आत्माओं) से ज्ञान, शांति,पवित्रता और शक्ति से उत्तम है " पुरुषोत्तम मास" कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ के संगम्युग की याद दिलाता है क्योंकि इस युग में पुरुषोत्तम (परमपिता) परमात्मा का अवतरण होता है I सतयुग के आरंभ से लेकर कलियुग के अंत तक मनुष्यात्माओ का जन्म तो मनुशात्माओं का जन्म -पुनर्जन्म होता ही रहता है परन्तु कलियुग के अंत में सतयुग और सतधर्म की तथा उत्तम मर्यादा की पुन: स्थापना के लिए पुरुषोत्तम (परमात्मा) को आना पड़ता है I इस "संगमयुग" में परमपिता परमात्मा मनुष्यात्माओ को ज्ञान और सहज राजयोग सीखकर वापिस परमधाम अथवा ब्रह्मलोक में ले जाते है इस प्रकार सभी मनुष्यात्माए शिवपुरी अथवा विष्णुपुरी की अव्यक्ति अवं अध्यात्मिक यात्रा करती है और ज्ञान चर्चा अथवा ज्ञान गंगा में स्नान करके पावन बनती है परन्तु आज लोग इन रहस्यों को न जानने के कारण गंगा नदी में स्नान करते है और शिव तथा विष्णु की स्थूल यादगारों की यात्रा करते है वास्तव में "पुरुषोत्तम" मास में जिस दान का महत्व है, वह दान पञ्च विकारो का है परमपिता परमात्मा जब पुरुषोत्तम युग में अवतरित होते है तो मनुष्य आत्माओं को बुराईयों तथा विकारो का दान देने की शिक्षा देते है इस प्रकार, वे काम-क्रोधादि विकारो को त्यागकर उत्तम मर्यादा वाले बन जाते है और उसके बाद सतयुग, देवयुग का आरंभ हो जाता है आज यदि इन रहस्यों को
जानकर मनुष्य विकारो का दान दे, ज्ञान-गंगा में नित्य स्नान करे और योग द्वारा देह से न्यारा होकर सच्ची अध्यात्मिक यात्रा करे तो विश्व में पुन: सुख,शांति संपन्न राम-राज्य(स्वर्ग) की स्थापना हो जाएगी और नर तथा नारी नरक से निकल स्वर्ग में पहुँच जायेंगे चित्र में भी इस रहस्य को प्रदर्शित किया गया है I
यहाँ संगमयुग में श्वेत वस्त्रधारी प्रजापिता ब्रह्मा, जगदम्बा सरस्वती तथा कुछेक मुख्वंशी ब्राह्मण और ब्राह्मनियो को परमपिता परमात्मा शिव से योग लगते दिखाया गया है इस राजयोग द्वारा ही मन का मेल धुलता है, पिछले विकर्म दग्ध होते है और संस्कार सतोप्रधन बनते है अत: नीचे की ओर नरक के व्यक्ति ज्ञान एवं योग-अग्नि प्रज्वलित करके काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार को इस सूक्ष्म अग्नि में स्वः कटे दिखाए गए है I इसी के फलस्वरूप,वे नर से श्री नारायण और नारी से श्री लक्ष्मी बनकर अर्थात "मनुष्य से देवता" पद का अधिकार पाकर सुखधाम- वैकुण्ठ अथवा स्वर्ग में पवित्र एवं सम्पूर्ण सुख शांति संपन्न स्वराज्य के अधिकारी बने है I
मालूम रहे पर्त्मन समय यह संगम युग ही चल रहा है I अव यह कलियुगी सृष्टि नरक अर्थात दुख्धाम
है I अब निकट भविष्य में सतयुग आने वाला है जबकि यही सृष्टि सुखधाम होगी अत: अब हमें पवित्र एवं योगी बनना ही चाहिए I
प्रभु मिलन का गुप्त युग भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को
प्रभु मिलन का गुप्त युग
भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को भी मानते है इस मास में लोग तीर्थ यात्रा का विशेष महात्म्य मानते है और बहुत दान-पुन्य भी करते है तथा अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा में भी काफी समय देते है वे प्रात: अम्रुत्वेले ही गंगा स्नान करने में बहुत पुन्य समझते है I
वास्तव में "पुरुषोत्तम" शब्द परमपिता परमात्मा ही का वाचक है जैसे "आत्मा" को पुरुष भी कहा जाता है, वैसे ही परमात्मा के लिए "परम पुरुष" अथवा "पुरुषोत्तम" शब्द का प्रयोग होता है क्योकि वह सभी पुरुषो (आत्माओं) से ज्ञान, शांति,पवित्रता और शक्ति से उत्तम है " पुरुषोत्तम मास" कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ के संगम्युग की याद दिलाता है क्योंकि इस युग में पुरुषोत्तम (परमपिता) परमात्मा का अवतरण होता है I सतयुग के आरंभ से लेकर कलियुग के अंत तक मनुष्यात्माओ का जन्म तो मनुशात्माओं का जन्म -पुनर्जन्म होता ही रहता है परन्तु कलियुग के अंत में सतयुग और सतधर्म की तथा उत्तम मर्यादा की पुन: स्थापना के लिए पुरुषोत्तम (परमात्मा) को आना पड़ता है I इस "संगमयुग" में परमपिता परमात्मा मनुष्यात्माओ को ज्ञान और सहज राजयोग सीखकर वापिस परमधाम अथवा ब्रह्मलोक में ले जाते है इस प्रकार सभी मनुष्यात्माए शिवपुरी अथवा विष्णुपुरी की अव्यक्ति अवं अध्यात्मिक यात्रा करती है और ज्ञान चर्चा अथवा ज्ञान गंगा में स्नान करके पावन बनती है परन्तु आज लोग इन रहस्यों को न जानने के कारण गंगा नदी में स्नान करते है और शिव तथा विष्णु की स्थूल यादगारों की यात्रा करते है वास्तव में "पुरुषोत्तम" मास में जिस दान का महत्व है, वह दान पञ्च विकारो का है परमपिता परमात्मा जब पुरुषोत्तम युग में अवतरित होते है तो मनुष्य आत्माओं को बुराईयों तथा विकारो का दान देने की शिक्षा देते है इस प्रकार, वे काम-क्रोधादि विकारो को त्यागकर उत्तम मर्यादा वाले बन जाते है और उसके बाद सतयुग, देवयुग का आरंभ हो जाता है आज यदि इन रहस्यों को
जानकर मनुष्य विकारो का दान दे, ज्ञान-गंगा में नित्य स्नान करे और योग द्वारा देह से न्यारा होकर सच्ची अध्यात्मिक यात्रा करे तो विश्व में पुन: सुख,शांति संपन्न राम-राज्य(स्वर्ग) की स्थापना हो जाएगी और नर तथा नारी नरक से निकल स्वर्ग में पहुँच जायेंगे चित्र में भी इस रहस्य को प्रदर्शित किया गया है I
यहाँ संगमयुग में श्वेत वस्त्रधारी प्रजापिता ब्रह्मा, जगदम्बा सरस्वती तथा कुछेक मुख्वंशी ब्राह्मण और ब्राह्मनियो को परमपिता परमात्मा शिव से योग लगते दिखाया गया है इस राजयोग द्वारा ही मन का मेल धुलता है, पिछले विकर्म दग्ध होते है और संस्कार सतोप्रधन बनते है अत: नीचे की ओर नरक के व्यक्ति ज्ञान एवं योग-अग्नि प्रज्वलित करके काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार को इस सूक्ष्म अग्नि में स्वः कटे दिखाए गए है I इसी के फलस्वरूप,वे नर से श्री नारायण और नारी से श्री लक्ष्मी बनकर अर्थात "मनुष्य से देवता" पद का अधिकार पाकर सुखधाम- वैकुण्ठ अथवा स्वर्ग में पवित्र एवं सम्पूर्ण सुख शांति संपन्न स्वराज्य के अधिकारी बने है I
मालूम रहे पर्त्मन समय यह संगम युग ही चल रहा है I अव यह कलियुगी सृष्टि नरक अर्थात दुख्धाम
है I अब निकट भविष्य में सतयुग आने वाला है जबकि यही सृष्टि सुखधाम होगी अत: अब हमें पवित्र एवं योगी बनना ही चाहिए I
भारत में आदि सनातन धर्म के लोग जैसे अन्य त्योहारों, पर्वो इत्यादि को बड़ी श्रुद्ध से मानते है, वैसे भी पुरुषोत्तम मास को भी मानते है इस मास में लोग तीर्थ यात्रा का विशेष महात्म्य मानते है और बहुत दान-पुन्य भी करते है तथा अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा में भी काफी समय देते है वे प्रात: अम्रुत्वेले ही गंगा स्नान करने में बहुत पुन्य समझते है I
वास्तव में "पुरुषोत्तम" शब्द परमपिता परमात्मा ही का वाचक है जैसे "आत्मा" को पुरुष भी कहा जाता है, वैसे ही परमात्मा के लिए "परम पुरुष" अथवा "पुरुषोत्तम" शब्द का प्रयोग होता है क्योकि वह सभी पुरुषो (आत्माओं) से ज्ञान, शांति,पवित्रता और शक्ति से उत्तम है " पुरुषोत्तम मास" कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ के संगम्युग की याद दिलाता है क्योंकि इस युग में पुरुषोत्तम (परमपिता) परमात्मा का अवतरण होता है I सतयुग के आरंभ से लेकर कलियुग के अंत तक मनुष्यात्माओ का जन्म तो मनुशात्माओं का जन्म -पुनर्जन्म होता ही रहता है परन्तु कलियुग के अंत में सतयुग और सतधर्म की तथा उत्तम मर्यादा की पुन: स्थापना के लिए पुरुषोत्तम (परमात्मा) को आना पड़ता है I इस "संगमयुग" में परमपिता परमात्मा मनुष्यात्माओ को ज्ञान और सहज राजयोग सीखकर वापिस परमधाम अथवा ब्रह्मलोक में ले जाते है इस प्रकार सभी मनुष्यात्माए शिवपुरी अथवा विष्णुपुरी की अव्यक्ति अवं अध्यात्मिक यात्रा करती है और ज्ञान चर्चा अथवा ज्ञान गंगा में स्नान करके पावन बनती है परन्तु आज लोग इन रहस्यों को न जानने के कारण गंगा नदी में स्नान करते है और शिव तथा विष्णु की स्थूल यादगारों की यात्रा करते है वास्तव में "पुरुषोत्तम" मास में जिस दान का महत्व है, वह दान पञ्च विकारो का है परमपिता परमात्मा जब पुरुषोत्तम युग में अवतरित होते है तो मनुष्य आत्माओं को बुराईयों तथा विकारो का दान देने की शिक्षा देते है इस प्रकार, वे काम-क्रोधादि विकारो को त्यागकर उत्तम मर्यादा वाले बन जाते है और उसके बाद सतयुग, देवयुग का आरंभ हो जाता है आज यदि इन रहस्यों को
जानकर मनुष्य विकारो का दान दे, ज्ञान-गंगा में नित्य स्नान करे और योग द्वारा देह से न्यारा होकर सच्ची अध्यात्मिक यात्रा करे तो विश्व में पुन: सुख,शांति संपन्न राम-राज्य(स्वर्ग) की स्थापना हो जाएगी और नर तथा नारी नरक से निकल स्वर्ग में पहुँच जायेंगे चित्र में भी इस रहस्य को प्रदर्शित किया गया है I
यहाँ संगमयुग में श्वेत वस्त्रधारी प्रजापिता ब्रह्मा, जगदम्बा सरस्वती तथा कुछेक मुख्वंशी ब्राह्मण और ब्राह्मनियो को परमपिता परमात्मा शिव से योग लगते दिखाया गया है इस राजयोग द्वारा ही मन का मेल धुलता है, पिछले विकर्म दग्ध होते है और संस्कार सतोप्रधन बनते है अत: नीचे की ओर नरक के व्यक्ति ज्ञान एवं योग-अग्नि प्रज्वलित करके काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार को इस सूक्ष्म अग्नि में स्वः कटे दिखाए गए है I इसी के फलस्वरूप,वे नर से श्री नारायण और नारी से श्री लक्ष्मी बनकर अर्थात "मनुष्य से देवता" पद का अधिकार पाकर सुखधाम- वैकुण्ठ अथवा स्वर्ग में पवित्र एवं सम्पूर्ण सुख शांति संपन्न स्वराज्य के अधिकारी बने है I
मालूम रहे पर्त्मन समय यह संगम युग ही चल रहा है I अव यह कलियुगी सृष्टि नरक अर्थात दुख्धाम
है I अब निकट भविष्य में सतयुग आने वाला है जबकि यही सृष्टि सुखधाम होगी अत: अब हमें पवित्र एवं योगी बनना ही चाहिए I
मनुष्य के ८४ जन्मो की अदभुत कहानी मनुष्यात्मा सारे कल्प में अधिक से अधि कुल ८४ जन्म लेती है, वह ८४ लाख योनियों में पुनर्जन्म न
मनुष्य के ८४ जन्मो की अदभुत कहानी
मनुष्यात्मा सारे कल्प में अधिक से अधि कुल ८४ जन्म लेती है, वह ८४ लाख योनियों में पुनर्जन्म नहीं लेती है मनुष्यात्माओ के ८४ जन्मो के चक्र को ही यहाँ ८४ सीडियों के रूप में चित्रित किया गया है I चूँकि प्रजापिता ब्रह्मा और जगदम्बा सरस्वती मनुष्य समाज के अदि-पिता और अदि-माता है, इसलिए उनके ८४ जन्मो का सन्क्शिओत उल्लेख करने से अन्य म्नुश्यात्माओ का भी उनके अंतर्गत आ जायेगा हम यह तो बता आये है कि ब्रह्मा और सरस्वती संगम युग में परमपिता शिव के ज्ञान और योग द्वारा आरंभ में श्री नारायण और श्री लक्ष्मी पद पाते है
सतयुग और त्रेतायुग में २१ जन्म पूज्य देव पद : अब चित्र में दिखलाया गया है कि सतयुग के १२५० वेर्शो में श्रीलक्ष्मी, श्रीनारायण १०० प्रतिशत सुख शांति संपन्न ८ जन्म लेते है इसलिए भारत में ८ की संख्या शुभ मानी गयी है और कई लोग केवल ८ मनको की माला सिमरते है तथा अष्ट देवताओ का पूजन भी करते है पूज्य स्थिति वाले इन ८ नारायणी जन्मो को यहाँ ८ सीडियो के रूप में चित्रित किया गया है फिर त्रेतायुग के १२५० वर्षो में १४ कला सम्पूर्ण सीता और रामचंद्र के वंश में पूज्य रजा-रानी अथवा उच्च प्रजा के रूप में कुल १२ या १३ जन्म लेते है इस प्रकार सतयुग और त्रेतायुग के २५०० वर्षो में सम्पूर्ण पवित्रता, सुख, शांति और स्वास्थ्य संपन्न २१ दैवी जन्म लेते है इसलिए ही प्रसिद्द है की ज्ञान द्वारा मनुष्य २१ जन्म अथवा २१ पीडिया सुधर जाती है अथवा मनुष्य २१ पीड़ियो के लिए तर जाता है I
द्वापर और कलियुग में कुल ६३ जन्म जीवन-बद्ध : फिर सुख की प्रारब्ध समाप्त होने के बाद, वे द्वापर के आरम्भ में पुजारी स्थिति को प्राप्त होते है सबसे पहले तो निराकार परमपिता परमातम शिव को हीरे की प्रतिमा बनाकर अनन्य भावना से उसकी पूजा करते है यहाँ चित्र में उन्हें एक पुजारी राजा के रूप में शिव-पूजा करते दिखाया गया है I धीरे-धीरे वे सूक्ष्म देवताओ, अर्थात विष्णु तथा शंकर की भी पूजा शुरू करते है बाद में अज्यनता तथा आत्म-विस्मृति के कारण वे अपने ही पहले वाले श्री नारायण तथा श्री लक्ष्मी रूप की भी पूजा शुरू कर देते है I इसलिए, कहावत प्रसिद्द है कि "जो स्वयं कभी पूज्य थे, बाद में वे अपने- आप ही के पुजारी बन गए श्री लक्ष्मी और श्री नारायण कि आत्माओं ने स्वपर्युग के १२५० वर्षो में इसी पुजारी स्थिति में भिन्न-भिन्न नाम-रूप से, वैश्य-वंशी भक्त-शिरोमणि राजा,रानी अथवा सुखी प्रजा के रूप में कुल २१ जन्म लिए I
इसके बाद कलियुग का आरम्भ हुआ अब तो सूक्ष्म लोक तथा साकार लोक के देवी-देवताओ कि पूजा इत्यादि के अतिरिक्त तत्व पूजा भी शुरू हो गई इस प्रकार, भक्ति भी व्यभिचारी हो गई यह अवस्था सृष्टि की तमोप्रधन अथवा शुद्र अवस्था थी इस काल में काम, क्रोध,मोह,लोभ और अहंकार उग्र - रूप धारण करते चले गए कलियुग के अंत में उन्होंने तथा उनके वंश के दुसरे लोगो ने कुल ४२ जन्म लिए I
उपर्युक्त से स्पष्ट है की कुल ५००० वर्षो में उनकी आत्मा पूज्य और पुजारी अवस्था में कुल ८४ जन्म लेती है अब वह पुराणी, पतित दुनिया में ८३ जन्म ले चुकी है I अब उनके अंतिम अर्थात ८४वे जन्म की वानप्रस्थ अवस्था में, परमपिता परमपिता शिव ने उनका नाम "प्रजापिता ब्रह्मा" तथा उनकी मुख -वंशी कन्या का नाम "जगदम्बा सरस्वती" रखा है इस प्रकार, देवता-वंश की अन्य आत्माए भी ५००० वर्ष में अधिकाधिक ८४ जन्म लेती है I इसलिए भारत में जन्म-मरण के चक्र को " चौरासी का चक्कर" भी कहते है और कई देवियों के मन्दिरों में ८४ घंटे भी लगे होते है तथा उन्हें " ८४ घंटे वाली देवी" नाम से लोग याद करते है
मनुष्यात्मा सारे कल्प में अधिक से अधि कुल ८४ जन्म लेती है, वह ८४ लाख योनियों में पुनर्जन्म नहीं लेती है मनुष्यात्माओ के ८४ जन्मो के चक्र को ही यहाँ ८४ सीडियों के रूप में चित्रित किया गया है I चूँकि प्रजापिता ब्रह्मा और जगदम्बा सरस्वती मनुष्य समाज के अदि-पिता और अदि-माता है, इसलिए उनके ८४ जन्मो का सन्क्शिओत उल्लेख करने से अन्य म्नुश्यात्माओ का भी उनके अंतर्गत आ जायेगा हम यह तो बता आये है कि ब्रह्मा और सरस्वती संगम युग में परमपिता शिव के ज्ञान और योग द्वारा आरंभ में श्री नारायण और श्री लक्ष्मी पद पाते है
सतयुग और त्रेतायुग में २१ जन्म पूज्य देव पद : अब चित्र में दिखलाया गया है कि सतयुग के १२५० वेर्शो में श्रीलक्ष्मी, श्रीनारायण १०० प्रतिशत सुख शांति संपन्न ८ जन्म लेते है इसलिए भारत में ८ की संख्या शुभ मानी गयी है और कई लोग केवल ८ मनको की माला सिमरते है तथा अष्ट देवताओ का पूजन भी करते है पूज्य स्थिति वाले इन ८ नारायणी जन्मो को यहाँ ८ सीडियो के रूप में चित्रित किया गया है फिर त्रेतायुग के १२५० वर्षो में १४ कला सम्पूर्ण सीता और रामचंद्र के वंश में पूज्य रजा-रानी अथवा उच्च प्रजा के रूप में कुल १२ या १३ जन्म लेते है इस प्रकार सतयुग और त्रेतायुग के २५०० वर्षो में सम्पूर्ण पवित्रता, सुख, शांति और स्वास्थ्य संपन्न २१ दैवी जन्म लेते है इसलिए ही प्रसिद्द है की ज्ञान द्वारा मनुष्य २१ जन्म अथवा २१ पीडिया सुधर जाती है अथवा मनुष्य २१ पीड़ियो के लिए तर जाता है I
द्वापर और कलियुग में कुल ६३ जन्म जीवन-बद्ध : फिर सुख की प्रारब्ध समाप्त होने के बाद, वे द्वापर के आरम्भ में पुजारी स्थिति को प्राप्त होते है सबसे पहले तो निराकार परमपिता परमातम शिव को हीरे की प्रतिमा बनाकर अनन्य भावना से उसकी पूजा करते है यहाँ चित्र में उन्हें एक पुजारी राजा के रूप में शिव-पूजा करते दिखाया गया है I धीरे-धीरे वे सूक्ष्म देवताओ, अर्थात विष्णु तथा शंकर की भी पूजा शुरू करते है बाद में अज्यनता तथा आत्म-विस्मृति के कारण वे अपने ही पहले वाले श्री नारायण तथा श्री लक्ष्मी रूप की भी पूजा शुरू कर देते है I इसलिए, कहावत प्रसिद्द है कि "जो स्वयं कभी पूज्य थे, बाद में वे अपने- आप ही के पुजारी बन गए श्री लक्ष्मी और श्री नारायण कि आत्माओं ने स्वपर्युग के १२५० वर्षो में इसी पुजारी स्थिति में भिन्न-भिन्न नाम-रूप से, वैश्य-वंशी भक्त-शिरोमणि राजा,रानी अथवा सुखी प्रजा के रूप में कुल २१ जन्म लिए I
इसके बाद कलियुग का आरम्भ हुआ अब तो सूक्ष्म लोक तथा साकार लोक के देवी-देवताओ कि पूजा इत्यादि के अतिरिक्त तत्व पूजा भी शुरू हो गई इस प्रकार, भक्ति भी व्यभिचारी हो गई यह अवस्था सृष्टि की तमोप्रधन अथवा शुद्र अवस्था थी इस काल में काम, क्रोध,मोह,लोभ और अहंकार उग्र - रूप धारण करते चले गए कलियुग के अंत में उन्होंने तथा उनके वंश के दुसरे लोगो ने कुल ४२ जन्म लिए I
उपर्युक्त से स्पष्ट है की कुल ५००० वर्षो में उनकी आत्मा पूज्य और पुजारी अवस्था में कुल ८४ जन्म लेती है अब वह पुराणी, पतित दुनिया में ८३ जन्म ले चुकी है I अब उनके अंतिम अर्थात ८४वे जन्म की वानप्रस्थ अवस्था में, परमपिता परमपिता शिव ने उनका नाम "प्रजापिता ब्रह्मा" तथा उनकी मुख -वंशी कन्या का नाम "जगदम्बा सरस्वती" रखा है इस प्रकार, देवता-वंश की अन्य आत्माए भी ५००० वर्ष में अधिकाधिक ८४ जन्म लेती है I इसलिए भारत में जन्म-मरण के चक्र को " चौरासी का चक्कर" भी कहते है और कई देवियों के मन्दिरों में ८४ घंटे भी लगे होते है तथा उन्हें " ८४ घंटे वाली देवी" नाम से लोग याद करते है
तीन बातें 1 तीन बातें कभी न भूलें - प्रतिज्ञा करके, क़र्ज़ लेकर और विश्वास देकर। - महावीर 2 तीन बातें करो - उत्तम के साथ संगीत, विद्वान् के साथ वा
तीन बातें
1 तीन बातें कभी न भूलें - प्रतिज्ञा करके, क़र्ज़ लेकर और विश्वास देकर। - महावीर
2 तीन बातें करो - उत्तम के साथ संगीत, विद्वान् के साथ वार्तालाप और सहृदय के साथ मैत्री। -
3 तीन अनमोल वचन - धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया और चरित्र गया तो सब गया। -
4 तीन से घृणा न करो - रोगी से, दुखी से और निम्न जाती से। -
5 तीन के आंसू पवित्र होते हैं - प्रेम के, करुना के और सहानुभूति के। -
6 तीन बातें सुखी जीवन के लिए- अतीत की चिंता मत करो, भविष्य का विश्वास न करो और वर्तमान को व्यर्थ मत जाने दो।
7 तीन चीजें किसी का इन्तजार नहीं करती - समय, मौत, ग्राहक।
8 तीन चीजें जीवन में एक बार मिलती है - मां, बांप, और जवानी।
9 तीन चीजें पर्दे योग्य है - धन, स्त्री और भोजन।
10 तीन चीजों से सदा सावधान रहिए - बुरी संगत, परस्त्री और निन्दा।
11 तीन चीजों में मन लगाने से उन्नति होती है - ईश्वर, परिश्रम और विद्या।
12 तीन चीजों को कभी छोटी ना समझे - बीमारी, कर्जा, शत्रु।
13 तीनों चीजों को हमेशा वश में रखो - मन, काम और लोभ।
14 तीन चीजें निकलने पर वापिस नहीं आती - तीर कमान से, बात जुबान से और प्राण शरीर से।
15 तीन चीजें कमजोर बना देती है - बदचलनी, क्रोध और लालच।
1 तीन बातें कभी न भूलें - प्रतिज्ञा करके, क़र्ज़ लेकर और विश्वास देकर। - महावीर
2 तीन बातें करो - उत्तम के साथ संगीत, विद्वान् के साथ वार्तालाप और सहृदय के साथ मैत्री। -
3 तीन अनमोल वचन - धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया और चरित्र गया तो सब गया। -
4 तीन से घृणा न करो - रोगी से, दुखी से और निम्न जाती से। -
5 तीन के आंसू पवित्र होते हैं - प्रेम के, करुना के और सहानुभूति के। -
6 तीन बातें सुखी जीवन के लिए- अतीत की चिंता मत करो, भविष्य का विश्वास न करो और वर्तमान को व्यर्थ मत जाने दो।
7 तीन चीजें किसी का इन्तजार नहीं करती - समय, मौत, ग्राहक।
8 तीन चीजें जीवन में एक बार मिलती है - मां, बांप, और जवानी।
9 तीन चीजें पर्दे योग्य है - धन, स्त्री और भोजन।
10 तीन चीजों से सदा सावधान रहिए - बुरी संगत, परस्त्री और निन्दा।
11 तीन चीजों में मन लगाने से उन्नति होती है - ईश्वर, परिश्रम और विद्या।
12 तीन चीजों को कभी छोटी ना समझे - बीमारी, कर्जा, शत्रु।
13 तीनों चीजों को हमेशा वश में रखो - मन, काम और लोभ।
14 तीन चीजें निकलने पर वापिस नहीं आती - तीर कमान से, बात जुबान से और प्राण शरीर से।
15 तीन चीजें कमजोर बना देती है - बदचलनी, क्रोध और लालच।
मनुष्यात्मा ८४ लाख योनियाँ धारण नही करती परमपिता परमात्मा शिव ने वर्तमान समय जैसे हमें ईश्वरीय ज्ञान के अन्य अनेक मधुर रहस्य समझाए है, वैसे ही यह
मनुष्यात्मा ८४ लाख योनियाँ धारण नही करती
परमपिता परमात्मा शिव ने वर्तमान समय जैसे हमें ईश्वरीय ज्ञान के अन्य अनेक मधुर रहस्य समझाए है, वैसे ही यह भी एक नई बात समझाई है की वास्तव में मनुष्यात्मा पाशविक योनियों में जन्म नही लेती यह हमारे लिए बड़ी ही ख़ुशी की बात है I परन्तु फिर भी कई एसे लोग है जो यह कहते है कि मनुष्यात्मा, पशु , पक्षी इत्यादि ८४ लाख योनियों में जन्म-पुनर्जन्म लेती है I
वे कहते है कि -" जैसे किसी देश की सरकार अपराधी को दंड देने के लिए उसकी स्वतंत्रता को छीन लेती है और उसे एक कोठरी में बंद कर देती है I और उसे सुख सुविधा से कुछ काल के लिए वंचित कर देती है, वैसे ही यदि मनुष्य कोई बुरे कर्म करता है तो उसे उसके दंड के रूप में पशु, पक्षी इत्यादि, भोग योनियों में दुःख तथा परतंत्रता भोगनी पड़ती है" I
परन्तु अब परमपिता परमात्मा शिव ने समझाया है कि मनुष्यात्माये अपने बुरे कर्मो का दंड मनुष्य-योनी में ही भोगती है I परमात्मा कहते है कि मनुष्य बुरे गुण-कर्म-स्वभाव के कारण पशु से भी अधिक बुरा तो बन ही जाता है और पशु पक्षी से अधिक दुखी भी होता है, परन्तु वह पशु,पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म नही लेता यह तो हम देखते सुनते भी है कि मनुष्य, गूंगे, अंधे, बहरे, लंगड़े,, कोढ़ी चिर-रोगी तथा कंगाल होते है, यह भी हम देखते है कि कई पशु भी मनुष्यों से अधिक स्वतंत्र तथा सुखी होते है, उन्हें डबल रोटी तथा मक्खन खिलाया जाता है, सोफे पर सुलाया जाता है, मोटर कार में यात्रा कराई जाती है और बहुत ही प्यार और प्रेम से पला जाता है परन्तु इसे कितने ही मनुष्य संसार में है जो भूखे और अर्धनग्न जीवन व्यतीत करते है और जब वे पैसा या दो पैसा मांगने के लिए मनुष्यों के आगे हाथ फैलाते है तो अन्य मनुष्य उनहे अपमानित करते है कितने ही मनुष्य है जो सर्दी में ठिठुर कर, अथवा रोगियों कि हालत में सड़क कि पटरियों पर कुत्ते से भी बुरी मौत मर जाते है I और कितने ही मनुष्य तो अत्यंत वेदना और दुःख के वश अपने ही हाथो अपने आपको मर डालते है I अत: जब हम स्पष्ट देखते है कि मनुष्य योनी भी भोग योनी है और कि मनुष्य योनी में मानुष पशुओं से भी अधिक दुखी हो सकता है तो यह क्यों माना जाये कि मनुष्यात्मा को पशु-पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म लेना पड़ता है ?
जैसा बीज वैसा वृक्ष :
इसके अतिरिक्त, हरेक मनुष्यात्मा में अपने जन्म-जन्मान्तर का पार्ट अनादी काल से अव्यक्त रूप से भरा हुआ है और, इसीलिए. मनुष्यात्माए अनादी काल से परस्पर भिन्न-भिन्न गुण, कर्म, स्वभाव से अनादी काल से भिन्न है I अत: जैसे आम की गुठली में मिर्च पैदा नही हो सकती बल्कि "जैसा बीज वैसा ही वृक्ष होता है" ठीक वैसे ही मनुष्यात्माओ कि श्रेणी तो अलग ही है I मनुष्यात्माए पशु-पक्षी अदि ८४ लाख योनियों में जन्म नही लेती बल्कि मनुष्यात्माए सारे कल्प में मनुष्य योनी में ही अधिक से अधिक ८४ जन्म, पुनर्जन्म लेकर अपने-अपने कर्मो के अनुरूप सुख दुःख भोगती है I
यदि मनुष्यात्मा पशु योनी में पुनर्जन्म लेती तो मनुष्य गणना बढती न जाती:
आप स्वयं ही सोचिये कि यदि बुरे कर्मो के कारण मनुष्यात्मा का जन्म पशु योनी में होता, तब तो हर वर्ष मानुष-गणना बढती न जाती, बल्कि घटती जाती क्योंकि आज सभी के कर्म, विकारो के कारण विकर्म बन रहे है I परन्तु आप देखते है कि फिर भी मनुष्य गणना बढती ही जाती है क्योंकि मनुष्य पशु-पक्षी या कीट पतंग आदि योनियों में पुनर्जन्म नही ले रहे है I
वे कहते है कि -" जैसे किसी देश की सरकार अपराधी को दंड देने के लिए उसकी स्वतंत्रता को छीन लेती है और उसे एक कोठरी में बंद कर देती है I और उसे सुख सुविधा से कुछ काल के लिए वंचित कर देती है, वैसे ही यदि मनुष्य कोई बुरे कर्म करता है तो उसे उसके दंड के रूप में पशु, पक्षी इत्यादि, भोग योनियों में दुःख तथा परतंत्रता भोगनी पड़ती है" I
परन्तु अब परमपिता परमात्मा शिव ने समझाया है कि मनुष्यात्माये अपने बुरे कर्मो का दंड मनुष्य-योनी में ही भोगती है I परमात्मा कहते है कि मनुष्य बुरे गुण-कर्म-स्वभाव के कारण पशु से भी अधिक बुरा तो बन ही जाता है और पशु पक्षी से अधिक दुखी भी होता है, परन्तु वह पशु,पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म नही लेता यह तो हम देखते सुनते भी है कि मनुष्य, गूंगे, अंधे, बहरे, लंगड़े,, कोढ़ी चिर-रोगी तथा कंगाल होते है, यह भी हम देखते है कि कई पशु भी मनुष्यों से अधिक स्वतंत्र तथा सुखी होते है, उन्हें डबल रोटी तथा मक्खन खिलाया जाता है, सोफे पर सुलाया जाता है, मोटर कार में यात्रा कराई जाती है और बहुत ही प्यार और प्रेम से पला जाता है परन्तु इसे कितने ही मनुष्य संसार में है जो भूखे और अर्धनग्न जीवन व्यतीत करते है और जब वे पैसा या दो पैसा मांगने के लिए मनुष्यों के आगे हाथ फैलाते है तो अन्य मनुष्य उनहे अपमानित करते है कितने ही मनुष्य है जो सर्दी में ठिठुर कर, अथवा रोगियों कि हालत में सड़क कि पटरियों पर कुत्ते से भी बुरी मौत मर जाते है I और कितने ही मनुष्य तो अत्यंत वेदना और दुःख के वश अपने ही हाथो अपने आपको मर डालते है I अत: जब हम स्पष्ट देखते है कि मनुष्य योनी भी भोग योनी है और कि मनुष्य योनी में मानुष पशुओं से भी अधिक दुखी हो सकता है तो यह क्यों माना जाये कि मनुष्यात्मा को पशु-पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म लेना पड़ता है ?
जैसा बीज वैसा वृक्ष :
इसके अतिरिक्त, हरेक मनुष्यात्मा में अपने जन्म-जन्मान्तर का पार्ट अनादी काल से अव्यक्त रूप से भरा हुआ है और, इसीलिए. मनुष्यात्माए अनादी काल से परस्पर भिन्न-भिन्न गुण, कर्म, स्वभाव से अनादी काल से भिन्न है I अत: जैसे आम की गुठली में मिर्च पैदा नही हो सकती बल्कि "जैसा बीज वैसा ही वृक्ष होता है" ठीक वैसे ही मनुष्यात्माओ कि श्रेणी तो अलग ही है I मनुष्यात्माए पशु-पक्षी अदि ८४ लाख योनियों में जन्म नही लेती बल्कि मनुष्यात्माए सारे कल्प में मनुष्य योनी में ही अधिक से अधिक ८४ जन्म, पुनर्जन्म लेकर अपने-अपने कर्मो के अनुरूप सुख दुःख भोगती है I
यदि मनुष्यात्मा पशु योनी में पुनर्जन्म लेती तो मनुष्य गणना बढती न जाती:
आप स्वयं ही सोचिये कि यदि बुरे कर्मो के कारण मनुष्यात्मा का जन्म पशु योनी में होता, तब तो हर वर्ष मानुष-गणना बढती न जाती, बल्कि घटती जाती क्योंकि आज सभी के कर्म, विकारो के कारण विकर्म बन रहे है I परन्तु आप देखते है कि फिर भी मनुष्य गणना बढती ही जाती है क्योंकि मनुष्य पशु-पक्षी या कीट पतंग आदि योनियों में पुनर्जन्म नही ले रहे है I
परमपिता परमात्मा शिव ने वर्तमान समय जैसे हमें ईश्वरीय ज्ञान के अन्य अनेक मधुर रहस्य समझाए है, वैसे ही यह भी एक नई बात समझाई है की वास्तव में मनुष्यात्मा पाशविक योनियों में जन्म नही लेती यह हमारे लिए बड़ी ही ख़ुशी की बात है I परन्तु फिर भी कई एसे लोग है जो यह कहते है कि मनुष्यात्मा, पशु , पक्षी इत्यादि ८४ लाख योनियों में जन्म-पुनर्जन्म लेती है I
वे कहते है कि -" जैसे किसी देश की सरकार अपराधी को दंड देने के लिए उसकी स्वतंत्रता को छीन लेती है और उसे एक कोठरी में बंद कर देती है I और उसे सुख सुविधा से कुछ काल के लिए वंचित कर देती है, वैसे ही यदि मनुष्य कोई बुरे कर्म करता है तो उसे उसके दंड के रूप में पशु, पक्षी इत्यादि, भोग योनियों में दुःख तथा परतंत्रता भोगनी पड़ती है" I
परन्तु अब परमपिता परमात्मा शिव ने समझाया है कि मनुष्यात्माये अपने बुरे कर्मो का दंड मनुष्य-योनी में ही भोगती है I परमात्मा कहते है कि मनुष्य बुरे गुण-कर्म-स्वभाव के कारण पशु से भी अधिक बुरा तो बन ही जाता है और पशु पक्षी से अधिक दुखी भी होता है, परन्तु वह पशु,पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म नही लेता यह तो हम देखते सुनते भी है कि मनुष्य, गूंगे, अंधे, बहरे, लंगड़े,, कोढ़ी चिर-रोगी तथा कंगाल होते है, यह भी हम देखते है कि कई पशु भी मनुष्यों से अधिक स्वतंत्र तथा सुखी होते है, उन्हें डबल रोटी तथा मक्खन खिलाया जाता है, सोफे पर सुलाया जाता है, मोटर कार में यात्रा कराई जाती है और बहुत ही प्यार और प्रेम से पला जाता है परन्तु इसे कितने ही मनुष्य संसार में है जो भूखे और अर्धनग्न जीवन व्यतीत करते है और जब वे पैसा या दो पैसा मांगने के लिए मनुष्यों के आगे हाथ फैलाते है तो अन्य मनुष्य उनहे अपमानित करते है कितने ही मनुष्य है जो सर्दी में ठिठुर कर, अथवा रोगियों कि हालत में सड़क कि पटरियों पर कुत्ते से भी बुरी मौत मर जाते है I और कितने ही मनुष्य तो अत्यंत वेदना और दुःख के वश अपने ही हाथो अपने आपको मर डालते है I अत: जब हम स्पष्ट देखते है कि मनुष्य योनी भी भोग योनी है और कि मनुष्य योनी में मानुष पशुओं से भी अधिक दुखी हो सकता है तो यह क्यों माना जाये कि मनुष्यात्मा को पशु-पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म लेना पड़ता है ?
जैसा बीज वैसा वृक्ष :
इसके अतिरिक्त, हरेक मनुष्यात्मा में अपने जन्म-जन्मान्तर का पार्ट अनादी काल से अव्यक्त रूप से भरा हुआ है और, इसीलिए. मनुष्यात्माए अनादी काल से परस्पर भिन्न-भिन्न गुण, कर्म, स्वभाव से अनादी काल से भिन्न है I अत: जैसे आम की गुठली में मिर्च पैदा नही हो सकती बल्कि "जैसा बीज वैसा ही वृक्ष होता है" ठीक वैसे ही मनुष्यात्माओ कि श्रेणी तो अलग ही है I मनुष्यात्माए पशु-पक्षी अदि ८४ लाख योनियों में जन्म नही लेती बल्कि मनुष्यात्माए सारे कल्प में मनुष्य योनी में ही अधिक से अधिक ८४ जन्म, पुनर्जन्म लेकर अपने-अपने कर्मो के अनुरूप सुख दुःख भोगती है I
यदि मनुष्यात्मा पशु योनी में पुनर्जन्म लेती तो मनुष्य गणना बढती न जाती:
आप स्वयं ही सोचिये कि यदि बुरे कर्मो के कारण मनुष्यात्मा का जन्म पशु योनी में होता, तब तो हर वर्ष मानुष-गणना बढती न जाती, बल्कि घटती जाती क्योंकि आज सभी के कर्म, विकारो के कारण विकर्म बन रहे है I परन्तु आप देखते है कि फिर भी मनुष्य गणना बढती ही जाती है क्योंकि मनुष्य पशु-पक्षी या कीट पतंग आदि योनियों में पुनर्जन्म नही ले रहे है I
वे कहते है कि -" जैसे किसी देश की सरकार अपराधी को दंड देने के लिए उसकी स्वतंत्रता को छीन लेती है और उसे एक कोठरी में बंद कर देती है I और उसे सुख सुविधा से कुछ काल के लिए वंचित कर देती है, वैसे ही यदि मनुष्य कोई बुरे कर्म करता है तो उसे उसके दंड के रूप में पशु, पक्षी इत्यादि, भोग योनियों में दुःख तथा परतंत्रता भोगनी पड़ती है" I
परन्तु अब परमपिता परमात्मा शिव ने समझाया है कि मनुष्यात्माये अपने बुरे कर्मो का दंड मनुष्य-योनी में ही भोगती है I परमात्मा कहते है कि मनुष्य बुरे गुण-कर्म-स्वभाव के कारण पशु से भी अधिक बुरा तो बन ही जाता है और पशु पक्षी से अधिक दुखी भी होता है, परन्तु वह पशु,पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म नही लेता यह तो हम देखते सुनते भी है कि मनुष्य, गूंगे, अंधे, बहरे, लंगड़े,, कोढ़ी चिर-रोगी तथा कंगाल होते है, यह भी हम देखते है कि कई पशु भी मनुष्यों से अधिक स्वतंत्र तथा सुखी होते है, उन्हें डबल रोटी तथा मक्खन खिलाया जाता है, सोफे पर सुलाया जाता है, मोटर कार में यात्रा कराई जाती है और बहुत ही प्यार और प्रेम से पला जाता है परन्तु इसे कितने ही मनुष्य संसार में है जो भूखे और अर्धनग्न जीवन व्यतीत करते है और जब वे पैसा या दो पैसा मांगने के लिए मनुष्यों के आगे हाथ फैलाते है तो अन्य मनुष्य उनहे अपमानित करते है कितने ही मनुष्य है जो सर्दी में ठिठुर कर, अथवा रोगियों कि हालत में सड़क कि पटरियों पर कुत्ते से भी बुरी मौत मर जाते है I और कितने ही मनुष्य तो अत्यंत वेदना और दुःख के वश अपने ही हाथो अपने आपको मर डालते है I अत: जब हम स्पष्ट देखते है कि मनुष्य योनी भी भोग योनी है और कि मनुष्य योनी में मानुष पशुओं से भी अधिक दुखी हो सकता है तो यह क्यों माना जाये कि मनुष्यात्मा को पशु-पक्षी इत्यादि योनियों में जन्म लेना पड़ता है ?
जैसा बीज वैसा वृक्ष :
इसके अतिरिक्त, हरेक मनुष्यात्मा में अपने जन्म-जन्मान्तर का पार्ट अनादी काल से अव्यक्त रूप से भरा हुआ है और, इसीलिए. मनुष्यात्माए अनादी काल से परस्पर भिन्न-भिन्न गुण, कर्म, स्वभाव से अनादी काल से भिन्न है I अत: जैसे आम की गुठली में मिर्च पैदा नही हो सकती बल्कि "जैसा बीज वैसा ही वृक्ष होता है" ठीक वैसे ही मनुष्यात्माओ कि श्रेणी तो अलग ही है I मनुष्यात्माए पशु-पक्षी अदि ८४ लाख योनियों में जन्म नही लेती बल्कि मनुष्यात्माए सारे कल्प में मनुष्य योनी में ही अधिक से अधिक ८४ जन्म, पुनर्जन्म लेकर अपने-अपने कर्मो के अनुरूप सुख दुःख भोगती है I
यदि मनुष्यात्मा पशु योनी में पुनर्जन्म लेती तो मनुष्य गणना बढती न जाती:
आप स्वयं ही सोचिये कि यदि बुरे कर्मो के कारण मनुष्यात्मा का जन्म पशु योनी में होता, तब तो हर वर्ष मानुष-गणना बढती न जाती, बल्कि घटती जाती क्योंकि आज सभी के कर्म, विकारो के कारण विकर्म बन रहे है I परन्तु आप देखते है कि फिर भी मनुष्य गणना बढती ही जाती है क्योंकि मनुष्य पशु-पक्षी या कीट पतंग आदि योनियों में पुनर्जन्म नही ले रहे है I
Tuesday, November 8, 2011
22 EXERCICES IN YOG 22 EXERCICES IN YOG
1. I am a soul, pure energy. Go in to the experience of being separate from this body. Concentrate your intellect and feel how the rays of light and might are spreading out from the soul.
2. I am a pure soul, sitting in this body of light. Pure vibrations are going out from every part of my body. Then visualize yourself leaving the body and going into space. Stay in space and give the vibrations of purity to all the souls.
3. I am the master of this body. I am sitting on the throne of my fore head. I have to purify the entire nature, all the elements. I am receiving pure vibrations from Baba and giving them to the nature in all directions.
4. Concentrate your intellect on your soul for 5 seconds. Then move your intellect to Baba and concentrate for 5 seconds. Repeat this exercise 10 times and then let your intellect be fixed on Shiva Baba.
5. I am a swadarshan chakradhari. Just pass through the whole cycle in 5 minutes and then go to the soul world and come back into this body.
6. Baba is Gyan surya (sun of knowledge) visualise Him and experience that His rays of light are coming to you.
7. I am in my perfect form, sitting on the top of the Globe, receiving the rays from Baba and giving them to the entire world.
8. Do the practice of a spiritual drill. First of all feel that you are a soul. Then experience that you leave the physical body with your subtle body of light. Go beyond space, with your body of light, and go into the subtle world. There you meet Avyakt Bap Dada and receive His drishti. Then you leave the body of light and become aware of yourself as just the soul, the point of light energy, and you go into the soul world and receive the rays from Shiv Baba. After some moment, go back into the body of light in the subtle world and next return in the physical body in the physical world. Practice this 10 times.
9. Go into the experience of the seed stage. Stabilise yourself in the soul world under the rays of Baba in one thought: '' I experience the peace from Him ''.
10. I am a ''Peace House ‘‘; I am receiving the vibrations of peace from Baba and distributing it to all the peace less souls.
11. I am '' Master Almighty '', receiving the rays of might from the Almighty. Or I am sitting under the colorful fountain of all powers from Baba and giving power to weak souls.
12. In this body, I am an incarnated Angel. Get separated from the physical body, go some where in the world and give vibrations to all.
13. Be in the stage of self - respect that ''I am Baap samaan '' and I am sitting in the soul world with Him. I am giving light and might to the whole world.
14. God is my friend, have this intoxication and feel that He comes down to you .Enjoy His company.
15. Create a vision of yourself being linked to God, and that the entire world is linked to you. I am an ancestor soul. I am sustaining the whole world with good vibrations.
16. Experience how Baba comes down and becomes the canopy of protection to you.
17. I am a powerful soul, Shiv Shakti, I am combined with the Almighty. Thus I am with Him.
18. Create a vision your own angelic form standing on the left side of you with a garland of victory in its hand. And on the right side your future form of god or goddess is standing with a crown in his or her hands. They one after the other enter into me. Thus experience the intoxication of your future.
19. Practice any point of self respect or higher consciousness, enjoy the most elevated thoughts and then have chit - chat with Baba.
20. Practice to see all as souls and give pure vibrations to every one.
21. Visualise Baba, the Ocean of Peace. Imagine how a flow of vibrations in green color comes, from Him into yourself, the soul, and reflects out into the world. Heal nature, all living beings and your own body with these green vibrations of peace.
22. Imagine Shiv Baba, the Ocean of Purity , and how the powerful vibrations of purity , white and light, are focused on you, the soul , and reflect out into the world to purify even the elements.
2. I am a pure soul, sitting in this body of light. Pure vibrations are going out from every part of my body. Then visualize yourself leaving the body and going into space. Stay in space and give the vibrations of purity to all the souls.
3. I am the master of this body. I am sitting on the throne of my fore head. I have to purify the entire nature, all the elements. I am receiving pure vibrations from Baba and giving them to the nature in all directions.
4. Concentrate your intellect on your soul for 5 seconds. Then move your intellect to Baba and concentrate for 5 seconds. Repeat this exercise 10 times and then let your intellect be fixed on Shiva Baba.
5. I am a swadarshan chakradhari. Just pass through the whole cycle in 5 minutes and then go to the soul world and come back into this body.
6. Baba is Gyan surya (sun of knowledge) visualise Him and experience that His rays of light are coming to you.
7. I am in my perfect form, sitting on the top of the Globe, receiving the rays from Baba and giving them to the entire world.
8. Do the practice of a spiritual drill. First of all feel that you are a soul. Then experience that you leave the physical body with your subtle body of light. Go beyond space, with your body of light, and go into the subtle world. There you meet Avyakt Bap Dada and receive His drishti. Then you leave the body of light and become aware of yourself as just the soul, the point of light energy, and you go into the soul world and receive the rays from Shiv Baba. After some moment, go back into the body of light in the subtle world and next return in the physical body in the physical world. Practice this 10 times.
9. Go into the experience of the seed stage. Stabilise yourself in the soul world under the rays of Baba in one thought: '' I experience the peace from Him ''.
10. I am a ''Peace House ‘‘; I am receiving the vibrations of peace from Baba and distributing it to all the peace less souls.
11. I am '' Master Almighty '', receiving the rays of might from the Almighty. Or I am sitting under the colorful fountain of all powers from Baba and giving power to weak souls.
12. In this body, I am an incarnated Angel. Get separated from the physical body, go some where in the world and give vibrations to all.
13. Be in the stage of self - respect that ''I am Baap samaan '' and I am sitting in the soul world with Him. I am giving light and might to the whole world.
14. God is my friend, have this intoxication and feel that He comes down to you .Enjoy His company.
15. Create a vision of yourself being linked to God, and that the entire world is linked to you. I am an ancestor soul. I am sustaining the whole world with good vibrations.
16. Experience how Baba comes down and becomes the canopy of protection to you.
17. I am a powerful soul, Shiv Shakti, I am combined with the Almighty. Thus I am with Him.
18. Create a vision your own angelic form standing on the left side of you with a garland of victory in its hand. And on the right side your future form of god or goddess is standing with a crown in his or her hands. They one after the other enter into me. Thus experience the intoxication of your future.
19. Practice any point of self respect or higher consciousness, enjoy the most elevated thoughts and then have chit - chat with Baba.
20. Practice to see all as souls and give pure vibrations to every one.
21. Visualise Baba, the Ocean of Peace. Imagine how a flow of vibrations in green color comes, from Him into yourself, the soul, and reflects out into the world. Heal nature, all living beings and your own body with these green vibrations of peace.
22. Imagine Shiv Baba, the Ocean of Purity , and how the powerful vibrations of purity , white and light, are focused on you, the soul , and reflect out into the world to purify even the elements.
Monday, November 7, 2011
www.omshantivideo.com http://www.omshantivideo.com/bkAudio.html.
MP3-5208/1
Yog ke liye Avashyak Baate - B.K. Bhagwan
MP3-5208/2
Aatma Anubhuti Classes - B.K. Bhagwan
MP3-5208/3
Pravachanmala - B.K. Bhagwan
MP3-5208/4
Pravachanmala - B.K. Bhagwan
MP3-5208/5
Pravachanmala - B.K. Bhagwan
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MP3-5208/2
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MP3-5208/4
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MP3-5208/5
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MP3-5208/1 Yog ke liye Avashyak Baate - B.K. Bhagwan MP3-5208/2 Aatma Anubhuti Classes - B.K. Bhagwan MP3-5208/3 Pravachanmala - B.K. Bhagwan MP
MP3-5208/1
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MP3-5208/2
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Yog ke liye Avashyak Baate - B.K. Bhagwan
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गीता का भगवान कौन ? मनुष्य क्या मानते और कहते आये हैं ? मनुष्य मानते और कहते आये हैं कि श्री कृष्ण भगवान थे और श्रीकृष्ण भगवान ने द्वापर युग के अन्त म
गीता का भगवान कौन ? मनुष्य क्या मानते और कहते आये हैं ? मनुष्य मानते और कहते आये हैं कि श्री कृष्ण भगवान थे और श्रीकृष्ण भगवान ने द्वापर युग के अन्त में गीता ज्ञान सुनाया था और महाभारत युद्ध के द्वारा आसुरी सम्प्रदायों का महाविनाश कराया था । वे कहते आये हैं कि श्रीकृष्ण परमधाम से अवतरित हुए थे और सृष्टि रुपी वृक्ष के बीज रुप थे, सर्वशक्तिमान थे तथा परमपिता थे । ऊपर लिखे मत की असत्यता को समझने के लिए निम्नलिखित प्रश्नों पर विचार किजीए - 1.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेस
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले. वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत
क्रोध
मैं क्रोध, मान, माया और लोभ-इस चांडाल-चौकडी से पीडित हूँ, इससे अपना दामन कैसे छुडाऊँ ? मैं क्रोध से दु:खी हूँ, क्रोध को कैसे जीतूं ? ये सब जीवंत-प्रश्न हैं, जीवन से जुडी जिज्ञासाएं है, ज्वलंत समस्याएं हैं, जिनका समाधान जीवन की अनिवार्य घटना है और जहां तक मैं समझता हूँ, ये समस्याएं किसी एक व्यक्ति विशेष की नहीं, अपितु जन-जन की, जन-जन के जीवन की समस्याएं हैं । हर आदमी क्रोध से पीडित है, परेशान है, क्लांत है, दु:खी है । क्रोध को कैसे जीतें ? इस पर अपने कुछ विचार व्यक्त करुं - इससे पहले यह समझ लेना ज्यादा बेहतर होगा कि क्रोध आखिर है क्या ? क्रोध से क्या हानियां हैं ? क्रोध आता क्यों है ?
क्रोध क्या है ?
क्रोध एक विष है । क्रोध एक विषधर सर्प है, जिसके डसने से आत्मा अपने वास्तविक स्वरुप को भूल जाती है । क्रोध एक विक्षिप्तता है । क्रोध एक रोग है । क्रोध एक दु:ख की अन्तहीन कथा है । क्रोध एक तात्कालिक पागलपन है । क्रोध एक क्षय रोग है । क्रोध एक असंतुलन है । क्रोध एक मनोविकार है । क्रोध भयावह है । क्रोध भयंकर है । क्रोध भयास्पद है, क्रोध कुरुप है । क्रोध भद्दा है । क्रोध अंधा है । क्रोध बहरा है । क्रोध गुंगा है । क्रोध विकलांग है । नरक का द्वार क्रोध है । दु:ख का भंडार क्रोध है । अनर्थों का घर क्रोध है । पीडा का पर्याय क्रोध है । विवेक का दुश्मन क्रोध है ।
क्रोध से क्या हानियां है ?
क्रोध मनुष्य को अंधा बना देता है । क्रोध जब भी आता है, विवेक को नष्ट करके आता है । क्रोध होश की हत्त्या करके आता है । होश में व्यक्ति क्रोध नहीं करता । होश में क्रोध करना संभव ही नहीं है । क्रोध बेहोशी में ही संभव है । क्रोध का अर्थ ही बेहोश होना है । क्रोध पहला प्रहार विवेक पर करता है, होश पर करता है और होश गया कि क्रोध व्यक्ति को पागल बना देता है । विवेक गया कि क्रोध व्यक्ति को अंधा बना देता है । वह भूल जाता है कि वह क्या कर रहा है, क्या करने जा रहा है और इसका परिणाम क्या होगा ? यद्यपि आँखे हैं, लेकिन अब वह देख नहीं सकता । कान हैं, लेकिन अब वह सून नहीं सकता । मन है, लेकिन अब वह विचार नहीं कर सकता ।
क्यों ?
क्योंकि क्रोध समझदारी को बाहर निकालकर बुद्धि के दरवाजे की चिटकनी लगा देता है, मनुष्य को विचार-शून्य बना देता है, विवेक शून्य कर देता है ।
एक व्यक्ति शाम को दुकान से घर आया । पॉंच हजार रुपये पत्नी को दिए । पत्नी भोजन बना रही थी, रुपयों को वहीं चुल्हे के पास रख दिया । सर्दी के दिन थे, पास में उसका दो वर्ष का बच्चा बैठा था । मॉं काम से बाहर गई, इतनें में बच्चा उठा और रुपयों की गड्डी उठाकर जलते चुल्हे में डाल दी । अग्नि तेज जलने लगी । बच्चा खुश हो रहा था कि आग की लपटें कितनी तेज उठ रहीं है ! इतने में मॉं आ गई । उसने जब यह सब नजारा देखा तो उसे समझने में देर न लगी । क्रोध ने उसे अंधा बना दिया । क्रोध का भूत उसके मन-मस्तिष्क पर सवार हो गया, वह अपना होश-हवाश खो बैठी । फिर क्या था, आव देखा न ताव, अपने सुकुमार बच्चे को उठाया और जलते हुए चूल्हे में झोंक दिया, बेटा जलकर राख हो गया ।
इकलौता बेटा था उसका, जिसे क्रोध खा गया । बुढापे का सहारा था, जिसे क्रोध ने छीन लिया । क्षणभर के क्रोध ने जीवन-भर का दु:ख पैदा कर दिया । पलभर का असंतुलन जीवन-भर के लिए अभिशाप बन गया ।
क्रोध क्या है ?
क्रोध एक विष है । क्रोध एक विषधर सर्प है, जिसके डसने से आत्मा अपने वास्तविक स्वरुप को भूल जाती है । क्रोध एक विक्षिप्तता है । क्रोध एक रोग है । क्रोध एक दु:ख की अन्तहीन कथा है । क्रोध एक तात्कालिक पागलपन है । क्रोध एक क्षय रोग है । क्रोध एक असंतुलन है । क्रोध एक मनोविकार है । क्रोध भयावह है । क्रोध भयंकर है । क्रोध भयास्पद है, क्रोध कुरुप है । क्रोध भद्दा है । क्रोध अंधा है । क्रोध बहरा है । क्रोध गुंगा है । क्रोध विकलांग है । नरक का द्वार क्रोध है । दु:ख का भंडार क्रोध है । अनर्थों का घर क्रोध है । पीडा का पर्याय क्रोध है । विवेक का दुश्मन क्रोध है ।
क्रोध से क्या हानियां है ?
क्रोध मनुष्य को अंधा बना देता है । क्रोध जब भी आता है, विवेक को नष्ट करके आता है । क्रोध होश की हत्त्या करके आता है । होश में व्यक्ति क्रोध नहीं करता । होश में क्रोध करना संभव ही नहीं है । क्रोध बेहोशी में ही संभव है । क्रोध का अर्थ ही बेहोश होना है । क्रोध पहला प्रहार विवेक पर करता है, होश पर करता है और होश गया कि क्रोध व्यक्ति को पागल बना देता है । विवेक गया कि क्रोध व्यक्ति को अंधा बना देता है । वह भूल जाता है कि वह क्या कर रहा है, क्या करने जा रहा है और इसका परिणाम क्या होगा ? यद्यपि आँखे हैं, लेकिन अब वह देख नहीं सकता । कान हैं, लेकिन अब वह सून नहीं सकता । मन है, लेकिन अब वह विचार नहीं कर सकता ।
क्यों ?
क्योंकि क्रोध समझदारी को बाहर निकालकर बुद्धि के दरवाजे की चिटकनी लगा देता है, मनुष्य को विचार-शून्य बना देता है, विवेक शून्य कर देता है ।
एक व्यक्ति शाम को दुकान से घर आया । पॉंच हजार रुपये पत्नी को दिए । पत्नी भोजन बना रही थी, रुपयों को वहीं चुल्हे के पास रख दिया । सर्दी के दिन थे, पास में उसका दो वर्ष का बच्चा बैठा था । मॉं काम से बाहर गई, इतनें में बच्चा उठा और रुपयों की गड्डी उठाकर जलते चुल्हे में डाल दी । अग्नि तेज जलने लगी । बच्चा खुश हो रहा था कि आग की लपटें कितनी तेज उठ रहीं है ! इतने में मॉं आ गई । उसने जब यह सब नजारा देखा तो उसे समझने में देर न लगी । क्रोध ने उसे अंधा बना दिया । क्रोध का भूत उसके मन-मस्तिष्क पर सवार हो गया, वह अपना होश-हवाश खो बैठी । फिर क्या था, आव देखा न ताव, अपने सुकुमार बच्चे को उठाया और जलते हुए चूल्हे में झोंक दिया, बेटा जलकर राख हो गया ।
इकलौता बेटा था उसका, जिसे क्रोध खा गया । बुढापे का सहारा था, जिसे क्रोध ने छीन लिया । क्षणभर के क्रोध ने जीवन-भर का दु:ख पैदा कर दिया । पलभर का असंतुलन जीवन-भर के लिए अभिशाप बन गया ।
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेस
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले. वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत
Sunday, November 6, 2011
महाराष्ट्र मानपत्र : रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नो
महाराष्ट्र मानपत्र : रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नो
महाराष्ट्र मानपत्र : महाराष्ट्राच्या शिरपेचातील मानाचा तूरा : नवरत्नांची खाण असणाया महाराष्ट्राच्या मातीत जन्मलेल्या रत्नांची महिमा सांगणारे स्वतंत्र व्यासपिठ :
रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई
इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नोंदवलायं भगवान भाई यांनी.
12. दिल्ली येथे इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड चे मुख्य संपादक वि·ारुप राय चौधरी हे ब्रा.कु.भगवान भाई (शान्तीवन आबू रोड) यांना प्रमाणपत्र देतांना सोबत इंडिया बुक ऑफ रेकार्डची टीम. ब्राहृाकुमार भगवान भाई इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव
Posted by BK BHAGWAN BRAHMAKUMARIS MOUNT ABU AR
महाराष्ट्र मानपत्र : महाराष्ट्राच्या शिरपेचातील मानाचा तूरा : नवरत्नांची खाण असणाया महाराष्ट्राच्या मातीत जन्मलेल्या रत्नांची महिमा सांगणारे स्वतंत्र व्यासपिठ :
रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई
इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नोंदवलायं भगवान भाई यांनी.
12. दिल्ली येथे इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड चे मुख्य संपादक वि·ारुप राय चौधरी हे ब्रा.कु.भगवान भाई (शान्तीवन आबू रोड) यांना प्रमाणपत्र देतांना सोबत इंडिया बुक ऑफ रेकार्डची टीम. ब्राहृाकुमार भगवान भाई इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव
Posted by BK BHAGWAN BRAHMAKUMARIS MOUNT ABU AR
ब्रह्मकुमारीज शांतिवन की निदेशिका राजयोगिनी दादी शांतामणि के आकस्मिक निधन पर नंगल के प्रभु उपहार भवन बरारी में एक शोक सभा का आयोजन किया गया। इस मौके प
ब्रह्मकुमारीज शांतिवन की निदेशिका राजयोगिनी दादी शांतामणि के आकस्मिक निधन पर नंगल के प्रभु उपहार भवन बरारी में एक शोक सभा का आयोजन किया गया। इस मौके पर भवन की संचालिका बहन पुष्पा ने बताया कि ८७ साल की दादी शांतामणि ने ता उम्र संस्था की समर्पित भाव से सेवा की। उनके निधन से संस्था को भारी आघात पहुंचा है। उन्होंने बताया कि दादी शांतामणि को १९९४ में आबू स्थित विशाल शांतिवन परिसर की निदेशिका बनाया गया था। दादी शांतामणि का जन्मदिन २३ फरवरी, १९२३ को हैदराबाद सिंध में हुआ था। वह संस्था के स्थापना के समय के प्रारंभ काल में सपरिवार संस्था में आने वाली पहली कन्या थी और १३ वर्ष की आयु में ही उन्होंने संस्था को अपना सबकुछ अर्पण कर मानव सेवा शुरू की थी।
एक आश्चर्यजनक बात प्राय: सभी मनुष्य परमात्मा को "हे पिता " " हे दु:खहर्ता और सुखकर्ता प्रभु " इत्यादी सम्बन्ध सूचक शब्दों से याद करते
एक आश्चर्यजनक बात
प्राय: सभी मनुष्य परमात्मा को "हे पिता " " हे दु:खहर्ता और सुखकर्ता प्रभु " इत्यादी सम्बन्ध सूचक शब्दों से याद करते है I परन्तु यह कितने आश्चर्य की बात है की जिसे वे "पिता" कहकर बुलाते है उसका सत्य और स्पष्ट परिचय उन्हें नही है और उसके साथ उनका अच्छी रीती स्नेह ओउए सम्बन्ध भी नही है परिचय और स्नेह न होने के कारण परमात्मा को याद करते समय भी उनका मन एक ठिकाने पर नही टिकता इसलिए , उन्हें परमपिता परमात्मा से शांति तथा सुख का जो जन्म सिद्ध अधिकार प्राप्त होना चाहिए वह प्राप्त नही होता वे न तो परमपिता परमात्मा के मधुर मिलन का सच्चा सुख अनुभव कर सकते है , न उससे लाइट (प्रकाश) और माईट (शक्ति) ही प्राप्त कर सकते हे और न ही उनके संस्कारो तथा जीवन में कोई विशेष परिवर्तन ही आ पाता है I इसीलिए हम यहाँ उस परम प्यारे परमपिता परमात्मा का सक्षिप्त परिचय दे रहे है जो की स्वयं उन्होंने ही लोक-कल्याणार्थ हेम समझाया है और अनुभव कराया है I
परमपिता परमात्मा का दिव्य नाम और उनकी महिमा
परमपिता परमात्मा का नाम "शिव" है "शिव" का अर्थ "कल्याणकारी" है Iपरमपिता परमात्मा शिव ही ज्ञान के सागर ,शांति के सागर, आनंद के सागर और प्रेम के सागर हैI वह ही पतितो को पावन करने वाले , मनुष्यमात्र को शांतिधाम तथा सुखधाम की रह दिखाने वाले , विकारो तथा काल के बंधन से छुड़ाने वाले और सब प्राणियों पर रहम करने वाले है Iमनुष्यमात्र को मुक्ति और जीवनमुक्ति का अथवा गति और सत्गति का वरदान देने वाले भी एकमात्र वही है वह दिव्य बुद्दि के डाटा और दिव्य दृष्टी के वरदाता भी है मनुष्यात्माओ को ज्ञान रूपी सोम अथवा अमृत पिलाने वाले तथा अमर पद का वरदान देने के कारण "सोमनाथ" तथा "अमरनाथ" इत्यादि नाम भी उन्ही के है ओः जन्म मरण से सदा मुक्त , सदा अकरस ,सदा जगती ज्योति, सदा शिव है I
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप एक "ज्योति बिंदु" के समान, deeye की लो जसा है वह रूप अति निर्मल ,स्वर्णमय लाल और मनमोहक है उस ज्योतिर्मय रूप को दिव्य-चक्षुओ द्वारा ही देखा जा सकता है और दिव्य बुद्दि द्वारा ही अनुभव किया जा सकता हैI परमपिता परमात्मा के उस "ज्योतिबिंदु" रूप की प्रतिमाये भारत में "शिवलिंग" नाम से पूजी जाती है और उनके अवतरण की याद में " महाशिवरात्रि" भी मनाई जाती है I
"निराकार" का अर्थ
लगभग सभी धर्मो के अनुयायी परमात्मा को "निराकार" मानते है परन्तु इस शब्द से वे यह अर्थ लेते है की परमात्मा का कोई आकार (रूप)नही है अब परमपिता परमात्मा शिव कहते है कि ऐसा मानना भूल है वास्तव में निराकार का अर्थ यह है कि परमपिता "साकार" नही है, अर्थात न तो उनका मनुष्यों जैसा स्थूल -शारीरिक आकार है और न देवताओ जैसा सूक्ष्म सह्रिरिक आकार है बल्कि उनका रूप अशरीरी है और ज्योति-बिंदु के समान है "बिंदु" को तो निराकार ही कहेंगे Iअत: यह एक आश्चर्यजनक बात है कि परमपिता परमात्मा है तो सुक्ष्मातिसुक्ष्म , एक ज्योति-कण है परन्तु आज लोग प्राय: कहते है कि वह कण-कण में हैI
प्राय: सभी मनुष्य परमात्मा को "हे पिता " " हे दु:खहर्ता और सुखकर्ता प्रभु " इत्यादी सम्बन्ध सूचक शब्दों से याद करते है I परन्तु यह कितने आश्चर्य की बात है की जिसे वे "पिता" कहकर बुलाते है उसका सत्य और स्पष्ट परिचय उन्हें नही है और उसके साथ उनका अच्छी रीती स्नेह ओउए सम्बन्ध भी नही है परिचय और स्नेह न होने के कारण परमात्मा को याद करते समय भी उनका मन एक ठिकाने पर नही टिकता इसलिए , उन्हें परमपिता परमात्मा से शांति तथा सुख का जो जन्म सिद्ध अधिकार प्राप्त होना चाहिए वह प्राप्त नही होता वे न तो परमपिता परमात्मा के मधुर मिलन का सच्चा सुख अनुभव कर सकते है , न उससे लाइट (प्रकाश) और माईट (शक्ति) ही प्राप्त कर सकते हे और न ही उनके संस्कारो तथा जीवन में कोई विशेष परिवर्तन ही आ पाता है I इसीलिए हम यहाँ उस परम प्यारे परमपिता परमात्मा का सक्षिप्त परिचय दे रहे है जो की स्वयं उन्होंने ही लोक-कल्याणार्थ हेम समझाया है और अनुभव कराया है I
परमपिता परमात्मा का दिव्य नाम और उनकी महिमा
परमपिता परमात्मा का नाम "शिव" है "शिव" का अर्थ "कल्याणकारी" है Iपरमपिता परमात्मा शिव ही ज्ञान के सागर ,शांति के सागर, आनंद के सागर और प्रेम के सागर हैI वह ही पतितो को पावन करने वाले , मनुष्यमात्र को शांतिधाम तथा सुखधाम की रह दिखाने वाले , विकारो तथा काल के बंधन से छुड़ाने वाले और सब प्राणियों पर रहम करने वाले है Iमनुष्यमात्र को मुक्ति और जीवनमुक्ति का अथवा गति और सत्गति का वरदान देने वाले भी एकमात्र वही है वह दिव्य बुद्दि के डाटा और दिव्य दृष्टी के वरदाता भी है मनुष्यात्माओ को ज्ञान रूपी सोम अथवा अमृत पिलाने वाले तथा अमर पद का वरदान देने के कारण "सोमनाथ" तथा "अमरनाथ" इत्यादि नाम भी उन्ही के है ओः जन्म मरण से सदा मुक्त , सदा अकरस ,सदा जगती ज्योति, सदा शिव है I
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप
परमपिता परमात्मा का दिव्य-रूप एक "ज्योति बिंदु" के समान, deeye की लो जसा है वह रूप अति निर्मल ,स्वर्णमय लाल और मनमोहक है उस ज्योतिर्मय रूप को दिव्य-चक्षुओ द्वारा ही देखा जा सकता है और दिव्य बुद्दि द्वारा ही अनुभव किया जा सकता हैI परमपिता परमात्मा के उस "ज्योतिबिंदु" रूप की प्रतिमाये भारत में "शिवलिंग" नाम से पूजी जाती है और उनके अवतरण की याद में " महाशिवरात्रि" भी मनाई जाती है I
"निराकार" का अर्थ
लगभग सभी धर्मो के अनुयायी परमात्मा को "निराकार" मानते है परन्तु इस शब्द से वे यह अर्थ लेते है की परमात्मा का कोई आकार (रूप)नही है अब परमपिता परमात्मा शिव कहते है कि ऐसा मानना भूल है वास्तव में निराकार का अर्थ यह है कि परमपिता "साकार" नही है, अर्थात न तो उनका मनुष्यों जैसा स्थूल -शारीरिक आकार है और न देवताओ जैसा सूक्ष्म सह्रिरिक आकार है बल्कि उनका रूप अशरीरी है और ज्योति-बिंदु के समान है "बिंदु" को तो निराकार ही कहेंगे Iअत: यह एक आश्चर्यजनक बात है कि परमपिता परमात्मा है तो सुक्ष्मातिसुक्ष्म , एक ज्योति-कण है परन्तु आज लोग प्राय: कहते है कि वह कण-कण में हैI
भगवान भाई का सम्मान. शा#ान्तिवन स्थित बी.के.भगवानभाई का इंडिया बुक आफ रिकार्ड के सम्पादक वि·ारूप चौधरी इनके हस्ते सम्मान हूआ. याद हो की भगवान भाई ने
भगवान भाई का सम्मान.
29 अक्तुबर (सतारा:महाराष्ट्र) भगवान भाई का सम्मान. शा#ान्तिवन स्थित बी.के.भगवानभाई का इंडिया बुक आफ रिकार्ड के सम्पादक वि·ारूप चौधरी इनके हस्ते सम्मान हूआ. याद हो की भगवान भाई ने 5000 स्कूल और 800 जेल में जाकर ई·ारीय सन्देश देने कारण उनका नाम इंडिया बुक आफ रिकार्ड में दर्ज हूआ है
29 अक्तुबर (सतारा:महाराष्ट्र) भगवान भाई का सम्मान. शा#ान्तिवन स्थित बी.के.भगवानभाई का इंडिया बुक आफ रिकार्ड के सम्पादक वि·ारूप चौधरी इनके हस्ते सम्मान हूआ. याद हो की भगवान भाई ने 5000 स्कूल और 800 जेल में जाकर ई·ारीय सन्देश देने कारण उनका नाम इंडिया बुक आफ रिकार्ड में दर्ज हूआ है
जेल में दिया ईश्वरीय सन्देश
जेल में दिया ईश्वरीय सन्देश
03 नवम्बर (मुम्बई:टाणे) . भगवान भाईने यहाँ के सेंट्रल जेल में कैदीभाई बहनों को राजयोग ध्यानाभ्यास से अवगत कराया.
03 नवम्बर (मुम्बई:टाणे) . भगवान भाईने यहाँ के सेंट्रल जेल में कैदीभाई बहनों को राजयोग ध्यानाभ्यास से अवगत कराया.
परमपिता परमात्मा और उनके दिव्य कर्तव्य
परमपिता परमात्मा और उनके दिव्य कर्तव्य
सामने परमपिता परमात्मा ज्योति-बिंदु का जो चित्र दिखाया गया है , उस द्वारा समझाया गया है कि कलियुग के अंत में धर्म-ग्लानी अथवा अज्ञान -रात्रि के समय, शिव सृष्टि का कल्याण करने के लिए
सबसे पहले तीन सूक्ष्म देवता -ब्रह्मा,विष्णु और शंकर को रचते है और इस कारण शिव त्रिमूर्ति कहलाते है तीन देवताओं कि रचना करने के बाद वह स्वयं इस मनुष्य लोक में एक साधारण एवं वृद्ध भक्त के तन में अवतरित होते है , जिनका नाम वे प्रजापिता ब्रह्मा रखते है I
प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ही परमात्मा शिव मनुष्यात्माओं को पिता शिक्षक तथा सद्गुरु के रूप में मिलते है और सहज गीता ज्ञान तथा सहज राजयोग सिखाकर उनकी सद्गति करते है अर्थात उन्हें जीवन मुक्ति देते है I
शंकर द्वारा कलियुगी सृष्टि का महाविनाश
कलियुग के अंत में प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सतयुगी देवी सृष्टि कि स्थापना के साथ परमपिता परमात्मा शिव पुराणी असुरी सृष्टि के महाविनाश कि तयारी भी शुरू करा देते है परमात्मा शिव शंकर के द्वारा विज्ञानं गर्वित तथा विपरीत बुद्दि अमेरिकन लोगो तथा यूरोपवासियों (यादवो) को प्रेर कर उन द्वारा एटम और हाइड्रोजन बम और मिसाईल्स तैयार करते है जिन्हें कि महाभारत में मुसल अथवा ब्रह्मास्त्र कहा गया हैI इधर वे भारत में भी देह-अभिमानी धर्म-भृष्ट तथा विपरीत बुद्दि वाले लोगो ( जिन्हें महाभारत कि भाषा में "कौरव" कहा गया है ) को पारस्परिक युद्द के लिए प्रेरते है I
विष्णु द्वारा पालना
विष्णु कि चार भुजाओ में से दो भुजाए श्री नारायण की और दो भुजाए श्री लक्ष्मी की प्रतिक है "शंख" उनका पवित्र वचन अथवा ज्ञान घोष की निशानी है , स्व्दर्शन चक्र आत्मा(स्व) के तथा सृष्टि चक्र के ज्ञान का प्रतिक हे कमल, पुष्प संसार में रहते हुए अलिप्त तथा पवित्र रहने का सूचक है तथा गदा माया पार अर्थात पञ्च विकारो पार विजय का चिन्ह है I अत: मनुष्यात्माओ के सामने विष्णु चतुर्भुज का लक्ष्य रखते हुए परमपिता परमात्मा शिव समझाते है की एन अलंकारो को धारण करने से इनके रहस्य को अपने जीवन में उतारने से नर "श्री नारायण " और नारी "श्री लक्ष्मी" पद प्राप्त कर लेती है अर्थात मनुष्य दो ताजो वाला देवी या देवता पद प् लेता है एन दो ताजो में से एक ताज तो प्रकाश का ताज अर्थात प्रभा-मंडल है जो की पवित्रता व् शांति का प्रतिक है और दूसरा रत्न -जडित सोने का ताज है जो संपत्ति अथवा सुख का अथवा राज्य भाग्य का सूचक है I
इस प्रकार परमपिता परमात्मा शिव सतयुगी तथा त्रेतायुगी पवित्र देवी सृष्टि (स्वर्ग) की पालना के संस्कार भरते है जिसके फलस्वरूप ही सतयुग में श्री नारायण तथा श्री लक्ष्मी ( जो की पूर्व जन्म में प्रजापिता ब्रह्मा और सरस्वती थे ) तथा सुर्यवंश के अन्य रजा प्रजा पालन का कार्य करते है और त्रेतायुग में श्री सीता व् श्री राम और अन्य चंद्रवंशी रजा राज्य करते है I
मालूम रहे की वर्तमान समय परमपिता परमात्मा शिव तथा प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा तथा तीनो देवताओं द्वारा उपर्युक्त तीनो कर्तव्य करा रहे है अब हमारा कर्तव्य है की परमपिता परमात्मा शिव तथा प्रजापिता ब्रह्मा से अपना आत्मिक सम्बन्ध जोड़कर पवित्र बनने का पुरुषार्थ करे व् सच्चे वैष्णव बने मुक्ति और जीवन मुक्ति के ईश्वरीय जन्म सिद्द अधिकार के लिए पूरा पुरुषार्थ करे I
सामने परमपिता परमात्मा ज्योति-बिंदु का जो चित्र दिखाया गया है , उस द्वारा समझाया गया है कि कलियुग के अंत में धर्म-ग्लानी अथवा अज्ञान -रात्रि के समय, शिव सृष्टि का कल्याण करने के लिए
सबसे पहले तीन सूक्ष्म देवता -ब्रह्मा,विष्णु और शंकर को रचते है और इस कारण शिव त्रिमूर्ति कहलाते है तीन देवताओं कि रचना करने के बाद वह स्वयं इस मनुष्य लोक में एक साधारण एवं वृद्ध भक्त के तन में अवतरित होते है , जिनका नाम वे प्रजापिता ब्रह्मा रखते है I
प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ही परमात्मा शिव मनुष्यात्माओं को पिता शिक्षक तथा सद्गुरु के रूप में मिलते है और सहज गीता ज्ञान तथा सहज राजयोग सिखाकर उनकी सद्गति करते है अर्थात उन्हें जीवन मुक्ति देते है I
शंकर द्वारा कलियुगी सृष्टि का महाविनाश
कलियुग के अंत में प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सतयुगी देवी सृष्टि कि स्थापना के साथ परमपिता परमात्मा शिव पुराणी असुरी सृष्टि के महाविनाश कि तयारी भी शुरू करा देते है परमात्मा शिव शंकर के द्वारा विज्ञानं गर्वित तथा विपरीत बुद्दि अमेरिकन लोगो तथा यूरोपवासियों (यादवो) को प्रेर कर उन द्वारा एटम और हाइड्रोजन बम और मिसाईल्स तैयार करते है जिन्हें कि महाभारत में मुसल अथवा ब्रह्मास्त्र कहा गया हैI इधर वे भारत में भी देह-अभिमानी धर्म-भृष्ट तथा विपरीत बुद्दि वाले लोगो ( जिन्हें महाभारत कि भाषा में "कौरव" कहा गया है ) को पारस्परिक युद्द के लिए प्रेरते है I
विष्णु द्वारा पालना
विष्णु कि चार भुजाओ में से दो भुजाए श्री नारायण की और दो भुजाए श्री लक्ष्मी की प्रतिक है "शंख" उनका पवित्र वचन अथवा ज्ञान घोष की निशानी है , स्व्दर्शन चक्र आत्मा(स्व) के तथा सृष्टि चक्र के ज्ञान का प्रतिक हे कमल, पुष्प संसार में रहते हुए अलिप्त तथा पवित्र रहने का सूचक है तथा गदा माया पार अर्थात पञ्च विकारो पार विजय का चिन्ह है I अत: मनुष्यात्माओ के सामने विष्णु चतुर्भुज का लक्ष्य रखते हुए परमपिता परमात्मा शिव समझाते है की एन अलंकारो को धारण करने से इनके रहस्य को अपने जीवन में उतारने से नर "श्री नारायण " और नारी "श्री लक्ष्मी" पद प्राप्त कर लेती है अर्थात मनुष्य दो ताजो वाला देवी या देवता पद प् लेता है एन दो ताजो में से एक ताज तो प्रकाश का ताज अर्थात प्रभा-मंडल है जो की पवित्रता व् शांति का प्रतिक है और दूसरा रत्न -जडित सोने का ताज है जो संपत्ति अथवा सुख का अथवा राज्य भाग्य का सूचक है I
इस प्रकार परमपिता परमात्मा शिव सतयुगी तथा त्रेतायुगी पवित्र देवी सृष्टि (स्वर्ग) की पालना के संस्कार भरते है जिसके फलस्वरूप ही सतयुग में श्री नारायण तथा श्री लक्ष्मी ( जो की पूर्व जन्म में प्रजापिता ब्रह्मा और सरस्वती थे ) तथा सुर्यवंश के अन्य रजा प्रजा पालन का कार्य करते है और त्रेतायुग में श्री सीता व् श्री राम और अन्य चंद्रवंशी रजा राज्य करते है I
मालूम रहे की वर्तमान समय परमपिता परमात्मा शिव तथा प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा तथा तीनो देवताओं द्वारा उपर्युक्त तीनो कर्तव्य करा रहे है अब हमारा कर्तव्य है की परमपिता परमात्मा शिव तथा प्रजापिता ब्रह्मा से अपना आत्मिक सम्बन्ध जोड़कर पवित्र बनने का पुरुषार्थ करे व् सच्चे वैष्णव बने मुक्ति और जीवन मुक्ति के ईश्वरीय जन्म सिद्द अधिकार के लिए पूरा पुरुषार्थ करे I
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