चार मुख्य धाम
1. बाबा का कमरा
यह परमात्मा के साकार माध्यम पिताश्री प्रजापिता ब्रह्मा बाबा का निवास स्थान था. उसी कमरे को अब योगानुभूति-कक्ष के रुप में प्रयोग किया जाता है. इस छोटे से स्थान पर सृष्टि के सृजनहार ने विश्व नवनिर्माण की सार संकल्पनायें की थी. तभी तो कहा जाता है कि ब्रह्मा ने विश्व नवनिर्माण से सृष्टि रची. यहॉ एकाग्रता से बौठते ही लोगों को ईश्वरीय शक्ति व शान्ति का अनुभव होने लगता है. ईश्वरीय वाणि में इसे `स्नेह का धाम` कहा गया है.
इस कमरे में बौठने वाले को गुणांे का सागर बाबा, गुणों से भरपूर वाले को गुणों का सागर परमात्मा गुणों से भरपूर कर देता है. इस कमरे की उपयोगिता बताते हुए परमात्मा पिता ने कहा है, ़`इस कमरें में जो आता है, बाप समान बननेका संकल्प दृढ हो जाता है`
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2. बाबा की झोपडी.
प्रजापिता ब्रह्मा बाबा ने इसे सन 1959 में निर्मिती करवाया. यहॉही तपस्या कर ब्रह्माबाबा ने रुहानियत में सम्पूर्णता प्राप्त की. त्याग-तपस्या, स्वच्छता और सादगी वाले इस जादुई स्थान पर बौठते ही जिज्ञासुओं के अंतकरण पावन होने लगते है.
नव सृष्टि के सृजन को व्यावहारीक रुप देने हेतू ब्रह्माबाबा यहाँ संगोष्टिया करते, यज्ञ-वत्सों को पत्र लिखते व ज्ञानचर्चा करते थे. बाबा मम्मा द्वारा लगाया हुआ बगीचा भी यहॉ पर है, जिसमें अंगूर की बेल विशेष है, यह सबके मन को आकर्षित करता है. ईश्वरीय महावाक्यों में इसे स्नेह मिलन का धाम कहा जाता है.
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3. शान्ति स्तम्भ
अठारह जनवरी 1969 को जब ब्रह्माबाबा अव्यक्त हुए तब उनके समाधि स्थल पर, सरकारी अधिकारी की सम्मतिसे, शान्ति स्तम्भ का निर्माण किया गया.
यह पिताश्री ब्रह्मा के त्याग व तपस्या की स्मृति में निर्मित यादगार है. इससे निकलने वाले शान्ति, ज्ञान, शक्ति और पवित्रता का प्रकम्पन मानव-मात्र को पवित्र व योगी जीवन जीने की प्रेरणा देता है. इसके समक्ष खड़े होने से एैसी भावना आती है की जौसे आज भी पगड़ी बाँधे हुए ब्रह्मा बाबा सूक्ष्म वतन से विशाल बाहे फैंलाये बच्चों का आवाहन कर रहे है. यहाँ आने वाले सभी लोग इसे चौतन्य मन्दिर की तरह मानते हैं. ब्रह्मा-वत्स इसे `महाधाम` मानते हैं.
परमात्मा पिता ने इसकी विशेषता को यह कहकर वर्णन किया कि यदि शक्तिशाली बनाना हो तो शान्ति-स्तम्भ पहुँच जाना.
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4. हिस्ट्री हॉल -
यह सन 1960 में ब्रह्मा द्वारा बनवया गया. ज्ञान-यज्ञ के आदि रत्नों के चित्र हिस्टी हाल में प्रदर्शित किए गए है. यह बाबा-मम्मा द्वारा बनवाया हुआ ज्ञान-योग का पहला हाल है जो आज भी ब्रह्मा वत्सों का तपस्या कुंड है.
आज भी नव-निर्माण संगोष्ठियाँ यहाँ होती रहती हैं. इसी कक्ष में साकार ब्रह्मामुख कमल से निराकार शिव पिता के जो महावाक्य (मुरली) उच्चारित हुए है, उनको सभी स्थानीय सेवाकेंन्द्रो पर नियमित रुप से सुनाया जाता तथा सभी की आध्यात्मिक शक्तियों से पालना कर, श्रेष्ठ धारणायुक्त जीवन बनाकर सदगुणों से सशक्त बनाया जाता है, ईश्वरीय महावाक्यों में इसे `व्यर्थ संकल्पों से मुक्ति का साधन` कहा गया है. परमात्मा पिता ने इसका महत्व बताते हुए कहा है, `कभी व्यर्थ संकल्प बहुत तेज हों तो हिस्ट्री हॉल में पहुँच जाना.`
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B. K. BHAGWAN, SHANTIVAN, +919414534517, +919414008991
ब्रह्माकुमार भगवान भाई ब्रह्माकुमारीज़ माउंट आबू राजस्थान भारत ने अब तक 5000 स्कूल , कॉलेजों और 800 जेल में प्रोग्राम कर इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज किया है ,नैतिक मूल्य पर लगभग 2000 अधिक लेख भी लिखे है ३२ वर्षो से माउंट आबू में ईश्वरीय सेवा में समर्पित है
Sunday, October 24, 2010
मैं कौन हूँ
मैं कौन हूँ !! सभी इस विषय पर चर्चा कर चुके हैं | वेद पुराण गीता कुरान बाइबल सभी में आत्मा की पुष्टि होती है | पर आत्मा क्या है कैसे शरीर में रहती है ? आदि आदि प्रश्नों का उत्तर ब्रह्माकुमारी में द्बारा जिस विधि से दिया गया वो बताना चाहता हूँ ! प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय का मूल मंत्र है की "मैं एक आत्मा हूँ" | अब ज़रा प्रकाश डाला जाये | कहने का तात्पर्य है की हम जो आँखों से देखते हैं, मुह से बोलते हैं, कानो से सुनते है, और समस्त इन्द्रियों द्बारा जो भी भान होता है, वो आत्मा को होता है | मैं आत्मा मस्तिष्क में वास करती हूँ | और मस्तिष्क ही एक ऐसी जगह है जहां शरीर के सारे कण्ट्रोल मौजूद हैं | वहीँ से सञ्चालन करती हूँ अपने शरीर को | अब आत्मा का स्वरुप क्या है ? B.K के अनुसार आत्मा ज्योति स्वरुप है, जो सुक्ष्माती सूक्ष्म है, एक केश के शिरे का हजारवा हिस्सा, जो अंडाकार है| आत्मा अजर अमर अविनाशी है | अर्थात हम आज भी है, कल भी थे और कल भी रहेंगे | अब आप योगाशन कीजिये अपने आपको आत्मा समझाने का प्रयास कीजिये |
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परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है
हम परमात्मा को गाली देते हैं!!!
परमात्मा यानी सर्व आत्माओं में परम | जिनको हम कहते है की ये हर जगह और हर जीव में विद्यमान है ! सूअर कुत्ते बिल्ली गाय गधे में सब जगह मौजूद है ! एक दुष्ट आदमी में और एक क्रूर आदमी में भी परमात्मा मौजूद है ! दरअसल ये कहना परमात्मा को सबसे बड़ी गाली देना है ! परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है ! अगर एक क्रूर आदमी के अन्दर परमात्मा है तो वो क्यों क्रूर होता है ?क्या परमात्मा के गुणों में क्रूरता का भी एक गुण है? एक व्यक्ति जो किसी को बेवजह मौत के घाट उतारता है या जघन्य अपराध करता है, तो उसके अन्दर विद्यमान परमात्मा कहाँ सोता है ? परमात्मा के गुण कहाँ रहते हैं! जैसे अगर एक इत्र की शीशी खुली छोड़ दी जाए तो उसकी खुशबु से पता चलेगा की इत्र की खुशबु है ! ठीक वैसे ही परमत्मा के गुण हैं शांति, दया, प्रेम, करुना, ज्ञान,अगर क्रूर व्यक्ति में परमात्मा का वास है तो वो गुण क्यों नहीं ! परमात्मा अगर सबमे विद्यमान है तो अवतरित होने की क्या आवश्यकता है जबकि सबमे पहले से मोजूद हैं? अवतार लेना अर्थात दूसरी जगह से आना, दूसरी जगह से आना अर्थात यहाँ ना होना !
हम परमात्मा की संतान हैं उस नाते उनके गुण हमारे अन्दर हो सकते हैं पर परमात्मा नहीं !शाश्त्रों में हैं "आत्मा सो परमात्मा" जिसका हमने गलत अर्थ लगाया की आत्मा ही परमात्मा है| यहाँ पर आत्मा और परमात्मा के रूप की बात कही गयी है "आत्मा सो परमात्मा" का तात्पर्य है जैसा रूप और आकर आत्मा का है वैसा ही रूप और आकार परमात्मा का है ! अत: परमात्मा को सर्व व्यापी कहना अर्थात गाली देना है!
परमात्मा कौन है और कैसा है??
परमात्मा कौन है और कैसा है?? ये सवाल अक्सर हमारे मन में आता है, इसके अलग अलग मान्यताएं है !
पर ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार परमात्मा आत्मा की ही तरह है जैसा की आत्मा के बारे में पिछली पोस्ट में
बताया था की आत्मा एक ज्योतिस्वरूप अंडाकार और अति सूक्षम जो स्थूल आँखों से देखि नहीं जा सकती, है|
ठीक परमात्मा का भी वैसा ही आकार वैसा ही रूप और उतने ही सूक्ष्म है|
क्यूंकि परमात्मा हम सभी आत्माओं के पिता है|जैसे लौकिक में आदमी और उसकी संतान आदमी ही होती है,
गाय की बाछी गाय ही ही होती है,ठीक उसी प्रकार आत्मा के पिता परमात्मा भी आत्मा जैसे ही होते हैं|
फर्क है तो ये की उनकी सक्तियाँ असीमित है आत्मा ज्ञान स्वरुप है तो परमात्मा ज्ञान के सागर है,
आत्मा शांति स्वरुप है तो परमात्मा शांति के सागर हैं|
आत्मा प्रेम स्वरुप है तो परमात्मा प्रेम के सागर है |
कहने का तात्पर्य ये की परमात्मा सभी दिव्य गुणों के सागर हैं, और सृष्टि के रचियता है|
मौत के बाद के क्या!!!!
मनुष्य में सोचने जैसी अद्भुत क्षमता है| यही कारण है की आज मनुष्य चराचर जगत में सर्वोच्च है | यदा कदा ये सोच भी आती ही है की मौत के बाद क्या होता है|
अगर हम आत्मा हैं तो शरीर त्याग करने के बाद हम आत्माएं कहा जाती हैं ? भिन्न भिन्न मतमतांतर हैं |कोई कहता है ब्रह्म में लीन हो जाती है | कोई कहता है पशु पक्षी या अपने कर्मो के आधार पर दुसरा शरीर प्राप्त करता है, किसी भी योनी में |
आत्मा की गुह्य गतियों को समझने के लिए पहले आत्मा के शरीर की जानकारी आवश्यक है |
आत्मा के तिन शरीर बताये गए हैं :१) स्थूल शरीर २) कारण शरीर ३) सूक्ष्म शरीर |
१.स्थूल शरीर जिसमे हम जन्म लेते हैं जिसमे हम अच्छे बुरे कार्य करते हैं |
२.कारण शरीर जो स्थूल शरीर के कारण उत्पन होता है ,परछाई के रूप में ( पानी, दर्पण , छाया इत्यादि)
३. सूक्ष्म शरीर जिसमे आत्मा विद्यमान रहती है ! जो अगर स्थूल शरीर से निकल जाये तो इन भोतिक आँखों से देखा नहीं जाता |
अब चर्चा करेंगे मौत के बाद क्या होता है ?
एक आदमी जिसका एक्सीडेंट किसी गाड़ी से हो रहा है .....घबराया हुआ वो आदमी भागने की कोशिश करता है......पर गाड़ी के चक्कों ने उसे कुचल दिया....फिर भी वो भागता है .... और दूर चला जाता है .. उसकी समझ से परे की आखिर वो कैसे बच गया .... दूर जाकर देखता है की किसी का एक्सीडेंट हो गया और भीड़ जमा है.... वो भी देखने के लिए उत्सुकता वश जाता है तो भीड़ के अंदर हवा की तरह घुसता है... उसे अजीब लगता है पर समझ से परे की बात होती है.......घटना स्थल पर अपना ही शरीर देखने पर उसकी हैरत का अंदाजा नहीं रहता ..... वो जोर से चिल्लाता है की मैं यहाँ हूँ ......मैं ज़िंदा हूँ.....पर स्थूल कोई भी अंग नहीं है ...आवाज़ निकले कहाँ से ....सूक्ष्म शरीर में विद्यमान आत्मा ही सूक्ष्म शरीर को देख पाती है | उस वक़्त उस आत्मा को पता चलता है की वो कभी मरती नहीं | मौत के बाद आत्मा सूक्ष्म शरीर में रहती है कुछ भी नहीं बदलता सिर्फ वो गायब रहती है पर ओर्गन्स सूक्ष्म होने की वजह से किसी को भी कुछ भान कराने में असमर्थ होती है | अपने प्रियजनों के आस पास भटकती रहती हैं | तब तक भटकती है जब तक उसका निर्धारित गर्भ में समय नहीं आता |
मरने के बाद आत्मा की कोनसी शांति के लिए प्रार्थना करते हैं!!!
पीछे हमने जाना आत्मा और शरीर में आत्मा का निवास स्थान| आइये अब चर्चा करते है की आत्मा के गुण धर्म और स्वरुप क्या है|
आत्मा शांति स्वरुप है| प्रेम स्वरुप है| ज्ञान स्वरुप है| दया स्वरुप है| जो भी हमें अच्छे गुण लगते हैं वही आत्मा के गुण है, और यही कारण है की वो हमें अच्छे लगते है|
निर्दयी आदमी जो की हमेशां दूसरो कष्ट देने वाला होता है, अगर हम उसे बुरा
कहें तो क्या वो खुश होगा?? नहीं? तो क्यों? क्यूंकि वो भी उन दुर्गुणों
को नहीं चाहता, और वो आत्मा ये कतई सहन नहीं कर सकती की उसको दुसरे के
गुणों से पुकारा जाए|
अगर किसी दुष्ट मनुष्य को आप कहोगे की आप कितने अच्छे आदमी है! कितने शांत हैं ! कितने उदार दिल हैं! तो वो खुश होगा ! क्यों?
क्योंकि ये आत्मा के गुण हैं आत्मा अपने गुण को सुनना चाहती है! जो की लुप्त प्राय: हैं |आत्मा का सबसे बड़ा गुण है शांत स्वरुप| यही कारण है की हम शांति शांति चिल्लाते रहते है |कोनसी शांति चाहिए आखिर एकांत में जाकर बैठने से क्या शांति नहीं होती ? और अगर विश्व व्यापी शांति हो जाये तो आत्मा की शांति होगी ?
नहीं ये वो शांति नहीं जिसकी आत्मा को तलाश है|
आत्माको चाहिए वो शांति जिससे मन में हो रही भयंकर उथल पुथल शांत हो और परमात्मप्यार का संचार हो| अगर विश्व की शांति की बात होती तो मरने के बाद दिवंगतआत्मा की शांति के लिए ३ मिनट का मौन धारण करके प्रार्थना नहीं करते ! यहीवो शांति है जो आत्मा का गुण है|हमकहते हैं "ॐ शांति" अर्थात मैं आत्मा शांत स्वरुप हूँ| पर अब शांति लुप्तप्राय: है | कहाँ से आये शांति कोन दे शांति! सब अशांत हैं
अब आगे > पिछली पोस्ट में आत्मा पर थोडा सा प्रकाश डाला गया अब जरुरत है आत्मा को विस्तार से समझने की| आत्मा के तीन गुण होते हैं मन, बुद्धि, और संस्कार|मन: जो हमेशां चलता रहता है ये कार्य करूँ या न करूँ ?
बुद्धि :जो judgement करती है की इस कार्य को कर लें या न करें, ये स्पष्ट रूप से निर्णय देती है| संस्कार : जो कार्य हमने किया उसका हमें क्या फल मिलेगा, अच्छा या बुरा जो भी मिलना है उसी वक़्त आत्मा में रिकोर्ड हो गया |
इनतीनो गुणों के साथ "मैं आत्मा" इस शरीर के मष्तिष्क में निवास करती हूँ
जैसे एक गाडी चालक ड्राइविंग सीट पर बैठ के पूरी गाडी को कंट्रोल करता है,
न की पूरी गाडी में वो मौजूद होता है ठीक उसी भांति आत्मा मष्तिष्क में
बैठकर पुरे शरीर की क्रिया करती है, जैसे एक घर में रहने वाला व्यक्ति घर
की खिड़की खोलता है दरवाजा खोलता है, साफ़ सफाई का सारा कार्य करता है|
आत्मा भी उसी प्रकार अपनी समस्त इन्द्रियों का संचालन करती है| कुछ पूर्व निशानिया जो इंगित करती हैं की मैं एक आत्मा हूँ!
हम टिका माथे के मध्य भाग में लगाते हैं क्यों ?
स्त्रीअपने सुहाग की टिक्की भी माथे में लगाती है लेकिन सुहाग उजड़ जाने के बाद
टिकी नहीं लगाती है क्यों? उतर: हम टिका माथे के मध्य भाग में लगाते हैं
क्योंकि वो आत्मा का निवास स्थान है, और जिस घर में कोई रहता हो उसे
सुनसान नहीं छोडा जता, कुछ न कुछ डेकोरेशन होना ही चाहिए |
स्त्रीअपने सुहाग की निशानी माथे पे लगाती है क्योंकि वो बताती है ये स्वामी का
स्थान है अर्थात इस शरीर की स्वामी भी आत्मा है, सुहाग उजड़ने के पश्चात
बिंदी हटाती है की मेरा स्वामी चला गया| तो ये स्थान स्वामी के रहने का
होता है| कईबार देखते हैं कई लोग ऐसे मर जाते है की कुछ पता नहीं चलता की ये क्यूँमरा वो बोलता नहीं, शांस नहीं लेता क्यूँ?? जितने भी अंग थे वहीँ पर हैं
पर वो क्यूँ नहीं बोल रहा ??
मतलब?? "मर" क्या है जो चला गया? यानी कुछ ऐसी शक्ति
जो चली गई, जो बोलती थी, जो सुनती थी, जो देखती थी, वही आत्मा अथवा "मर"इस
शरीर को छोड़ कर चली गई!!!!!! ॐ शांति!!!! हूँ !!
मैंकौन हूँ !! सभी इस विषय पर चर्चा कर चुके हैं | वेद पुराण गीता कुरान
बाइबल सभी में आत्मा की पुष्टि होती है | पर आत्मा क्या है कैसे शरीर में
रहती है ? आदि आदि प्रश्नों का उत्तर ब्रह्माकुमारी में द्बारा जिस विधि
से दिया गया वो बताना चाहता हूँ ! प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय
विश्वविद्यालय का मूल मंत्र है की "मैं एक आत्मा हूँ" | अब ज़रा प्रकाश
डाला जाये | कहने का तात्पर्य है की हम जो आँखों से देखते हैं, मुह से
बोलते हैं, कानो से सुनते है, और समस्त इन्द्रियों द्बारा जो भी भान होता
है, वो आत्मा को होता है | मैं आत्मा मस्तिष्क में वास करती हूँ | और
मस्तिष्क ही एक ऐसी जगह है जहां शरीर के सारे कण्ट्रोल मौजूद हैं | वहीँ
से सञ्चालन करती हूँ अपने शरीर को | अब आत्मा का स्वरुप क्या है ? B.K के
अनुसार आत्मा ज्योति स्वरुप है, जो सुक्ष्माती सूक्ष्म है, एक केश के शिरे
का हजारवा हिस्सा, जो अंडाकार है| आत्मा अजर अमर अविनाशी है | अर्थात हम
आज भी है, कल भी थे और कल भी रहेंगे | अब आप योगाशन कीजिये अपने आपको
आत्मा समझाने का प्रयास कीजिये | क्रमश
B. K. BHAGWAN, SHANTIVAN, +919414534517, +919414008991
Om shanti
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परमात्मा यानी सर्व आत्माओं में परम | जिनको हम कहते है की ये हर जगह और हर जीव में विद्यमान है ! सूअर कुत्ते बिल्ली गाय गधे में सब जगह मौजूद है ! एक दुष्ट आदमी में और एक क्रूर आदमी में भी परमात्मा मौजूद है ! दरअसल ये कहना परमात्मा को सबसे बड़ी गाली देना है ! परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है ! अगर एक क्रूर आदमी के अन्दर परमात्मा है तो वो क्यों क्रूर होता है ?क्या परमात्मा के गुणों में क्रूरता का भी एक गुण है? एक व्यक्ति जो किसी को बेवजह मौत के घाट उतारता है या जघन्य अपराध करता है, तो उसके अन्दर विद्यमान परमात्मा कहाँ सोता है ? परमात्मा के गुण कहाँ रहते हैं! जैसे अगर एक इत्र की शीशी खुली छोड़ दी जाए तो उसकी खुशबु से पता चलेगा की इत्र की खुशबु है ! ठीक वैसे ही परमत्मा के गुण हैं शांति, दया, प्रेम, करुना, ज्ञान,अगर क्रूर व्यक्ति में परमात्मा का वास है तो वो गुण क्यों नहीं ! परमात्मा अगर सबमे विद्यमान है तो अवतरित होने की क्या आवश्यकता है जबकि सबमे पहले से मोजूद हैं? अवतार लेना अर्थात दूसरी जगह से आना, दूसरी जगह से आना अर्थात यहाँ ना होना !
हम परमात्मा की संतान हैं उस नाते उनके गुण हमारे अन्दर हो सकते हैं पर परमात्मा नहीं !शाश्त्रों में हैं "आत्मा सो परमात्मा" जिसका हमने गलत अर्थ लगाया की आत्मा ही परमात्मा है| यहाँ पर आत्मा और परमात्मा के रूप की बात कही गयी है "आत्मा सो परमात्मा" का तात्पर्य है जैसा रूप और आकर आत्मा का है वैसा ही रूप और आकार परमात्मा का है ! अत: परमात्मा को सर्व व्यापी कहना अर्थात गाली देना है!
परमात्मा कौन है और कैसा है??
परमात्मा कौन है और कैसा है?? ये सवाल अक्सर हमारे मन में आता है, इसके अलग अलग मान्यताएं है !
पर ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार परमात्मा आत्मा की ही तरह है जैसा की आत्मा के बारे में पिछली पोस्ट में
बताया था की आत्मा एक ज्योतिस्वरूप अंडाकार और अति सूक्षम जो स्थूल आँखों से देखि नहीं जा सकती, है|
ठीक परमात्मा का भी वैसा ही आकार वैसा ही रूप और उतने ही सूक्ष्म है|
क्यूंकि परमात्मा हम सभी आत्माओं के पिता है|जैसे लौकिक में आदमी और उसकी संतान आदमी ही होती है,
गाय की बाछी गाय ही ही होती है,ठीक उसी प्रकार आत्मा के पिता परमात्मा भी आत्मा जैसे ही होते हैं|
फर्क है तो ये की उनकी सक्तियाँ असीमित है आत्मा ज्ञान स्वरुप है तो परमात्मा ज्ञान के सागर है,
आत्मा शांति स्वरुप है तो परमात्मा शांति के सागर हैं|
आत्मा प्रेम स्वरुप है तो परमात्मा प्रेम के सागर है |
कहने का तात्पर्य ये की परमात्मा सभी दिव्य गुणों के सागर हैं, और सृष्टि के रचियता है|
मौत के बाद के क्या!!!!
मनुष्य में सोचने जैसी अद्भुत क्षमता है| यही कारण है की आज मनुष्य चराचर जगत में सर्वोच्च है | यदा कदा ये सोच भी आती ही है की मौत के बाद क्या होता है|
अगर हम आत्मा हैं तो शरीर त्याग करने के बाद हम आत्माएं कहा जाती हैं ? भिन्न भिन्न मतमतांतर हैं |कोई कहता है ब्रह्म में लीन हो जाती है | कोई कहता है पशु पक्षी या अपने कर्मो के आधार पर दुसरा शरीर प्राप्त करता है, किसी भी योनी में |
आत्मा की गुह्य गतियों को समझने के लिए पहले आत्मा के शरीर की जानकारी आवश्यक है |
आत्मा के तिन शरीर बताये गए हैं :१) स्थूल शरीर २) कारण शरीर ३) सूक्ष्म शरीर |
१.स्थूल शरीर जिसमे हम जन्म लेते हैं जिसमे हम अच्छे बुरे कार्य करते हैं |
२.कारण शरीर जो स्थूल शरीर के कारण उत्पन होता है ,परछाई के रूप में ( पानी, दर्पण , छाया इत्यादि)
३. सूक्ष्म शरीर जिसमे आत्मा विद्यमान रहती है ! जो अगर स्थूल शरीर से निकल जाये तो इन भोतिक आँखों से देखा नहीं जाता |
अब चर्चा करेंगे मौत के बाद क्या होता है ?
एक आदमी जिसका एक्सीडेंट किसी गाड़ी से हो रहा है .....घबराया हुआ वो आदमी भागने की कोशिश करता है......पर गाड़ी के चक्कों ने उसे कुचल दिया....फिर भी वो भागता है .... और दूर चला जाता है .. उसकी समझ से परे की आखिर वो कैसे बच गया .... दूर जाकर देखता है की किसी का एक्सीडेंट हो गया और भीड़ जमा है.... वो भी देखने के लिए उत्सुकता वश जाता है तो भीड़ के अंदर हवा की तरह घुसता है... उसे अजीब लगता है पर समझ से परे की बात होती है.......घटना स्थल पर अपना ही शरीर देखने पर उसकी हैरत का अंदाजा नहीं रहता ..... वो जोर से चिल्लाता है की मैं यहाँ हूँ ......मैं ज़िंदा हूँ.....पर स्थूल कोई भी अंग नहीं है ...आवाज़ निकले कहाँ से ....सूक्ष्म शरीर में विद्यमान आत्मा ही सूक्ष्म शरीर को देख पाती है | उस वक़्त उस आत्मा को पता चलता है की वो कभी मरती नहीं | मौत के बाद आत्मा सूक्ष्म शरीर में रहती है कुछ भी नहीं बदलता सिर्फ वो गायब रहती है पर ओर्गन्स सूक्ष्म होने की वजह से किसी को भी कुछ भान कराने में असमर्थ होती है | अपने प्रियजनों के आस पास भटकती रहती हैं | तब तक भटकती है जब तक उसका निर्धारित गर्भ में समय नहीं आता |
मरने के बाद आत्मा की कोनसी शांति के लिए प्रार्थना करते हैं!!!
पीछे हमने जाना आत्मा और शरीर में आत्मा का निवास स्थान| आइये अब चर्चा करते है की आत्मा के गुण धर्म और स्वरुप क्या है|
आत्मा शांति स्वरुप है| प्रेम स्वरुप है| ज्ञान स्वरुप है| दया स्वरुप है| जो भी हमें अच्छे गुण लगते हैं वही आत्मा के गुण है, और यही कारण है की वो हमें अच्छे लगते है|
निर्दयी आदमी जो की हमेशां दूसरो कष्ट देने वाला होता है, अगर हम उसे बुरा
कहें तो क्या वो खुश होगा?? नहीं? तो क्यों? क्यूंकि वो भी उन दुर्गुणों
को नहीं चाहता, और वो आत्मा ये कतई सहन नहीं कर सकती की उसको दुसरे के
गुणों से पुकारा जाए|
अगर किसी दुष्ट मनुष्य को आप कहोगे की आप कितने अच्छे आदमी है! कितने शांत हैं ! कितने उदार दिल हैं! तो वो खुश होगा ! क्यों?
क्योंकि ये आत्मा के गुण हैं आत्मा अपने गुण को सुनना चाहती है! जो की लुप्त प्राय: हैं |आत्मा का सबसे बड़ा गुण है शांत स्वरुप| यही कारण है की हम शांति शांति चिल्लाते रहते है |कोनसी शांति चाहिए आखिर एकांत में जाकर बैठने से क्या शांति नहीं होती ? और अगर विश्व व्यापी शांति हो जाये तो आत्मा की शांति होगी ?
नहीं ये वो शांति नहीं जिसकी आत्मा को तलाश है|
आत्माको चाहिए वो शांति जिससे मन में हो रही भयंकर उथल पुथल शांत हो और परमात्मप्यार का संचार हो| अगर विश्व की शांति की बात होती तो मरने के बाद दिवंगतआत्मा की शांति के लिए ३ मिनट का मौन धारण करके प्रार्थना नहीं करते ! यहीवो शांति है जो आत्मा का गुण है|हमकहते हैं "ॐ शांति" अर्थात मैं आत्मा शांत स्वरुप हूँ| पर अब शांति लुप्तप्राय: है | कहाँ से आये शांति कोन दे शांति! सब अशांत हैं
अब आगे > पिछली पोस्ट में आत्मा पर थोडा सा प्रकाश डाला गया अब जरुरत है आत्मा को विस्तार से समझने की| आत्मा के तीन गुण होते हैं मन, बुद्धि, और संस्कार|मन: जो हमेशां चलता रहता है ये कार्य करूँ या न करूँ ?
बुद्धि :जो judgement करती है की इस कार्य को कर लें या न करें, ये स्पष्ट रूप से निर्णय देती है| संस्कार : जो कार्य हमने किया उसका हमें क्या फल मिलेगा, अच्छा या बुरा जो भी मिलना है उसी वक़्त आत्मा में रिकोर्ड हो गया |
इनतीनो गुणों के साथ "मैं आत्मा" इस शरीर के मष्तिष्क में निवास करती हूँ
जैसे एक गाडी चालक ड्राइविंग सीट पर बैठ के पूरी गाडी को कंट्रोल करता है,
न की पूरी गाडी में वो मौजूद होता है ठीक उसी भांति आत्मा मष्तिष्क में
बैठकर पुरे शरीर की क्रिया करती है, जैसे एक घर में रहने वाला व्यक्ति घर
की खिड़की खोलता है दरवाजा खोलता है, साफ़ सफाई का सारा कार्य करता है|
आत्मा भी उसी प्रकार अपनी समस्त इन्द्रियों का संचालन करती है| कुछ पूर्व निशानिया जो इंगित करती हैं की मैं एक आत्मा हूँ!
हम टिका माथे के मध्य भाग में लगाते हैं क्यों ?
स्त्रीअपने सुहाग की टिक्की भी माथे में लगाती है लेकिन सुहाग उजड़ जाने के बाद
टिकी नहीं लगाती है क्यों? उतर: हम टिका माथे के मध्य भाग में लगाते हैं
क्योंकि वो आत्मा का निवास स्थान है, और जिस घर में कोई रहता हो उसे
सुनसान नहीं छोडा जता, कुछ न कुछ डेकोरेशन होना ही चाहिए |
स्त्रीअपने सुहाग की निशानी माथे पे लगाती है क्योंकि वो बताती है ये स्वामी का
स्थान है अर्थात इस शरीर की स्वामी भी आत्मा है, सुहाग उजड़ने के पश्चात
बिंदी हटाती है की मेरा स्वामी चला गया| तो ये स्थान स्वामी के रहने का
होता है| कईबार देखते हैं कई लोग ऐसे मर जाते है की कुछ पता नहीं चलता की ये क्यूँमरा वो बोलता नहीं, शांस नहीं लेता क्यूँ?? जितने भी अंग थे वहीँ पर हैं
पर वो क्यूँ नहीं बोल रहा ??
मतलब?? "मर" क्या है जो चला गया? यानी कुछ ऐसी शक्ति
जो चली गई, जो बोलती थी, जो सुनती थी, जो देखती थी, वही आत्मा अथवा "मर"इस
शरीर को छोड़ कर चली गई!!!!!! ॐ शांति!!!! हूँ !!
मैंकौन हूँ !! सभी इस विषय पर चर्चा कर चुके हैं | वेद पुराण गीता कुरान
बाइबल सभी में आत्मा की पुष्टि होती है | पर आत्मा क्या है कैसे शरीर में
रहती है ? आदि आदि प्रश्नों का उत्तर ब्रह्माकुमारी में द्बारा जिस विधि
से दिया गया वो बताना चाहता हूँ ! प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय
विश्वविद्यालय का मूल मंत्र है की "मैं एक आत्मा हूँ" | अब ज़रा प्रकाश
डाला जाये | कहने का तात्पर्य है की हम जो आँखों से देखते हैं, मुह से
बोलते हैं, कानो से सुनते है, और समस्त इन्द्रियों द्बारा जो भी भान होता
है, वो आत्मा को होता है | मैं आत्मा मस्तिष्क में वास करती हूँ | और
मस्तिष्क ही एक ऐसी जगह है जहां शरीर के सारे कण्ट्रोल मौजूद हैं | वहीँ
से सञ्चालन करती हूँ अपने शरीर को | अब आत्मा का स्वरुप क्या है ? B.K के
अनुसार आत्मा ज्योति स्वरुप है, जो सुक्ष्माती सूक्ष्म है, एक केश के शिरे
का हजारवा हिस्सा, जो अंडाकार है| आत्मा अजर अमर अविनाशी है | अर्थात हम
आज भी है, कल भी थे और कल भी रहेंगे | अब आप योगाशन कीजिये अपने आपको
आत्मा समझाने का प्रयास कीजिये | क्रमश
B. K. BHAGWAN, SHANTIVAN, +919414534517, +919414008991
Om shanti
--
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परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है
हम परमात्मा को गाली देते हैं!!!
परमात्मा यानी सर्व आत्माओं में परम | जिनको हम कहते है की ये हर जगह और हर जीव में विद्यमान है ! सूअर कुत्ते बिल्ली गाय गधे में सब जगह मौजूद है ! एक दुष्ट आदमी में और एक क्रूर आदमी में भी परमात्मा मौजूद है ! दरअसल ये कहना परमात्मा को सबसे बड़ी गाली देना है ! परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है ! अगर एक क्रूर आदमी के अन्दर परमात्मा है तो वो क्यों क्रूर होता है ?क्या परमात्मा के गुणों में क्रूरता का भी एक गुण है? एक व्यक्ति जो किसी को बेवजह मौत के घाट उतारता है या जघन्य अपराध करता है, तो उसके अन्दर विद्यमान परमात्मा कहाँ सोता है ? परमात्मा के गुण कहाँ रहते हैं! जैसे अगर एक इत्र की शीशी खुली छोड़ दी जाए तो उसकी खुशबु से पता चलेगा की इत्र की खुशबु है ! ठीक वैसे ही परमत्मा के गुण हैं शांति, दया, प्रेम, करुना, ज्ञान,अगर क्रूर व्यक्ति में परमात्मा का वास है तो वो गुण क्यों नहीं ! परमात्मा अगर सबमे विद्यमान है तो अवतरित होने की क्या आवश्यकता है जबकि सबमे पहले से मोजूद हैं? अवतार लेना अर्थात दूसरी जगह से आना, दूसरी जगह से आना अर्थात यहाँ ना होना !
हम परमात्मा की संतान हैं उस नाते उनके गुण हमारे अन्दर हो सकते हैं पर परमात्मा नहीं !शाश्त्रों में हैं "आत्मा सो परमात्मा" जिसका हमने गलत अर्थ लगाया की आत्मा ही परमात्मा है| यहाँ पर आत्मा और परमात्मा के रूप की बात कही गयी है "आत्मा सो परमात्मा" का तात्पर्य है जैसा रूप और आकर आत्मा का है वैसा ही रूप और आकार परमात्मा का है ! अत: परमात्मा को सर्व व्यापी कहना अर्थात गाली देना है!
परमात्मा कौन है और कैसा है??
परमात्मा कौन है और कैसा है?? ये सवाल अक्सर हमारे मन में आता है, इसके अलग अलग मान्यताएं है !
पर ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार परमात्मा आत्मा की ही तरह है जैसा की आत्मा के बारे में पिछली पोस्ट में
बताया था की आत्मा एक ज्योतिस्वरूप अंडाकार और अति सूक्षम जो स्थूल आँखों से देखि नहीं जा सकती, है|
ठीक परमात्मा का भी वैसा ही आकार वैसा ही रूप और उतने ही सूक्ष्म है|
क्यूंकि परमात्मा हम सभी आत्माओं के पिता है|जैसे लौकिक में आदमी और उसकी संतान आदमी ही होती है,
गाय की बाछी गाय ही ही होती है,ठीक उसी प्रकार आत्मा के पिता परमात्मा भी आत्मा जैसे ही होते हैं|
फर्क है तो ये की उनकी सक्तियाँ असीमित है आत्मा ज्ञान स्वरुप है तो परमात्मा ज्ञान के सागर है,
आत्मा शांति स्वरुप है तो परमात्मा शांति के सागर हैं|
आत्मा प्रेम स्वरुप है तो परमात्मा प्रेम के सागर है |
कहने का तात्पर्य ये की परमात्मा सभी दिव्य गुणों के सागर हैं, और सृष्टि के रचियता है|
मौत के बाद के क्या!!!!
मनुष्य में सोचने जैसी अद्भुत क्षमता है| यही कारण है की आज मनुष्य चराचर जगत में सर्वोच्च है | यदा कदा ये सोच भी आती ही है की मौत के बाद क्या होता है|
अगर हम आत्मा हैं तो शरीर त्याग करने के बाद हम आत्माएं कहा जाती हैं ? भिन्न भिन्न मतमतांतर हैं |कोई कहता है ब्रह्म में लीन हो जाती है | कोई कहता है पशु पक्षी या अपने कर्मो के आधार पर दुसरा शरीर प्राप्त करता है, किसी भी योनी में |
आत्मा की गुह्य गतियों को समझने के लिए पहले आत्मा के शरीर की जानकारी आवश्यक है |
आत्मा के तिन शरीर बताये गए हैं :१) स्थूल शरीर २) कारण शरीर ३) सूक्ष्म शरीर |
१.स्थूल शरीर जिसमे हम जन्म लेते हैं जिसमे हम अच्छे बुरे कार्य करते हैं |
२.कारण शरीर जो स्थूल शरीर के कारण उत्पन होता है ,परछाई के रूप में ( पानी, दर्पण , छाया इत्यादि)
३. सूक्ष्म शरीर जिसमे आत्मा विद्यमान रहती है ! जो अगर स्थूल शरीर से निकल जाये तो इन भोतिक आँखों से देखा नहीं जाता |
अब चर्चा करेंगे मौत के बाद क्या होता है ?
एक आदमी जिसका एक्सीडेंट किसी गाड़ी से हो रहा है .....घबराया हुआ वो आदमी भागने की कोशिश करता है......पर गाड़ी के चक्कों ने उसे कुचल दिया....फिर भी वो भागता है .... और दूर चला जाता है .. उसकी समझ से परे की आखिर वो कैसे बच गया .... दूर जाकर देखता है की किसी का एक्सीडेंट हो गया और भीड़ जमा है.... वो भी देखने के लिए उत्सुकता वश जाता है तो भीड़ के अंदर हवा की तरह घुसता है... उसे अजीब लगता है पर समझ से परे की बात होती है.......घटना स्थल पर अपना ही शरीर देखने पर उसकी हैरत का अंदाजा नहीं रहता ..... वो जोर से चिल्लाता है की मैं यहाँ हूँ ......मैं ज़िंदा हूँ.....पर स्थूल कोई भी अंग नहीं है ...आवाज़ निकले कहाँ से ....सूक्ष्म शरीर में विद्यमान आत्मा ही सूक्ष्म शरीर को देख पाती है | उस वक़्त उस आत्मा को पता चलता है की वो कभी मरती नहीं | मौत के बाद आत्मा सूक्ष्म शरीर में रहती है कुछ भी नहीं बदलता सिर्फ वो गायब रहती है पर ओर्गन्स सूक्ष्म होने की वजह से किसी को भी कुछ भान कराने में असमर्थ होती है | अपने प्रियजनों के आस पास भटकती रहती हैं | तब तक भटकती है जब तक उसका निर्धारित गर्भ में समय नहीं आता |
मरने के बाद आत्मा की कोनसी शांति के लिए प्रार्थना करते हैं!!!
पीछे हमने जाना आत्मा और शरीर में आत्मा का निवास स्थान| आइये अब चर्चा करते है की आत्मा के गुण धर्म और स्वरुप क्या है|
आत्मा शांति स्वरुप है| प्रेम स्वरुप है| ज्ञान स्वरुप है| दया स्वरुप है| जो भी हमें अच्छे गुण लगते हैं वही आत्मा के गुण है, और यही कारण है की वो हमें अच्छे लगते है|
निर्दयी आदमी जो की हमेशां दूसरो कष्ट देने वाला होता है, अगर हम उसे बुरा
कहें तो क्या वो खुश होगा?? नहीं? तो क्यों? क्यूंकि वो भी उन दुर्गुणों
को नहीं चाहता, और वो आत्मा ये कतई सहन नहीं कर सकती की उसको दुसरे के
गुणों से पुकारा जाए|
अगर किसी दुष्ट मनुष्य को आप कहोगे की आप कितने अच्छे आदमी है! कितने शांत हैं ! कितने उदार दिल हैं! तो वो खुश होगा ! क्यों?
क्योंकि ये आत्मा के गुण हैं आत्मा अपने गुण को सुनना चाहती है! जो की लुप्त प्राय: हैं |आत्मा का सबसे बड़ा गुण है शांत स्वरुप| यही कारण है की हम शांति शांति चिल्लाते रहते है |कोनसी शांति चाहिए आखिर एकांत में जाकर बैठने से क्या शांति नहीं होती ? और अगर विश्व व्यापी शांति हो जाये तो आत्मा की शांति होगी ?
नहीं ये वो शांति नहीं जिसकी आत्मा को तलाश है|
आत्माको चाहिए वो शांति जिससे मन में हो रही भयंकर उथल पुथल शांत हो और परमात्मप्यार का संचार हो| अगर विश्व की शांति की बात होती तो मरने के बाद दिवंगतआत्मा की शांति के लिए ३ मिनट का मौन धारण करके प्रार्थना नहीं करते ! यहीवो शांति है जो आत्मा का गुण है|हमकहते हैं "ॐ शांति" अर्थात मैं आत्मा शांत स्वरुप हूँ| पर अब शांति लुप्तप्राय: है | कहाँ से आये शांति कोन दे शांति! सब अशांत हैं
अब आगे > पिछली पोस्ट में आत्मा पर थोडा सा प्रकाश डाला गया अब जरुरत है आत्मा को विस्तार से समझने की| आत्मा के तीन गुण होते हैं मन, बुद्धि, और संस्कार|मन: जो हमेशां चलता रहता है ये कार्य करूँ या न करूँ ?
बुद्धि :जो judgement करती है की इस कार्य को कर लें या न करें, ये स्पष्ट रूप से निर्णय देती है| संस्कार : जो कार्य हमने किया उसका हमें क्या फल मिलेगा, अच्छा या बुरा जो भी मिलना है उसी वक़्त आत्मा में रिकोर्ड हो गया |
इनतीनो गुणों के साथ "मैं आत्मा" इस शरीर के मष्तिष्क में निवास करती हूँ
जैसे एक गाडी चालक ड्राइविंग सीट पर बैठ के पूरी गाडी को कंट्रोल करता है,
न की पूरी गाडी में वो मौजूद होता है ठीक उसी भांति आत्मा मष्तिष्क में
बैठकर पुरे शरीर की क्रिया करती है, जैसे एक घर में रहने वाला व्यक्ति घर
की खिड़की खोलता है दरवाजा खोलता है, साफ़ सफाई का सारा कार्य करता है|
आत्मा भी उसी प्रकार अपनी समस्त इन्द्रियों का संचालन करती है| कुछ पूर्व निशानिया जो इंगित करती हैं की मैं एक आत्मा हूँ!
हम टिका माथे के मध्य भाग में लगाते हैं क्यों ?
स्त्रीअपने सुहाग की टिक्की भी माथे में लगाती है लेकिन सुहाग उजड़ जाने के बाद
टिकी नहीं लगाती है क्यों? उतर: हम टिका माथे के मध्य भाग में लगाते हैं
क्योंकि वो आत्मा का निवास स्थान है, और जिस घर में कोई रहता हो उसे
सुनसान नहीं छोडा जता, कुछ न कुछ डेकोरेशन होना ही चाहिए |
स्त्रीअपने सुहाग की निशानी माथे पे लगाती है क्योंकि वो बताती है ये स्वामी का
स्थान है अर्थात इस शरीर की स्वामी भी आत्मा है, सुहाग उजड़ने के पश्चात
बिंदी हटाती है की मेरा स्वामी चला गया| तो ये स्थान स्वामी के रहने का
होता है| कईबार देखते हैं कई लोग ऐसे मर जाते है की कुछ पता नहीं चलता की ये क्यूँमरा वो बोलता नहीं, शांस नहीं लेता क्यूँ?? जितने भी अंग थे वहीँ पर हैं
पर वो क्यूँ नहीं बोल रहा ??
मतलब?? "मर" क्या है जो चला गया? यानी कुछ ऐसी शक्ति
जो चली गई, जो बोलती थी, जो सुनती थी, जो देखती थी, वही आत्मा अथवा "मर"इस
शरीर को छोड़ कर चली गई!!!!!! ॐ शांति!!!! हूँ !!
मैंकौन हूँ !! सभी इस विषय पर चर्चा कर चुके हैं | वेद पुराण गीता कुरान
बाइबल सभी में आत्मा की पुष्टि होती है | पर आत्मा क्या है कैसे शरीर में
रहती है ? आदि आदि प्रश्नों का उत्तर ब्रह्माकुमारी में द्बारा जिस विधि
से दिया गया वो बताना चाहता हूँ ! प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय
विश्वविद्यालय का मूल मंत्र है की "मैं एक आत्मा हूँ" | अब ज़रा प्रकाश
डाला जाये | कहने का तात्पर्य है की हम जो आँखों से देखते हैं, मुह से
बोलते हैं, कानो से सुनते है, और समस्त इन्द्रियों द्बारा जो भी भान होता
है, वो आत्मा को होता है | मैं आत्मा मस्तिष्क में वास करती हूँ | और
मस्तिष्क ही एक ऐसी जगह है जहां शरीर के सारे कण्ट्रोल मौजूद हैं | वहीँ
से सञ्चालन करती हूँ अपने शरीर को | अब आत्मा का स्वरुप क्या है ? B.K के
अनुसार आत्मा ज्योति स्वरुप है, जो सुक्ष्माती सूक्ष्म है, एक केश के शिरे
का हजारवा हिस्सा, जो अंडाकार है| आत्मा अजर अमर अविनाशी है | अर्थात हम
आज भी है, कल भी थे और कल भी रहेंगे | अब आप योगाशन कीजिये अपने आपको
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परमात्मा यानी सर्व आत्माओं में परम | जिनको हम कहते है की ये हर जगह और हर जीव में विद्यमान है ! सूअर कुत्ते बिल्ली गाय गधे में सब जगह मौजूद है ! एक दुष्ट आदमी में और एक क्रूर आदमी में भी परमात्मा मौजूद है ! दरअसल ये कहना परमात्मा को सबसे बड़ी गाली देना है ! परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है ! अगर एक क्रूर आदमी के अन्दर परमात्मा है तो वो क्यों क्रूर होता है ?क्या परमात्मा के गुणों में क्रूरता का भी एक गुण है? एक व्यक्ति जो किसी को बेवजह मौत के घाट उतारता है या जघन्य अपराध करता है, तो उसके अन्दर विद्यमान परमात्मा कहाँ सोता है ? परमात्मा के गुण कहाँ रहते हैं! जैसे अगर एक इत्र की शीशी खुली छोड़ दी जाए तो उसकी खुशबु से पता चलेगा की इत्र की खुशबु है ! ठीक वैसे ही परमत्मा के गुण हैं शांति, दया, प्रेम, करुना, ज्ञान,अगर क्रूर व्यक्ति में परमात्मा का वास है तो वो गुण क्यों नहीं ! परमात्मा अगर सबमे विद्यमान है तो अवतरित होने की क्या आवश्यकता है जबकि सबमे पहले से मोजूद हैं? अवतार लेना अर्थात दूसरी जगह से आना, दूसरी जगह से आना अर्थात यहाँ ना होना !
हम परमात्मा की संतान हैं उस नाते उनके गुण हमारे अन्दर हो सकते हैं पर परमात्मा नहीं !शाश्त्रों में हैं "आत्मा सो परमात्मा" जिसका हमने गलत अर्थ लगाया की आत्मा ही परमात्मा है| यहाँ पर आत्मा और परमात्मा के रूप की बात कही गयी है "आत्मा सो परमात्मा" का तात्पर्य है जैसा रूप और आकर आत्मा का है वैसा ही रूप और आकार परमात्मा का है ! अत: परमात्मा को सर्व व्यापी कहना अर्थात गाली देना है!
परमात्मा कौन है और कैसा है??
परमात्मा कौन है और कैसा है?? ये सवाल अक्सर हमारे मन में आता है, इसके अलग अलग मान्यताएं है !
पर ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार परमात्मा आत्मा की ही तरह है जैसा की आत्मा के बारे में पिछली पोस्ट में
बताया था की आत्मा एक ज्योतिस्वरूप अंडाकार और अति सूक्षम जो स्थूल आँखों से देखि नहीं जा सकती, है|
ठीक परमात्मा का भी वैसा ही आकार वैसा ही रूप और उतने ही सूक्ष्म है|
क्यूंकि परमात्मा हम सभी आत्माओं के पिता है|जैसे लौकिक में आदमी और उसकी संतान आदमी ही होती है,
गाय की बाछी गाय ही ही होती है,ठीक उसी प्रकार आत्मा के पिता परमात्मा भी आत्मा जैसे ही होते हैं|
फर्क है तो ये की उनकी सक्तियाँ असीमित है आत्मा ज्ञान स्वरुप है तो परमात्मा ज्ञान के सागर है,
आत्मा शांति स्वरुप है तो परमात्मा शांति के सागर हैं|
आत्मा प्रेम स्वरुप है तो परमात्मा प्रेम के सागर है |
कहने का तात्पर्य ये की परमात्मा सभी दिव्य गुणों के सागर हैं, और सृष्टि के रचियता है|
मौत के बाद के क्या!!!!
मनुष्य में सोचने जैसी अद्भुत क्षमता है| यही कारण है की आज मनुष्य चराचर जगत में सर्वोच्च है | यदा कदा ये सोच भी आती ही है की मौत के बाद क्या होता है|
अगर हम आत्मा हैं तो शरीर त्याग करने के बाद हम आत्माएं कहा जाती हैं ? भिन्न भिन्न मतमतांतर हैं |कोई कहता है ब्रह्म में लीन हो जाती है | कोई कहता है पशु पक्षी या अपने कर्मो के आधार पर दुसरा शरीर प्राप्त करता है, किसी भी योनी में |
आत्मा की गुह्य गतियों को समझने के लिए पहले आत्मा के शरीर की जानकारी आवश्यक है |
आत्मा के तिन शरीर बताये गए हैं :१) स्थूल शरीर २) कारण शरीर ३) सूक्ष्म शरीर |
१.स्थूल शरीर जिसमे हम जन्म लेते हैं जिसमे हम अच्छे बुरे कार्य करते हैं |
२.कारण शरीर जो स्थूल शरीर के कारण उत्पन होता है ,परछाई के रूप में ( पानी, दर्पण , छाया इत्यादि)
३. सूक्ष्म शरीर जिसमे आत्मा विद्यमान रहती है ! जो अगर स्थूल शरीर से निकल जाये तो इन भोतिक आँखों से देखा नहीं जाता |
अब चर्चा करेंगे मौत के बाद क्या होता है ?
एक आदमी जिसका एक्सीडेंट किसी गाड़ी से हो रहा है .....घबराया हुआ वो आदमी भागने की कोशिश करता है......पर गाड़ी के चक्कों ने उसे कुचल दिया....फिर भी वो भागता है .... और दूर चला जाता है .. उसकी समझ से परे की आखिर वो कैसे बच गया .... दूर जाकर देखता है की किसी का एक्सीडेंट हो गया और भीड़ जमा है.... वो भी देखने के लिए उत्सुकता वश जाता है तो भीड़ के अंदर हवा की तरह घुसता है... उसे अजीब लगता है पर समझ से परे की बात होती है.......घटना स्थल पर अपना ही शरीर देखने पर उसकी हैरत का अंदाजा नहीं रहता ..... वो जोर से चिल्लाता है की मैं यहाँ हूँ ......मैं ज़िंदा हूँ.....पर स्थूल कोई भी अंग नहीं है ...आवाज़ निकले कहाँ से ....सूक्ष्म शरीर में विद्यमान आत्मा ही सूक्ष्म शरीर को देख पाती है | उस वक़्त उस आत्मा को पता चलता है की वो कभी मरती नहीं | मौत के बाद आत्मा सूक्ष्म शरीर में रहती है कुछ भी नहीं बदलता सिर्फ वो गायब रहती है पर ओर्गन्स सूक्ष्म होने की वजह से किसी को भी कुछ भान कराने में असमर्थ होती है | अपने प्रियजनों के आस पास भटकती रहती हैं | तब तक भटकती है जब तक उसका निर्धारित गर्भ में समय नहीं आता |
मरने के बाद आत्मा की कोनसी शांति के लिए प्रार्थना करते हैं!!!
पीछे हमने जाना आत्मा और शरीर में आत्मा का निवास स्थान| आइये अब चर्चा करते है की आत्मा के गुण धर्म और स्वरुप क्या है|
आत्मा शांति स्वरुप है| प्रेम स्वरुप है| ज्ञान स्वरुप है| दया स्वरुप है| जो भी हमें अच्छे गुण लगते हैं वही आत्मा के गुण है, और यही कारण है की वो हमें अच्छे लगते है|
निर्दयी आदमी जो की हमेशां दूसरो कष्ट देने वाला होता है, अगर हम उसे बुरा
कहें तो क्या वो खुश होगा?? नहीं? तो क्यों? क्यूंकि वो भी उन दुर्गुणों
को नहीं चाहता, और वो आत्मा ये कतई सहन नहीं कर सकती की उसको दुसरे के
गुणों से पुकारा जाए|
अगर किसी दुष्ट मनुष्य को आप कहोगे की आप कितने अच्छे आदमी है! कितने शांत हैं ! कितने उदार दिल हैं! तो वो खुश होगा ! क्यों?
क्योंकि ये आत्मा के गुण हैं आत्मा अपने गुण को सुनना चाहती है! जो की लुप्त प्राय: हैं |आत्मा का सबसे बड़ा गुण है शांत स्वरुप| यही कारण है की हम शांति शांति चिल्लाते रहते है |कोनसी शांति चाहिए आखिर एकांत में जाकर बैठने से क्या शांति नहीं होती ? और अगर विश्व व्यापी शांति हो जाये तो आत्मा की शांति होगी ?
नहीं ये वो शांति नहीं जिसकी आत्मा को तलाश है|
आत्माको चाहिए वो शांति जिससे मन में हो रही भयंकर उथल पुथल शांत हो और परमात्मप्यार का संचार हो| अगर विश्व की शांति की बात होती तो मरने के बाद दिवंगतआत्मा की शांति के लिए ३ मिनट का मौन धारण करके प्रार्थना नहीं करते ! यहीवो शांति है जो आत्मा का गुण है|हमकहते हैं "ॐ शांति" अर्थात मैं आत्मा शांत स्वरुप हूँ| पर अब शांति लुप्तप्राय: है | कहाँ से आये शांति कोन दे शांति! सब अशांत हैं
अब आगे > पिछली पोस्ट में आत्मा पर थोडा सा प्रकाश डाला गया अब जरुरत है आत्मा को विस्तार से समझने की| आत्मा के तीन गुण होते हैं मन, बुद्धि, और संस्कार|मन: जो हमेशां चलता रहता है ये कार्य करूँ या न करूँ ?
बुद्धि :जो judgement करती है की इस कार्य को कर लें या न करें, ये स्पष्ट रूप से निर्णय देती है| संस्कार : जो कार्य हमने किया उसका हमें क्या फल मिलेगा, अच्छा या बुरा जो भी मिलना है उसी वक़्त आत्मा में रिकोर्ड हो गया |
इनतीनो गुणों के साथ "मैं आत्मा" इस शरीर के मष्तिष्क में निवास करती हूँ
जैसे एक गाडी चालक ड्राइविंग सीट पर बैठ के पूरी गाडी को कंट्रोल करता है,
न की पूरी गाडी में वो मौजूद होता है ठीक उसी भांति आत्मा मष्तिष्क में
बैठकर पुरे शरीर की क्रिया करती है, जैसे एक घर में रहने वाला व्यक्ति घर
की खिड़की खोलता है दरवाजा खोलता है, साफ़ सफाई का सारा कार्य करता है|
आत्मा भी उसी प्रकार अपनी समस्त इन्द्रियों का संचालन करती है| कुछ पूर्व निशानिया जो इंगित करती हैं की मैं एक आत्मा हूँ!
हम टिका माथे के मध्य भाग में लगाते हैं क्यों ?
स्त्रीअपने सुहाग की टिक्की भी माथे में लगाती है लेकिन सुहाग उजड़ जाने के बाद
टिकी नहीं लगाती है क्यों? उतर: हम टिका माथे के मध्य भाग में लगाते हैं
क्योंकि वो आत्मा का निवास स्थान है, और जिस घर में कोई रहता हो उसे
सुनसान नहीं छोडा जता, कुछ न कुछ डेकोरेशन होना ही चाहिए |
स्त्रीअपने सुहाग की निशानी माथे पे लगाती है क्योंकि वो बताती है ये स्वामी का
स्थान है अर्थात इस शरीर की स्वामी भी आत्मा है, सुहाग उजड़ने के पश्चात
बिंदी हटाती है की मेरा स्वामी चला गया| तो ये स्थान स्वामी के रहने का
होता है| कईबार देखते हैं कई लोग ऐसे मर जाते है की कुछ पता नहीं चलता की ये क्यूँमरा वो बोलता नहीं, शांस नहीं लेता क्यूँ?? जितने भी अंग थे वहीँ पर हैं
पर वो क्यूँ नहीं बोल रहा ??
मतलब?? "मर" क्या है जो चला गया? यानी कुछ ऐसी शक्ति
जो चली गई, जो बोलती थी, जो सुनती थी, जो देखती थी, वही आत्मा अथवा "मर"इस
शरीर को छोड़ कर चली गई!!!!!! ॐ शांति!!!! हूँ !!
मैंकौन हूँ !! सभी इस विषय पर चर्चा कर चुके हैं | वेद पुराण गीता कुरान
बाइबल सभी में आत्मा की पुष्टि होती है | पर आत्मा क्या है कैसे शरीर में
रहती है ? आदि आदि प्रश्नों का उत्तर ब्रह्माकुमारी में द्बारा जिस विधि
से दिया गया वो बताना चाहता हूँ ! प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय
विश्वविद्यालय का मूल मंत्र है की "मैं एक आत्मा हूँ" | अब ज़रा प्रकाश
डाला जाये | कहने का तात्पर्य है की हम जो आँखों से देखते हैं, मुह से
बोलते हैं, कानो से सुनते है, और समस्त इन्द्रियों द्बारा जो भी भान होता
है, वो आत्मा को होता है | मैं आत्मा मस्तिष्क में वास करती हूँ | और
मस्तिष्क ही एक ऐसी जगह है जहां शरीर के सारे कण्ट्रोल मौजूद हैं | वहीँ
से सञ्चालन करती हूँ अपने शरीर को | अब आत्मा का स्वरुप क्या है ? B.K के
अनुसार आत्मा ज्योति स्वरुप है, जो सुक्ष्माती सूक्ष्म है, एक केश के शिरे
का हजारवा हिस्सा, जो अंडाकार है| आत्मा अजर अमर अविनाशी है | अर्थात हम
आज भी है, कल भी थे और कल भी रहेंगे | अब आप योगाशन कीजिये अपने आपको
आत्मा समझाने का प्रयास कीजिये | क्रमश
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Om shanti
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राजयोग द्वारा अष्ट शक्तियों की प्राप्त तथा दिव्य गुणांे की धारणा
राजयोग द्वारा अष्ट शक्तियों की प्राप्त तथा दिव्य गुणांे की धारणा Inbox
BK Bhagwan Bhai Mon, Mar 29, 2010 at 10:10 AM
To: bkbhagwan501@gmail.com, 501bhagwan@gmail.com
बहुतसे लोग योग को एक-आध घण्टे की कोई क्रिया समझते हैं परन्तु वास्तव में योग तो जीवन के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण का अथवा एक श्रेष्ठ जीवन-पध्दितीका नाम है. राजयोगी का जीवन उसका आचार-व्यवहार,उसकी रीति-नीति भोगी से अलग और अलौकिक होती है. निस्सन्देह, राजयोग एक अभ्यास, पुरुषार्थ या क्रिया-विशेष का भी नाम है, परन्त्ु यह एक ऐसी महान साधना या जीवन को दिव्य बनाने की कला है जिसके द्वारा मनुष्य स्वयं ही महान् बन जाता है और सारे विश्व को भी महान मना देता है.
राजयोगी घर-गृहस्थी का त्याग कर जंगलों के अन्दर कुटियाओ और गुफाओं में जाकर योग नही लगाता है, परन्तु वह समाज में रहकर पारिवारिक, सामाजिक और व्यावहारिक समस्याओं को बड़े ही सुचारु रुप से पार करता हुआ कमल फुल समान न्यारा और प्यारा जीवन व्यतीत करता है | उसकी स्थिती हर परिस्थिति में एकरस रहती है | जिस प्रकार बौटरी का सम्बन्ध बिजलीघर के साथ होने सके बौटरी में फिर से शक्ति भर जाती है, उसी प्रकार सर्वशक्तिवान परमात्मा, जो सर्वशक्तियों का स्त्रेत है, उससे सम्बन्ध जोडने से आत्मा में कई शक्तियों की प्राप्ति होती है, जो हर एक के जीवन मंे अति आवश्यक हैं | इन्हीं शक्तियों की कमी के कारण घर-घर में कलह-क्लेश बढ़ रहा है, जिसके फलस्वरुप, मानसिक तनाव बढ़ता जा रहा है और नई-नई बीमारियाँ भी उत्पन्न होती जा रही है | परन्तु राजयोग इन सब बातों को जड़ से समाप्त कर देता है |
1. सहन-शक्ति - जब हम यह निश्चय करते हैं कि हम शान्त स्वरुप आत्मा हैं, शान्ति के सागर परमपिता परमात्मा शिव की सन्तान है और शान्तिधाम के निवासी हैं तो हमारे द्वारा एैसा कोई कर्म नहीं होगा जिससे अशान्ति फैले | इस निश्चय से सबसे पहले हमारे अन्दर सहन करने की शक्ति आती है | कोई व्यक्ति अगर गालियाँ देता है तो भी मौ अपनी शान्ति का गुण क्यों नष्ट करुँ ? एक बच्चा किसी आम के पेड़ को पत्थर मारता है लेकिन वह पेड़ उसके जवाब में बच्चें को फल देता है, एक जड़ वस्तु में इतना गुण है तो चौतन्य में तो इससे भी ज्यादा होना चाहिए | लेकिन आज का मनुष्य र्इंट का जवाब पत्थर से देता है| राजयोगी इस सन्दर्भ रुप में सहनशील रहेगा क्योंकि वह जानता है कि दुसरा व्यक्ति अज्ञानता के कारण इस प्रकार का व्यवहार कर रहा है, परन्तु वह स्वयं तो ज्ञानवान है, अगर वह भी अज्ञानी के सदृश्य कर्म करे तो अज्ञानी और ज्ञानी में अन्तर ही क्या रहा ? वह स्वयं शान्तस्वरुप बन शान्ति का दान देगा, वौसे भी क्रोधी मनुष्य की बुध्दि में उस समय तो कोई बात बिठाई नही जा सकती है | तो राजयोगी सहनशक्ति को धारण कर उसकी बात मन में स्वीकार ही नहीं करता जो जवाब में कुछ कहना पड़े | वौसे भी एक पत्थर हथौड़ी और छेनी की ठोकरें सहन करने के बाद ही तो पूज्यनीय मूर्ति बनता है | महान आत्माओं ने अपनी महानता सहनशक्ति के आधार पर ही तो प्राप्त की है, तो मौ शिवबाबा की सन्तान ने अगर सहन कर भी लिया तो कौनसी बड़ी बात हूई ? कोई भी व्यक्ति 9 बार सहन करके 10 वी बार सहन नहीं कर सके तो भी उसे सहनशील नही कहेंगे | इसलिए मुझे सहन करते ही जाना है |
2. समाने की शक्ति - राजयोग द्वारा दूसरी शक्ति आती है - समाने की शक्ति | जौसे सागर अपने अन्दर सब कुछ समा लेता है, वौसे ही राजयोगी का हृदय सागर के समान विशाल, गहन और स्थिर होने के कारण वह मान-अपमान, स्तुति-निंदा, सुख-दु:ख, हार-जीत आदि बातों में समान रहकर सबकुछ अपने अन्दर समा लेता है | राजयोगी में ``वसुधौव कुटुम्बकम् `` की भावना रहती है, क्यांेकि वह समझता है कि सब परमात्मा के बच्चे मेरे भाई ही तो है | एक माँ अपने बच्चों की भूलें समा लेती हैं ना | परमात्मा भी हम सब आत्माआंे के परमपिता होने के कारण बुराईयाँ जानते हुए भी अन्दर समा लेते है |
अगर किसी को भूल बताना आवश्यक भी होगा तो राजयोगी ईश्र्या-द्ववेष में आकर उसके समक्ष अथवा अन्य के आगे उसका वर्णन नही करेगा, परन्तु शुभ-चिन्तक बन समय और परिस्थिती को देखकर श्रेष्ठ भावना से समझायेगा | अगर भूल करने वला व्यक्ति नही समझता तो वह स्वयं की स्थिति नहीं बिगाडेगा लेकिन भूल करने वाले का भाग्य समझकर समा देगा वह आत्माओं के अवगणुणों को न देख कर केवल उनसे गुण ही धारण कर सदा हर्षित रहेगा |
3. परख शक्ति - राजयोगद्वारा परख शक्ति भी सुचारु रुप से आती है | जौसे एक जौहरी कसौटी के आधार से असली व नकली आभूषणों को परख लेता है, वौसे ही राजयोगी भी ज्ञान की कसोटी के आधार से सच्चे व झूठे व्यक्ति और परिस्थिति को परख सकता है | परमात्मा की याद से साक्षीपन की स्थिति बन जाती है जो हर व्यक्ति, वस्तु व परिस्थिति को स्पष्ट परखने में मदद करती है, अथवा परख शक्ति सहज ही धारण करा देती है |
4. निर्णय शक्ति - राजयोगी के मन-बुध्दि की तार परमात्मा के साथ जुटी होने के कारण वह तराजू की तरह उचित ओर अनुचित बात का शीघ्र ही निर्णय ले सकता है | उसको परमात्मा से कई प्रकार की प्रेरणायें भी प्राप्त होती हैं, बुध्दिमानों मे बुध्दिमान परमात्मा से बुध्दियोग लगाने से योग्य समय पर निर्णय लेना सहज आ जाता है अथवा निर्णय शक्ति का विकास होता है |
5. सामना करने की शक्ति - राजयोगी मनुष्य का सामना नहीं करता है लेकिन परिस्थितीतयों का सामना बड़ी सहज रीति से कर लेता है | सबके दु:खदायक परिस्थिती जो किसी के जीवन में आती है वह है अपने नजदीक के सम्बन्धी की मृत्यु | राजयोगी इस घटना का बगौर किसी दु:ख और वेदना के सामना करता है क्योंकि वह जानता हैकि आत्मा तो कभी भी मरती हनीं है, आत्मा एक अभिनेता की तरह इस सृष्टि रुपी रंगमंच पर आती है, शरीर तो केवल एक वस्त्र के समान है | किसी की मृत्यु पर राजयोगी यही सोचता है कि वह आत्मा एक शरीर रुपी वस्त्र छोड़ अपने कर्मो के अनुसार अन्य देह रुपी वस्त्र धारण करने के लिए गई है - दूसरा अभिनय करने | राजयोगी के सामने अगर सांसारिक समस्यायें तूफान का रुप धारण कर आएं तो भी वह कभी विचलित नहीं होता है. असने अपना साथी परमात्मा को बनाया है | जिसका साथी है भगवान उसको क्या रोकेगा आंधी और तूफान ? परमात्मा का सहारा होने के कारण राजयोगी की आत्मा सदा दीपक के समान जगती रहती है तथा अन्य आत्माओं को ज्ञान प्रकाश देती रहती है | अत: परमात्मा की याद में राजयोगी आत्मा के अविनाशीपन, ड्रामा की ढाल तथा सर्वशक्तिवान् पिता की सन्तान होने के फलस्वरुप अपने शक्ति स्वरुप में स्थित होकर परिस्थिति का सामना सहज ही कर सकता है.
6. सहयोग शक्ति - आज सहयोग शक्ति की कमी के फलस्वरुप किती समस्यायें खड़ी हो जाती है. मनुष्य अपने स्वार्थ के कारण सहयोग नही देना चाहता है. आज संसार में तीन प्रकार के मनुष्य पायें जाते है - एक है दानवी वृतीवाले, दानवी वृत्ती वाले सोचेंगे - ``मेरा तो मेरा पर तेरा भी मेरा`` | अर्थात् सहयोग देने के बजाय अन्य की वस्तू पर भी अधिकार रखेंगे | मानवी वृत्ती वाले सोचेंगे - ``मेरा सो मेरा, तेरा सो तेरा``, अर्थात् किसी से मतलब नही उनमें अगर स्वार्थ नहीं तो परोपकार की भावना भी नही परन्तु राजयोगी कहेगा -`` न कुछ मेरा न कुछ तेरा ``| यह सबकुछ परमात्मा का है | वह केवल अपनी चीज़ों से ही अनासक्त नही रहेगा परन्तू अन्य को भी अनासक्त रहने की प्रेरणा देगा| वह अपने तन-मन-धन को परमात्मा की अमानत समझकर ट्रस्टी होकर चलेगा और उसे ईश्वरीय कार्य में लगाकर सहयोगी बनता जायेगा | वह स्वयं कार्य करके अन्य को सिखायेगा | इसी प्रकार परमात्मा के कार्य में एक-एक के सहयोग की अंगुली मिलने से इस कलियुगी पहाड को उठाकर इसके स्थान पर सतयुग को लाना कोई बड़ी बात नही है. बस हिम्मत रखते जाईये और परमात्मा की मदद लेते जाईये | हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा |
7. विस्तार को संकीर्ण करने की शक्ति - जौसे कुछुआ अपने अंगो को जब चाहे सिकोड़ लेता है जब चाहे उन्हंे फैला लेता है, वौसे ही राजयोगी जब चाहे अपनी इच्छा अनुसार मालिक बन अपनी कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करता है और जब चाहे विदेही एवं शान्त अवस्था में रह सकता है | इस प्रकार की विदेह अवस्था में रहकर वह अनेक बन्धनों से स्वयं को मुक्त अनुभव करता है |
8. समेटने की शक्ति - राजयोगी में समेटने की शक्ति भी बहुत सहज आ जाती है क्योंकि वह जानता है कि सृष्टि चक्र का अन्तिम समय होने के कारण उसके वापिस परमधाम घर जाने का समय आ चुका है जिस प्रकार एक मुसाफ़िर यात्रा पर जात ेसमय आवश्यक वस्तुएं ही अपने साथ ले जाता है, उसी प्रकार राजयोगी अपनी आत्मामें दिव्य गुण, शक्तियां, श्रेष्ठ कर्म या श्रेष्ठ संस्कारां का ही संग्रह करता है, क्योंकि वे ही आत्मा के सच्चे साथी बनकर उसके साथ जाते है | वह और सब ताफ से अपना हिसाब-किताब चुकता करता जाता है और एक ही लगन में रहता है कि उसे वापस परमधाम जाता है.
वह यह अवश्य ही ध्यान रखता होगा कि किस समय किस स्थिती का प्रयोग करना है सहनशक्ति धारण करने के समय अगर सामना करने कि शक्ति का प्रयोग किया तो और समस्या खड़ी हो सकती है. सामना करने के बदले गिर सहन कर लिया तो भी सफलता नहीं मिलेगी. इसलिए सबसे पहले आवश्यक है परख और निर्णयशक्ति.
राजयोगी आदि, मध्य और अन्त सोच-समझकर कदम आगे बढ़ाता है, उसमें सहनशक्ति होने के कारण र्धेयता का भी गुण है. धीरज का फल सदा मीठा होता है इसलिए राजयोगी हर कर्म में सदा सपुलता का अनुभव करता है. वह सदा आत्मस्थितीत में रहने कारण अन्तर्मुखी बन अपनी अवस्था भी जांच करता रहता है. इसके फलस्वरुप उसका हर संकल्प, बोल और कर्म श्रेष्ठ होता है उसकी वाणी में मिठास होती है इस अढ़ाई इंच की जीभ के लिए कहावत है कि, ``चाहे तो वह किसी को तखत पर बिठाये और चाहे तो किसी को तख्ते पर चढ़ाये.`` तलवार का घाव तो कुछ समय के बाद मिट जायेगा लेकिन जबान से किसी के हृदय पर किया हुआ घाव अमिट रह जाता है. राजयोगी हंस के समान सभी के गुण रुपी मोती ग्रहण करता है, अत: वह सदा हर्षित भी रहता है और हर परिस्थिती में स्थिर रहता है.
राजयोगी मंे इन दिव्य गुणांे और शक्तियों की धारणा होने के कारण वह समाज के लिए एक प्रेरणादायक अंग बन जाता है. वह अपने स्व-परिवर्तन द्वारा पहले अपने परिवार को शुध्द और पावन बनाता है, परिवार के बदलने से समाज बदलता है, समाज के बदलने से देश और देश के बदलने से सारा विश्व बदल जाता है इसी प्रकार राजयोगी स्व परिवर्तन से सारे विश्व का परिवर्तन करता है.
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बहुतसे लोग योग को एक-आध घण्टे की कोई क्रिया समझते हैं परन्तु वास्तव में योग तो जीवन के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण का अथवा एक श्रेष्ठ जीवन-पध्दितीका नाम है. राजयोगी का जीवन उसका आचार-व्यवहार,उसकी रीति-नीति भोगी से अलग और अलौकिक होती है. निस्सन्देह, राजयोग एक अभ्यास, पुरुषार्थ या क्रिया-विशेष का भी नाम है, परन्त्ु यह एक ऐसी महान साधना या जीवन को दिव्य बनाने की कला है जिसके द्वारा मनुष्य स्वयं ही महान् बन जाता है और सारे विश्व को भी महान मना देता है.
राजयोगी घर-गृहस्थी का त्याग कर जंगलों के अन्दर कुटियाओ और गुफाओं में जाकर योग नही लगाता है, परन्तु वह समाज में रहकर पारिवारिक, सामाजिक और व्यावहारिक समस्याओं को बड़े ही सुचारु रुप से पार करता हुआ कमल फुल समान न्यारा और प्यारा जीवन व्यतीत करता है | उसकी स्थिती हर परिस्थिति में एकरस रहती है | जिस प्रकार बौटरी का सम्बन्ध बिजलीघर के साथ होने सके बौटरी में फिर से शक्ति भर जाती है, उसी प्रकार सर्वशक्तिवान परमात्मा, जो सर्वशक्तियों का स्त्रेत है, उससे सम्बन्ध जोडने से आत्मा में कई शक्तियों की प्राप्ति होती है, जो हर एक के जीवन मंे अति आवश्यक हैं | इन्हीं शक्तियों की कमी के कारण घर-घर में कलह-क्लेश बढ़ रहा है, जिसके फलस्वरुप, मानसिक तनाव बढ़ता जा रहा है और नई-नई बीमारियाँ भी उत्पन्न होती जा रही है | परन्तु राजयोग इन सब बातों को जड़ से समाप्त कर देता है |
1. सहन-शक्ति - जब हम यह निश्चय करते हैं कि हम शान्त स्वरुप आत्मा हैं, शान्ति के सागर परमपिता परमात्मा शिव की सन्तान है और शान्तिधाम के निवासी हैं तो हमारे द्वारा एैसा कोई कर्म नहीं होगा जिससे अशान्ति फैले | इस निश्चय से सबसे पहले हमारे अन्दर सहन करने की शक्ति आती है | कोई व्यक्ति अगर गालियाँ देता है तो भी मौ अपनी शान्ति का गुण क्यों नष्ट करुँ ? एक बच्चा किसी आम के पेड़ को पत्थर मारता है लेकिन वह पेड़ उसके जवाब में बच्चें को फल देता है, एक जड़ वस्तु में इतना गुण है तो चौतन्य में तो इससे भी ज्यादा होना चाहिए | लेकिन आज का मनुष्य र्इंट का जवाब पत्थर से देता है| राजयोगी इस सन्दर्भ रुप में सहनशील रहेगा क्योंकि वह जानता है कि दुसरा व्यक्ति अज्ञानता के कारण इस प्रकार का व्यवहार कर रहा है, परन्तु वह स्वयं तो ज्ञानवान है, अगर वह भी अज्ञानी के सदृश्य कर्म करे तो अज्ञानी और ज्ञानी में अन्तर ही क्या रहा ? वह स्वयं शान्तस्वरुप बन शान्ति का दान देगा, वौसे भी क्रोधी मनुष्य की बुध्दि में उस समय तो कोई बात बिठाई नही जा सकती है | तो राजयोगी सहनशक्ति को धारण कर उसकी बात मन में स्वीकार ही नहीं करता जो जवाब में कुछ कहना पड़े | वौसे भी एक पत्थर हथौड़ी और छेनी की ठोकरें सहन करने के बाद ही तो पूज्यनीय मूर्ति बनता है | महान आत्माओं ने अपनी महानता सहनशक्ति के आधार पर ही तो प्राप्त की है, तो मौ शिवबाबा की सन्तान ने अगर सहन कर भी लिया तो कौनसी बड़ी बात हूई ? कोई भी व्यक्ति 9 बार सहन करके 10 वी बार सहन नहीं कर सके तो भी उसे सहनशील नही कहेंगे | इसलिए मुझे सहन करते ही जाना है |
2. समाने की शक्ति - राजयोग द्वारा दूसरी शक्ति आती है - समाने की शक्ति | जौसे सागर अपने अन्दर सब कुछ समा लेता है, वौसे ही राजयोगी का हृदय सागर के समान विशाल, गहन और स्थिर होने के कारण वह मान-अपमान, स्तुति-निंदा, सुख-दु:ख, हार-जीत आदि बातों में समान रहकर सबकुछ अपने अन्दर समा लेता है | राजयोगी में ``वसुधौव कुटुम्बकम् `` की भावना रहती है, क्यांेकि वह समझता है कि सब परमात्मा के बच्चे मेरे भाई ही तो है | एक माँ अपने बच्चों की भूलें समा लेती हैं ना | परमात्मा भी हम सब आत्माआंे के परमपिता होने के कारण बुराईयाँ जानते हुए भी अन्दर समा लेते है |
अगर किसी को भूल बताना आवश्यक भी होगा तो राजयोगी ईश्र्या-द्ववेष में आकर उसके समक्ष अथवा अन्य के आगे उसका वर्णन नही करेगा, परन्तु शुभ-चिन्तक बन समय और परिस्थिती को देखकर श्रेष्ठ भावना से समझायेगा | अगर भूल करने वला व्यक्ति नही समझता तो वह स्वयं की स्थिति नहीं बिगाडेगा लेकिन भूल करने वाले का भाग्य समझकर समा देगा वह आत्माओं के अवगणुणों को न देख कर केवल उनसे गुण ही धारण कर सदा हर्षित रहेगा |
3. परख शक्ति - राजयोगद्वारा परख शक्ति भी सुचारु रुप से आती है | जौसे एक जौहरी कसौटी के आधार से असली व नकली आभूषणों को परख लेता है, वौसे ही राजयोगी भी ज्ञान की कसोटी के आधार से सच्चे व झूठे व्यक्ति और परिस्थिति को परख सकता है | परमात्मा की याद से साक्षीपन की स्थिति बन जाती है जो हर व्यक्ति, वस्तु व परिस्थिति को स्पष्ट परखने में मदद करती है, अथवा परख शक्ति सहज ही धारण करा देती है |
4. निर्णय शक्ति - राजयोगी के मन-बुध्दि की तार परमात्मा के साथ जुटी होने के कारण वह तराजू की तरह उचित ओर अनुचित बात का शीघ्र ही निर्णय ले सकता है | उसको परमात्मा से कई प्रकार की प्रेरणायें भी प्राप्त होती हैं, बुध्दिमानों मे बुध्दिमान परमात्मा से बुध्दियोग लगाने से योग्य समय पर निर्णय लेना सहज आ जाता है अथवा निर्णय शक्ति का विकास होता है |
5. सामना करने की शक्ति - राजयोगी मनुष्य का सामना नहीं करता है लेकिन परिस्थितीतयों का सामना बड़ी सहज रीति से कर लेता है | सबके दु:खदायक परिस्थिती जो किसी के जीवन में आती है वह है अपने नजदीक के सम्बन्धी की मृत्यु | राजयोगी इस घटना का बगौर किसी दु:ख और वेदना के सामना करता है क्योंकि वह जानता हैकि आत्मा तो कभी भी मरती हनीं है, आत्मा एक अभिनेता की तरह इस सृष्टि रुपी रंगमंच पर आती है, शरीर तो केवल एक वस्त्र के समान है | किसी की मृत्यु पर राजयोगी यही सोचता है कि वह आत्मा एक शरीर रुपी वस्त्र छोड़ अपने कर्मो के अनुसार अन्य देह रुपी वस्त्र धारण करने के लिए गई है - दूसरा अभिनय करने | राजयोगी के सामने अगर सांसारिक समस्यायें तूफान का रुप धारण कर आएं तो भी वह कभी विचलित नहीं होता है. असने अपना साथी परमात्मा को बनाया है | जिसका साथी है भगवान उसको क्या रोकेगा आंधी और तूफान ? परमात्मा का सहारा होने के कारण राजयोगी की आत्मा सदा दीपक के समान जगती रहती है तथा अन्य आत्माओं को ज्ञान प्रकाश देती रहती है | अत: परमात्मा की याद में राजयोगी आत्मा के अविनाशीपन, ड्रामा की ढाल तथा सर्वशक्तिवान् पिता की सन्तान होने के फलस्वरुप अपने शक्ति स्वरुप में स्थित होकर परिस्थिति का सामना सहज ही कर सकता है.
6. सहयोग शक्ति - आज सहयोग शक्ति की कमी के फलस्वरुप किती समस्यायें खड़ी हो जाती है. मनुष्य अपने स्वार्थ के कारण सहयोग नही देना चाहता है. आज संसार में तीन प्रकार के मनुष्य पायें जाते है - एक है दानवी वृतीवाले, दानवी वृत्ती वाले सोचेंगे - ``मेरा तो मेरा पर तेरा भी मेरा`` | अर्थात् सहयोग देने के बजाय अन्य की वस्तू पर भी अधिकार रखेंगे | मानवी वृत्ती वाले सोचेंगे - ``मेरा सो मेरा, तेरा सो तेरा``, अर्थात् किसी से मतलब नही उनमें अगर स्वार्थ नहीं तो परोपकार की भावना भी नही परन्तु राजयोगी कहेगा -`` न कुछ मेरा न कुछ तेरा ``| यह सबकुछ परमात्मा का है | वह केवल अपनी चीज़ों से ही अनासक्त नही रहेगा परन्तू अन्य को भी अनासक्त रहने की प्रेरणा देगा| वह अपने तन-मन-धन को परमात्मा की अमानत समझकर ट्रस्टी होकर चलेगा और उसे ईश्वरीय कार्य में लगाकर सहयोगी बनता जायेगा | वह स्वयं कार्य करके अन्य को सिखायेगा | इसी प्रकार परमात्मा के कार्य में एक-एक के सहयोग की अंगुली मिलने से इस कलियुगी पहाड को उठाकर इसके स्थान पर सतयुग को लाना कोई बड़ी बात नही है. बस हिम्मत रखते जाईये और परमात्मा की मदद लेते जाईये | हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा |
7. विस्तार को संकीर्ण करने की शक्ति - जौसे कुछुआ अपने अंगो को जब चाहे सिकोड़ लेता है जब चाहे उन्हंे फैला लेता है, वौसे ही राजयोगी जब चाहे अपनी इच्छा अनुसार मालिक बन अपनी कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करता है और जब चाहे विदेही एवं शान्त अवस्था में रह सकता है | इस प्रकार की विदेह अवस्था में रहकर वह अनेक बन्धनों से स्वयं को मुक्त अनुभव करता है |
8. समेटने की शक्ति - राजयोगी में समेटने की शक्ति भी बहुत सहज आ जाती है क्योंकि वह जानता है कि सृष्टि चक्र का अन्तिम समय होने के कारण उसके वापिस परमधाम घर जाने का समय आ चुका है जिस प्रकार एक मुसाफ़िर यात्रा पर जात ेसमय आवश्यक वस्तुएं ही अपने साथ ले जाता है, उसी प्रकार राजयोगी अपनी आत्मामें दिव्य गुण, शक्तियां, श्रेष्ठ कर्म या श्रेष्ठ संस्कारां का ही संग्रह करता है, क्योंकि वे ही आत्मा के सच्चे साथी बनकर उसके साथ जाते है | वह और सब ताफ से अपना हिसाब-किताब चुकता करता जाता है और एक ही लगन में रहता है कि उसे वापस परमधाम जाता है.
वह यह अवश्य ही ध्यान रखता होगा कि किस समय किस स्थिती का प्रयोग करना है सहनशक्ति धारण करने के समय अगर सामना करने कि शक्ति का प्रयोग किया तो और समस्या खड़ी हो सकती है. सामना करने के बदले गिर सहन कर लिया तो भी सफलता नहीं मिलेगी. इसलिए सबसे पहले आवश्यक है परख और निर्णयशक्ति.
राजयोगी आदि, मध्य और अन्त सोच-समझकर कदम आगे बढ़ाता है, उसमें सहनशक्ति होने के कारण र्धेयता का भी गुण है. धीरज का फल सदा मीठा होता है इसलिए राजयोगी हर कर्म में सदा सपुलता का अनुभव करता है. वह सदा आत्मस्थितीत में रहने कारण अन्तर्मुखी बन अपनी अवस्था भी जांच करता रहता है. इसके फलस्वरुप उसका हर संकल्प, बोल और कर्म श्रेष्ठ होता है उसकी वाणी में मिठास होती है इस अढ़ाई इंच की जीभ के लिए कहावत है कि, ``चाहे तो वह किसी को तखत पर बिठाये और चाहे तो किसी को तख्ते पर चढ़ाये.`` तलवार का घाव तो कुछ समय के बाद मिट जायेगा लेकिन जबान से किसी के हृदय पर किया हुआ घाव अमिट रह जाता है. राजयोगी हंस के समान सभी के गुण रुपी मोती ग्रहण करता है, अत: वह सदा हर्षित भी रहता है और हर परिस्थिती में स्थिर रहता है.
राजयोगी मंे इन दिव्य गुणांे और शक्तियों की धारणा होने के कारण वह समाज के लिए एक प्रेरणादायक अंग बन जाता है. वह अपने स्व-परिवर्तन द्वारा पहले अपने परिवार को शुध्द और पावन बनाता है, परिवार के बदलने से समाज बदलता है, समाज के बदलने से देश और देश के बदलने से सारा विश्व बदल जाता है इसी प्रकार राजयोगी स्व परिवर्तन से सारे विश्व का परिवर्तन करता है.
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मात्मा कौन है और कैसा है??
परमात्मा कौन है और कैसा है?? परमात्मा कौन है और कैसा है?? ये सवाल अक्सर हमारे मन में आता है, इसके अलग अलग मान्यताएं है ! पर ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार परमात्मा आत्मा की ही तरह है जैसा की आत्मा के बारे में पिछली पोस्ट में बताया था की आत्मा एक ज्योतिस्व Inbox
BK Bhagwan Bhai Mon, Mar 8, 2010 at 10:06 AM
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परमात्मा कौन है और कैसा है?? परमात्मा कौन है और कैसा है?? ये सवाल अक्सर हमारे मन में आता है, इसके अलग अलग मान्यताएं है !
पर ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार परमात्मा आत्मा की ही तरह है जैसा की आत्मा के बारे में पिछली पोस्ट में
बताया था की आत्मा एक ज्योतिस्वरूप अंडाकार और अति सूक्षम जो स्थूल आँखों से देखि नहीं जा सकती, है|
ठीक परमात्मा का भी वैसा ही आकार वैसा ही रूप और उतने ही सूक्ष्म है|
क्यूंकि परमात्मा हम सभी आत्माओं के पिता है|जैसे लौकिक में आदमी और उसकी संतान आदमी ही होती है,
गाय की बाछी गाय ही ही होती है,ठीक उसी प्रकार आत्मा के पिता परमात्मा भी आत्मा जैसे ही होते हैं|
फर्क है तो ये की उनकी सक्तियाँ असीमित है आत्मा ज्ञान स्वरुप है तो परमात्मा ज्ञान के सागर है,
आत्मा शांति स्वरुप है तो परमात्मा शांति के सागर हैं|
आत्मा प्रेम स्वरुप है तो परमात्मा प्रेम के सागर है |
कहने का तात्पर्य ये की परमात्मा सभी दिव्य गुणों के सागर हैं, और सृष्टि के रचियता है|
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BK Bhagwan Bhai
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परमात्मा कौन है और कैसा है?? परमात्मा कौन है और कैसा है?? ये सवाल अक्सर हमारे मन में आता है, इसके अलग अलग मान्यताएं है !
पर ब्रह्मा कुमारीज के अनुसार परमात्मा आत्मा की ही तरह है जैसा की आत्मा के बारे में पिछली पोस्ट में
बताया था की आत्मा एक ज्योतिस्वरूप अंडाकार और अति सूक्षम जो स्थूल आँखों से देखि नहीं जा सकती, है|
ठीक परमात्मा का भी वैसा ही आकार वैसा ही रूप और उतने ही सूक्ष्म है|
क्यूंकि परमात्मा हम सभी आत्माओं के पिता है|जैसे लौकिक में आदमी और उसकी संतान आदमी ही होती है,
गाय की बाछी गाय ही ही होती है,ठीक उसी प्रकार आत्मा के पिता परमात्मा भी आत्मा जैसे ही होते हैं|
फर्क है तो ये की उनकी सक्तियाँ असीमित है आत्मा ज्ञान स्वरुप है तो परमात्मा ज्ञान के सागर है,
आत्मा शांति स्वरुप है तो परमात्मा शांति के सागर हैं|
आत्मा प्रेम स्वरुप है तो परमात्मा प्रेम के सागर है |
कहने का तात्पर्य ये की परमात्मा सभी दिव्य गुणों के सागर हैं, और सृष्टि के रचियता है|
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प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू के राजयोगी भगवान भाई ने कहीं।
प्रभु चिंतन,आत्मचिंतन से मनुष्य को अतिंद्रिय सुख मिलता है। इस सुख के सामने संसार के सारे सुख फीके लगते हैं। यह बातें प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू के राजयोगी भगवान भाई ने कहीं। वे यहां केंद्र में ईश्वर प्रेमी श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान होना जरूरी है। एक मैं कौन हूं। दो-मेरा आत्मिक पिता कौन है और तीन मैं कहां से आया हूं। उन्होंने कहा कि हम ज्योतिस्वरूप आत्माएं हैं। हम सभी निराकार आत्माएं निराकार परम पिता परमात्मा शिव के बच्चे हैं। हम सभी चांद, सूर्य, तारा गण के पार सुनहरी लाल प्रकाशमय दुनिया से आए हैं। उन्होंने कहा कि आज हम उस परमात्मा को भूल गए हैं। अपने को भूल गए हैं। इसलिए संसार में भटक रहे हैं। परमात्मा गुणों, शांति,आनंद, प्रेम का सागर है।
हमें भी सद्गुणों के विकास की ओर ध्यान देना चाहिए। उन्होंंने कहा आत्मा के पतन का कारण देहभान है। जब मनुष्य का देहभान प्रबल हो जाता है तो वह काम,क्रोध,लोभ, मोह, अहंकार, आदि विकारंों के वश में होकर अपनी दिव्य शक्ति में खो देता है। इंद्रियों का गुलाम हो जाता है।
तब प्रकृति भी तमो प्रधान हो जाती है। मनुष्य दुखी और अशांत
रहता है। उन्होंने कहा अब भक्त की पुकार सुनकर निराकार शिव धरती पर अवतरित हो चुके हैं। उनको सिर्फ भक्ति भाव से याद करने की आवश्यकता है। शिव हमें कर्म गति का ज्ञान और योगाभ्यास का ज्ञान देकर मनोविकारों को जीतने का आदेश दे रहे हैं। जो मनुष्य अपने विकारों को जीतेगा, सद्गुणों को अपनाएगा, वत स्वर्णिम दुनिया में देवपद पाता है। उन्होंने कहा कि सत्संग से प्राप्त ज्ञान ही हमारी असली कमाई है। इसे न तो चोर चुरा सकता है और न आग जला सकती है। ऐसी कमाई के लिए हमें समय निकालना चाहिए। सत्संग के द्वारा ही हम अच्छे संस्कार प्राप्त करते हैं और अपना व्यवहार सुधार पाते हैं। उन्होंने राजयोग की महत्ता बताई और कहा कि राजयोग के द्वारा ही हम अपने संस्कारों को सतो प्रदान बना सकते हैं। इंद्रियों पर काबू कर सकते हैं। केंद्र की बीके बिंदु ने ईश्वरीय महावाक्य सुनाए। इस मौके पर नगर पंचायत अध्यक्ष ममता राठौर सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
प्रभु वचन
मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान होना जरूरी है। और ज्ञान ही हमारी असली कमाई है।
हमें भी सद्गुणों के विकास की ओर ध्यान देना चाहिए। उन्होंंने कहा आत्मा के पतन का कारण देहभान है। जब मनुष्य का देहभान प्रबल हो जाता है तो वह काम,क्रोध,लोभ, मोह, अहंकार, आदि विकारंों के वश में होकर अपनी दिव्य शक्ति में खो देता है। इंद्रियों का गुलाम हो जाता है।
तब प्रकृति भी तमो प्रधान हो जाती है। मनुष्य दुखी और अशांत
रहता है। उन्होंने कहा अब भक्त की पुकार सुनकर निराकार शिव धरती पर अवतरित हो चुके हैं। उनको सिर्फ भक्ति भाव से याद करने की आवश्यकता है। शिव हमें कर्म गति का ज्ञान और योगाभ्यास का ज्ञान देकर मनोविकारों को जीतने का आदेश दे रहे हैं। जो मनुष्य अपने विकारों को जीतेगा, सद्गुणों को अपनाएगा, वत स्वर्णिम दुनिया में देवपद पाता है। उन्होंने कहा कि सत्संग से प्राप्त ज्ञान ही हमारी असली कमाई है। इसे न तो चोर चुरा सकता है और न आग जला सकती है। ऐसी कमाई के लिए हमें समय निकालना चाहिए। सत्संग के द्वारा ही हम अच्छे संस्कार प्राप्त करते हैं और अपना व्यवहार सुधार पाते हैं। उन्होंने राजयोग की महत्ता बताई और कहा कि राजयोग के द्वारा ही हम अपने संस्कारों को सतो प्रदान बना सकते हैं। इंद्रियों पर काबू कर सकते हैं। केंद्र की बीके बिंदु ने ईश्वरीय महावाक्य सुनाए। इस मौके पर नगर पंचायत अध्यक्ष ममता राठौर सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
प्रभु वचन
मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान होना जरूरी है। और ज्ञान ही हमारी असली कमाई है।
प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू के राजयोगी भगवान भाई ने कहीं।
प्रभु चिंतन,आत्मचिंतन से मनुष्य को अतिंद्रिय सुख मिलता है। इस सुख के सामने संसार के सारे सुख फीके लगते हैं। यह बातें प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू के राजयोगी भगवान भाई ने कहीं। वे यहां केंद्र में ईश्वर प्रेमी श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान होना जरूरी है। एक मैं कौन हूं। दो-मेरा आत्मिक पिता कौन है और तीन मैं कहां से आया हूं। उन्होंने कहा कि हम ज्योतिस्वरूप आत्माएं हैं। हम सभी निराकार आत्माएं निराकार परम पिता परमात्मा शिव के बच्चे हैं। हम सभी चांद, सूर्य, तारा गण के पार सुनहरी लाल प्रकाशमय दुनिया से आए हैं। उन्होंने कहा कि आज हम उस परमात्मा को भूल गए हैं। अपने को भूल गए हैं। इसलिए संसार में भटक रहे हैं। परमात्मा गुणों, शांति,आनंद, प्रेम का सागर है।
हमें भी सद्गुणों के विकास की ओर ध्यान देना चाहिए। उन्होंंने कहा आत्मा के पतन का कारण देहभान है। जब मनुष्य का देहभान प्रबल हो जाता है तो वह काम,क्रोध,लोभ, मोह, अहंकार, आदि विकारंों के वश में होकर अपनी दिव्य शक्ति में खो देता है। इंद्रियों का गुलाम हो जाता है।
तब प्रकृति भी तमो प्रधान हो जाती है। मनुष्य दुखी और अशांत
रहता है। उन्होंने कहा अब भक्त की पुकार सुनकर निराकार शिव धरती पर अवतरित हो चुके हैं। उनको सिर्फ भक्ति भाव से याद करने की आवश्यकता है। शिव हमें कर्म गति का ज्ञान और योगाभ्यास का ज्ञान देकर मनोविकारों को जीतने का आदेश दे रहे हैं। जो मनुष्य अपने विकारों को जीतेगा, सद्गुणों को अपनाएगा, वत स्वर्णिम दुनिया में देवपद पाता है। उन्होंने कहा कि सत्संग से प्राप्त ज्ञान ही हमारी असली कमाई है। इसे न तो चोर चुरा सकता है और न आग जला सकती है। ऐसी कमाई के लिए हमें समय निकालना चाहिए। सत्संग के द्वारा ही हम अच्छे संस्कार प्राप्त करते हैं और अपना व्यवहार सुधार पाते हैं। उन्होंने राजयोग की महत्ता बताई और कहा कि राजयोग के द्वारा ही हम अपने संस्कारों को सतो प्रदान बना सकते हैं। इंद्रियों पर काबू कर सकते हैं। केंद्र की बीके बिंदु ने ईश्वरीय महावाक्य सुनाए। इस मौके पर नगर पंचायत अध्यक्ष ममता राठौर सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
प्रभु वचन
मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान होना जरूरी है। और ज्ञान ही हमारी असली कमाई है।
हमें भी सद्गुणों के विकास की ओर ध्यान देना चाहिए। उन्होंंने कहा आत्मा के पतन का कारण देहभान है। जब मनुष्य का देहभान प्रबल हो जाता है तो वह काम,क्रोध,लोभ, मोह, अहंकार, आदि विकारंों के वश में होकर अपनी दिव्य शक्ति में खो देता है। इंद्रियों का गुलाम हो जाता है।
तब प्रकृति भी तमो प्रधान हो जाती है। मनुष्य दुखी और अशांत
रहता है। उन्होंने कहा अब भक्त की पुकार सुनकर निराकार शिव धरती पर अवतरित हो चुके हैं। उनको सिर्फ भक्ति भाव से याद करने की आवश्यकता है। शिव हमें कर्म गति का ज्ञान और योगाभ्यास का ज्ञान देकर मनोविकारों को जीतने का आदेश दे रहे हैं। जो मनुष्य अपने विकारों को जीतेगा, सद्गुणों को अपनाएगा, वत स्वर्णिम दुनिया में देवपद पाता है। उन्होंने कहा कि सत्संग से प्राप्त ज्ञान ही हमारी असली कमाई है। इसे न तो चोर चुरा सकता है और न आग जला सकती है। ऐसी कमाई के लिए हमें समय निकालना चाहिए। सत्संग के द्वारा ही हम अच्छे संस्कार प्राप्त करते हैं और अपना व्यवहार सुधार पाते हैं। उन्होंने राजयोग की महत्ता बताई और कहा कि राजयोग के द्वारा ही हम अपने संस्कारों को सतो प्रदान बना सकते हैं। इंद्रियों पर काबू कर सकते हैं। केंद्र की बीके बिंदु ने ईश्वरीय महावाक्य सुनाए। इस मौके पर नगर पंचायत अध्यक्ष ममता राठौर सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
प्रभु वचन
मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान होना जरूरी है। और ज्ञान ही हमारी असली कमाई है।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए राजयोगी ब्रह्माकुमार भगवान भाई
भास्कर न्यूज & नवापारा-राजिम
मनुष्य के द्वारा आध्यात्मिकता को नजरअंदाज किए जाने का ही परिणाम ही है कि आज समाज में नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है। नैतिकता से व्यक्तित्व का विकास संभव है।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए राजयोगी ब्रह्माकुमार भगवान भाई अखिल भारतीय शैक्षणिक अभियान में फूलचंद अग्रवाल महाविद्यालय में नैतिक शिक्षा पर छात्रों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि देश व प्रदेशों में अनेक शैक्षणिक संस्था समर्पित भाव से काम करने के बावजूद आज समाज की यह स्थिति बनती जा रही है। उन्होंने कहा कि स्कूल से ही समाज के हर क्षेत्र में व्यक्ति जाता है अगर समाज के हर क्षेत्र को सुधारना है तो वर्तमान के छात्र-छात्राओं को नैतिक शिक्षा देने की आवश्कता है। आज बच्चा कल का भावी समाज है। उन्होंने कहा कि सद्गुणों की शिक्षा से ही सदव्यवहार में बदलाव लाया गया जा सकता है। अवगुणों के कारण मानव, मानव में आसूरी प्रवृत्ति पनपती है। नैतिक शिक्षा से ही छात्र-छात्राओं में सशक्तिकरण आ सकता है। उन्होंने आगे बताया कि नैतिकता के बिना जीवन अंधकार में हैं। नैतिक मूल्यों की कमी के कारण अज्ञानता, सामाजिक, कुरीतियां व्यसन, नशा, व्यभिचार आदि के कारण समाज पतन की ओर जाता है। उन्होंने कहा कि जब तक नैतिक मूल्यों से समाज को जागृत नहीं करते तब तक समाज में फैला हुआ अज्ञानता का अंधकार नहीं मिट सकता। वर्तमान परिवेश में सहनशीलता, नम्रता, मधुरता, गंभीरता, ईमादारी, धैर्यता, शांति आदि सद्गुणों की समाज के हर व्यक्ति को बहुत जरूरी है। इन सद्गुणों के आचरण से ही मानव मन में फैले हुए अनेक दुर्गुणों का नाश हो सकता है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता ही नैतिक मूल्यों का स्रोत है। स्वयं को जानना कर्मगति को जानना, सृष्टि के हर प्राणाी मात्र से दया करना, आपस में भाईचारे से रहना ही अध्यात्मिकता है। उन्होंने बताया कि नैतिक पतन विनाश की ओर की ओर ले जाता है। इसीलिए मूल्यों की रक्षा करना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य है। स्थानीय ब्रह्माकुमारी राजयोग केंद्र की बीके पुष्पा ने इस अवसर पर कहा कि राजयोग के द्वारा ही हम अपनी इंद्रियों पर संयम कर जीवन के मूल्यों को धारण कर सकते हैं। यहां अध्यक्ष मनमोहन अग्रवाल भी उपस्थित थे। भीलवाड़ा से आई बीके इंद्रा बहन ने राजयोग सिखाया।
मनुष्य के द्वारा आध्यात्मिकता को नजरअंदाज किए जाने का ही परिणाम ही है कि आज समाज में नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है। नैतिकता से व्यक्तित्व का विकास संभव है।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए राजयोगी ब्रह्माकुमार भगवान भाई अखिल भारतीय शैक्षणिक अभियान में फूलचंद अग्रवाल महाविद्यालय में नैतिक शिक्षा पर छात्रों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि देश व प्रदेशों में अनेक शैक्षणिक संस्था समर्पित भाव से काम करने के बावजूद आज समाज की यह स्थिति बनती जा रही है। उन्होंने कहा कि स्कूल से ही समाज के हर क्षेत्र में व्यक्ति जाता है अगर समाज के हर क्षेत्र को सुधारना है तो वर्तमान के छात्र-छात्राओं को नैतिक शिक्षा देने की आवश्कता है। आज बच्चा कल का भावी समाज है। उन्होंने कहा कि सद्गुणों की शिक्षा से ही सदव्यवहार में बदलाव लाया गया जा सकता है। अवगुणों के कारण मानव, मानव में आसूरी प्रवृत्ति पनपती है। नैतिक शिक्षा से ही छात्र-छात्राओं में सशक्तिकरण आ सकता है। उन्होंने आगे बताया कि नैतिकता के बिना जीवन अंधकार में हैं। नैतिक मूल्यों की कमी के कारण अज्ञानता, सामाजिक, कुरीतियां व्यसन, नशा, व्यभिचार आदि के कारण समाज पतन की ओर जाता है। उन्होंने कहा कि जब तक नैतिक मूल्यों से समाज को जागृत नहीं करते तब तक समाज में फैला हुआ अज्ञानता का अंधकार नहीं मिट सकता। वर्तमान परिवेश में सहनशीलता, नम्रता, मधुरता, गंभीरता, ईमादारी, धैर्यता, शांति आदि सद्गुणों की समाज के हर व्यक्ति को बहुत जरूरी है। इन सद्गुणों के आचरण से ही मानव मन में फैले हुए अनेक दुर्गुणों का नाश हो सकता है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता ही नैतिक मूल्यों का स्रोत है। स्वयं को जानना कर्मगति को जानना, सृष्टि के हर प्राणाी मात्र से दया करना, आपस में भाईचारे से रहना ही अध्यात्मिकता है। उन्होंने बताया कि नैतिक पतन विनाश की ओर की ओर ले जाता है। इसीलिए मूल्यों की रक्षा करना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य है। स्थानीय ब्रह्माकुमारी राजयोग केंद्र की बीके पुष्पा ने इस अवसर पर कहा कि राजयोग के द्वारा ही हम अपनी इंद्रियों पर संयम कर जीवन के मूल्यों को धारण कर सकते हैं। यहां अध्यक्ष मनमोहन अग्रवाल भी उपस्थित थे। भीलवाड़ा से आई बीके इंद्रा बहन ने राजयोग सिखाया।
गुंडरदेही & अखिल भारतीय शैक्षणिक अभियान के कार्यक्रम के तहत प्रजापिता
गुंडरदेही & अखिल भारतीय शैक्षणिक अभियान के कार्यक्रम के तहत प्रजापिता
ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से पधारे राजयोगी
ब्रह्मकुमार भगवान भाई स्थानीय शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों के
बीच पहुंचे। उन्होंने सर्वांगीण विकास के लिए भौतिक शिक्षा के साथ-साथ
नैतिक शिक्षा को भी आवश्यक बताया। माता कर्मा महाविद्यालय एवं शासकीय
उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए
उन्होंने कहा कि शैक्षणिक जगत में विद्यार्थियों के लिए नैतिक मूल्यों को
जीवन में धारण करने की प्रेरणा देना आज की आवश्यकता है। उन्होंने आगे
बताया कि नैतिक मूल्यों की कमी व्यक्तिगत, सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय
एवं अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का मूल कारण है। विद्यार्थियों का मूल्यांकन
आचरण, अनुसरण, लेखन, व्यवहारिक ज्ञान एवं अन्य बातों की तरफ प्रेरणा देने
की आवश्यकता है।
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ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से पधारे राजयोगी
ब्रह्मकुमार भगवान भाई स्थानीय शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों के
बीच पहुंचे। उन्होंने सर्वांगीण विकास के लिए भौतिक शिक्षा के साथ-साथ
नैतिक शिक्षा को भी आवश्यक बताया। माता कर्मा महाविद्यालय एवं शासकीय
उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए
उन्होंने कहा कि शैक्षणिक जगत में विद्यार्थियों के लिए नैतिक मूल्यों को
जीवन में धारण करने की प्रेरणा देना आज की आवश्यकता है। उन्होंने आगे
बताया कि नैतिक मूल्यों की कमी व्यक्तिगत, सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय
एवं अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का मूल कारण है। विद्यार्थियों का मूल्यांकन
आचरण, अनुसरण, लेखन, व्यवहारिक ज्ञान एवं अन्य बातों की तरफ प्रेरणा देने
की आवश्यकता है।
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प्रभु चिंतन,आत्मचिंतन से मनुष्य को अतिंद्रिय सुख मिलता है। इस सुख के
प्रभु चिंतन,आत्मचिंतन से मनुष्य को अतिंद्रिय सुख मिलता है। इस सुख के
सामने संसार के सारे सुख फीके लगते हैं। यह बातें प्रजापिता
ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू के राजयोगी भगवान भाई ने
कहीं। वे यहां केंद्र में ईश्वर प्रेमी श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे
हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान
होना जरूरी है। एक मैं कौन हूं। दो-मेरा आत्मिक पिता कौन है और तीन मैं
कहां से आया हूं। उन्होंने कहा कि हम ज्योतिस्वरूप आत्माएं हैं। हम सभी
निराकार आत्माएं निराकार परम पिता परमात्मा शिव के बच्चे हैं। हम सभी
चांद, सूर्य, तारा गण के पार सुनहरी लाल प्रकाशमय दुनिया से आए हैं।
उन्होंने कहा कि आज हम उस परमात्मा को भूल गए हैं। अपने को भूल गए हैं।
इसलिए संसार में भटक रहे हैं। परमात्मा गुणों, शांति,आनंद, प्रेम का सागर
है।
हमें भी सद्गुणों के विकास की ओर ध्यान देना चाहिए। उन्होंंने कहा आत्मा
के पतन का कारण देहभान है। जब मनुष्य का देहभान प्रबल हो जाता है तो वह
काम,क्रोध,लोभ, मोह, अहंकार, आदि विकारंों के वश में होकर अपनी दिव्य
शक्ति में खो देता है। इंद्रियों का गुलाम हो जाता है।
तब प्रकृति भी तमो प्रधान हो जाती है। मनुष्य दुखी और अशांत
रहता है। उन्होंने कहा अब भक्त की पुकार सुनकर निराकार शिव धरती पर
अवतरित हो चुके हैं। उनको सिर्फ भक्ति भाव से याद करने की आवश्यकता है।
शिव हमें कर्म गति का ज्ञान और योगाभ्यास का ज्ञान देकर मनोविकारों को
जीतने का आदेश दे रहे हैं। जो मनुष्य अपने विकारों को जीतेगा, सद्गुणों
को अपनाएगा, वत स्वर्णिम दुनिया में देवपद पाता है। उन्होंने कहा कि
सत्संग से प्राप्त ज्ञान ही हमारी असली कमाई है। इसे न तो चोर चुरा सकता
है और न आग जला सकती है। ऐसी कमाई के लिए हमें समय निकालना चाहिए। सत्संग
के द्वारा ही हम अच्छे संस्कार प्राप्त करते हैं और अपना व्यवहार सुधार
पाते हैं। उन्होंने राजयोग की महत्ता बताई और कहा कि राजयोग के द्वारा ही
हम अपने संस्कारों को सतो प्रदान बना सकते हैं। इंद्रियों पर काबू कर
सकते हैं। केंद्र की बीके बिंदु ने ईश्वरीय महावाक्य सुनाए। इस मौके पर
नगर पंचायत अध्यक्ष ममता राठौर सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
प्रभु वचन
मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान होना जरूरी है। और
ज्ञान ही हमारी असली कमाई है।
प्रभु चिंतन से सुख की प्राप्ति
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सामने संसार के सारे सुख फीके लगते हैं। यह बातें प्रजापिता
ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू के राजयोगी भगवान भाई ने
कहीं। वे यहां केंद्र में ईश्वर प्रेमी श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे
हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान
होना जरूरी है। एक मैं कौन हूं। दो-मेरा आत्मिक पिता कौन है और तीन मैं
कहां से आया हूं। उन्होंने कहा कि हम ज्योतिस्वरूप आत्माएं हैं। हम सभी
निराकार आत्माएं निराकार परम पिता परमात्मा शिव के बच्चे हैं। हम सभी
चांद, सूर्य, तारा गण के पार सुनहरी लाल प्रकाशमय दुनिया से आए हैं।
उन्होंने कहा कि आज हम उस परमात्मा को भूल गए हैं। अपने को भूल गए हैं।
इसलिए संसार में भटक रहे हैं। परमात्मा गुणों, शांति,आनंद, प्रेम का सागर
है।
हमें भी सद्गुणों के विकास की ओर ध्यान देना चाहिए। उन्होंंने कहा आत्मा
के पतन का कारण देहभान है। जब मनुष्य का देहभान प्रबल हो जाता है तो वह
काम,क्रोध,लोभ, मोह, अहंकार, आदि विकारंों के वश में होकर अपनी दिव्य
शक्ति में खो देता है। इंद्रियों का गुलाम हो जाता है।
तब प्रकृति भी तमो प्रधान हो जाती है। मनुष्य दुखी और अशांत
रहता है। उन्होंने कहा अब भक्त की पुकार सुनकर निराकार शिव धरती पर
अवतरित हो चुके हैं। उनको सिर्फ भक्ति भाव से याद करने की आवश्यकता है।
शिव हमें कर्म गति का ज्ञान और योगाभ्यास का ज्ञान देकर मनोविकारों को
जीतने का आदेश दे रहे हैं। जो मनुष्य अपने विकारों को जीतेगा, सद्गुणों
को अपनाएगा, वत स्वर्णिम दुनिया में देवपद पाता है। उन्होंने कहा कि
सत्संग से प्राप्त ज्ञान ही हमारी असली कमाई है। इसे न तो चोर चुरा सकता
है और न आग जला सकती है। ऐसी कमाई के लिए हमें समय निकालना चाहिए। सत्संग
के द्वारा ही हम अच्छे संस्कार प्राप्त करते हैं और अपना व्यवहार सुधार
पाते हैं। उन्होंने राजयोग की महत्ता बताई और कहा कि राजयोग के द्वारा ही
हम अपने संस्कारों को सतो प्रदान बना सकते हैं। इंद्रियों पर काबू कर
सकते हैं। केंद्र की बीके बिंदु ने ईश्वरीय महावाक्य सुनाए। इस मौके पर
नगर पंचायत अध्यक्ष ममता राठौर सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
प्रभु वचन
मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान होना जरूरी है। और
ज्ञान ही हमारी असली कमाई है।
प्रभु चिंतन से सुख की प्राप्ति
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सुखी जीवन के लिए भौतिक शिक्षा के साथ नैतिक शिक्षा भी जरूरी है।
न्यूज & राजिम
सुखी जीवन के लिए भौतिक शिक्षा के साथ नैतिक शिक्षा भी जरूरी है। भौतिक
शिक्षा से हम रोजगार प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन परिवार, समाज, कार्यस्थल
में परेशानी या चुनौती का मुकाबला नहीं कर सकते।
उक्त उद्गार नैतिक मूल्य जागृति अभियान में आए प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी
ईश्वरीय विवि के माउंट आबू के ब्रम्हाकुमार भगवान भाई ने व्य?त किए। अखिल
भारतीय शैक्षक्षिक अभियान के अंतर्गत शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला और
सरस्वती शिशु मंदिर के छात्रा-छात्राओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा
कि नैतिक मूल्यों से व्यक्तित्व में निखार, व्यवहार में सुधार आता है।
नैतिक मूल्यों का ह्रास व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय समस्या का मूल
कारण है। समाज सुधार के लिए नैतिक मूल्य जरूरी है।
उन्होंने कहा कि नैतिक शिक्षा की धारणा से, आंतरिक सशक्तीकरण से इच्छाओं
को कम कर भौतिकवाद की आंधी से बचा जा सकता है। व्यक्ति का आचरण उसकी
जुबान से ज्यादा तेज बोलता है। लोग जो कुछ आंख से देखते हैं। उसी की नकल
करते हैं।
हमारे जीवन में श्रेष्ठ मू््ल्य है तो दूसरे उससे प्रमाणित होते हैं।
जीवन में नैतिक मूल्य होंगे तो आदमी लालच, हिंसा, झूठ, कपट का विरोध
करेगा और समाज में परिवर्तन आएगा। उन्होंने कहा नैतिकता से मनोबल कम होता
है। मूल्यों की शिक्षा से ही हम जीवन में विपरीत परिस्थिति का सामना कर
सकते हैं। जब तक हम अपने जीवन में मूल्यों और प्राथमिकता का निर्धारण
नहीं करेंगे, अपने लिए आचार संहिता नहीं बनाएंगे तब तक हम चुनौतियों का
मुकाबला नहीं कर सकते। चरित्र उत्थान और आंतरिक शक्तियों के विकास के लिए
आचार संहिता जरूरी है। उन्होंनेे अंत में नैतिक मूल्यों का स्रोत
आध्यमित्कता को बताया। जब तक आध्यात्मिकता को नहीं अपनाएंगे जीवन में
मूल्यों की धारणा संभव नहीं है।
ब्रम्हाकुमारी हेमा ने कहा कि समाज में स्वयं को सुखीन सशक्त बनाने के
लिए नैतिक शिक्षा बहुत जरूरी है। ब्रम्हाकुमारी पुष्पा ने कहा कि
छात्राएं समाज की धरोहर है। उन्हें खुद को शक्तिशाली बनाने आध्यात्मिकता
को अपनाने को कहा। भारत में एक समय नैतिक मूल्य थे इसलिए लोग उन्हें देवी
की तरह पूजते थे। अंत में आभार प्रदर्शन विवेक शर्मा, जगन्नाथ साहू ने
किया।
सुखी जीवन के लिए भौतिक शिक्षा के साथ नैतिक शिक्षा भी जरूरी है। भौतिक
शिक्षा से हम रोजगार प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन परिवार, समाज, कार्यस्थल
में परेशानी या चुनौती का मुकाबला नहीं कर सकते।
उक्त उद्गार नैतिक मूल्य जागृति अभियान में आए प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी
ईश्वरीय विवि के माउंट आबू के ब्रम्हाकुमार भगवान भाई ने व्य?त किए। अखिल
भारतीय शैक्षक्षिक अभियान के अंतर्गत शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला और
सरस्वती शिशु मंदिर के छात्रा-छात्राओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा
कि नैतिक मूल्यों से व्यक्तित्व में निखार, व्यवहार में सुधार आता है।
नैतिक मूल्यों का ह्रास व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय समस्या का मूल
कारण है। समाज सुधार के लिए नैतिक मूल्य जरूरी है।
उन्होंने कहा कि नैतिक शिक्षा की धारणा से, आंतरिक सशक्तीकरण से इच्छाओं
को कम कर भौतिकवाद की आंधी से बचा जा सकता है। व्यक्ति का आचरण उसकी
जुबान से ज्यादा तेज बोलता है। लोग जो कुछ आंख से देखते हैं। उसी की नकल
करते हैं।
हमारे जीवन में श्रेष्ठ मू््ल्य है तो दूसरे उससे प्रमाणित होते हैं।
जीवन में नैतिक मूल्य होंगे तो आदमी लालच, हिंसा, झूठ, कपट का विरोध
करेगा और समाज में परिवर्तन आएगा। उन्होंने कहा नैतिकता से मनोबल कम होता
है। मूल्यों की शिक्षा से ही हम जीवन में विपरीत परिस्थिति का सामना कर
सकते हैं। जब तक हम अपने जीवन में मूल्यों और प्राथमिकता का निर्धारण
नहीं करेंगे, अपने लिए आचार संहिता नहीं बनाएंगे तब तक हम चुनौतियों का
मुकाबला नहीं कर सकते। चरित्र उत्थान और आंतरिक शक्तियों के विकास के लिए
आचार संहिता जरूरी है। उन्होंनेे अंत में नैतिक मूल्यों का स्रोत
आध्यमित्कता को बताया। जब तक आध्यात्मिकता को नहीं अपनाएंगे जीवन में
मूल्यों की धारणा संभव नहीं है।
ब्रम्हाकुमारी हेमा ने कहा कि समाज में स्वयं को सुखीन सशक्त बनाने के
लिए नैतिक शिक्षा बहुत जरूरी है। ब्रम्हाकुमारी पुष्पा ने कहा कि
छात्राएं समाज की धरोहर है। उन्हें खुद को शक्तिशाली बनाने आध्यात्मिकता
को अपनाने को कहा। भारत में एक समय नैतिक मूल्य थे इसलिए लोग उन्हें देवी
की तरह पूजते थे। अंत में आभार प्रदर्शन विवेक शर्मा, जगन्नाथ साहू ने
किया।
नैतिकता से व्यक्तित्व का विकास संभव है। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी
भास्कर न्यूज & नवापारा-राजिम
मनुष्य के द्वारा आध्यात्मिकता को नजरअंदाज किए जाने का ही परिणाम ही है
कि आज समाज में नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है।
नैतिकता से व्यक्तित्व का विकास संभव है। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी
ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए राजयोगी ब्रह्माकुमार भगवान भाई
अखिल भारतीय शैक्षणिक अभियान में फूलचंद अग्रवाल महाविद्यालय में नैतिक
शिक्षा पर छात्रों को संबोधित कर रहे थे। देश व प्रदेशों में अनेक
शैक्षणिक संस्था समर्पित भाव से काम करने के बावजूद आज समाज की यह स्थिति
बनती जा रही है।
उन्होंने कहा कि स्कूल से ही समाज के हर क्षेत्र में व्यक्ति जाता है अगर
समाज के हर क्षेत्र को सुधारना है तो वर्तमान के छात्र-छात्राओं को नैतिक
शिक्षा देने की आवश्कता है। आज बच्चा कल का भावी समाज है। उन्होंने कहा
कि सद्गुणों की शिक्षा से ही सदव्यवहार में बदलाव लाया गया जा सकता है।
अवगुणों के कारण मानव, मानव में आसूरी प्रवृत्ति पनपती है। नैतिक शिक्षा
से ही छात्र-छात्राओं में सशक्तिकरण आ सकता है। उन्होंने आगे बताया कि
नैतिकता के बिना जीवन अंधकार में हैं। नैतिक मूल्यों की कमी के कारण
अज्ञानता, सामाजिक, कुरीतियां व्यसन, नशा, व्यभिचार आदि के कारण समाज पतन
की ओर जाता है। उन्होंने कहा कि जब तक नैतिक मूल्यों से समाज को जागृत
नहीं करते तब तक समाज में फैला हुआ अज्ञानता का अंधकार नहीं मिट सकता।
वर्तमान परिवेश में सहनशीलता, नम्रता, मधुरता, गंभीरता, ईमादारी,
धैर्यता, शांति आदि सद्गुणों की समाज के हर व्यक्ति को बहुत जरूरी है। इन
सद्गुणों के आचरण से ही मानव मन में फैले हुए अनेक दुर्गुणों का नाश हो
सकता है। आध्यात्मिकता ही नैतिक मूल्यों का स्रोत है। स्वयं को जानना
कर्मगति को जानना, सृष्टि के हर प्राणाी मात्र से दया करना, आपस में
भाईचारे से रहना ही अध्यात्मिकता है।
उन्होंने बताया कि नैतिक पतन विनाश की ओर की ओर ले जाता है। इसीलिए
मूल्यों की रक्षा करना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य है। स्थानीय
ब्रह्माकुमारी राजयोग केंद्र की बीके पुष्पा ने इस अवसर पर कहा कि राजयोग
के द्वारा ही हम अपनी इंद्रियों पर संयम कर जीवन के मूल्यों को धारण कर
सकते हैं। यहां अध्यक्ष मनमोहन अग्रवाल भी उपस्थित थे।
भीलवाड़ा से आई बीके इंद्रा बहन ने राजयोग
मनुष्य के द्वारा आध्यात्मिकता को नजरअंदाज किए जाने का ही परिणाम ही है
कि आज समाज में नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है।
नैतिकता से व्यक्तित्व का विकास संभव है। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी
ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए राजयोगी ब्रह्माकुमार भगवान भाई
अखिल भारतीय शैक्षणिक अभियान में फूलचंद अग्रवाल महाविद्यालय में नैतिक
शिक्षा पर छात्रों को संबोधित कर रहे थे। देश व प्रदेशों में अनेक
शैक्षणिक संस्था समर्पित भाव से काम करने के बावजूद आज समाज की यह स्थिति
बनती जा रही है।
उन्होंने कहा कि स्कूल से ही समाज के हर क्षेत्र में व्यक्ति जाता है अगर
समाज के हर क्षेत्र को सुधारना है तो वर्तमान के छात्र-छात्राओं को नैतिक
शिक्षा देने की आवश्कता है। आज बच्चा कल का भावी समाज है। उन्होंने कहा
कि सद्गुणों की शिक्षा से ही सदव्यवहार में बदलाव लाया गया जा सकता है।
अवगुणों के कारण मानव, मानव में आसूरी प्रवृत्ति पनपती है। नैतिक शिक्षा
से ही छात्र-छात्राओं में सशक्तिकरण आ सकता है। उन्होंने आगे बताया कि
नैतिकता के बिना जीवन अंधकार में हैं। नैतिक मूल्यों की कमी के कारण
अज्ञानता, सामाजिक, कुरीतियां व्यसन, नशा, व्यभिचार आदि के कारण समाज पतन
की ओर जाता है। उन्होंने कहा कि जब तक नैतिक मूल्यों से समाज को जागृत
नहीं करते तब तक समाज में फैला हुआ अज्ञानता का अंधकार नहीं मिट सकता।
वर्तमान परिवेश में सहनशीलता, नम्रता, मधुरता, गंभीरता, ईमादारी,
धैर्यता, शांति आदि सद्गुणों की समाज के हर व्यक्ति को बहुत जरूरी है। इन
सद्गुणों के आचरण से ही मानव मन में फैले हुए अनेक दुर्गुणों का नाश हो
सकता है। आध्यात्मिकता ही नैतिक मूल्यों का स्रोत है। स्वयं को जानना
कर्मगति को जानना, सृष्टि के हर प्राणाी मात्र से दया करना, आपस में
भाईचारे से रहना ही अध्यात्मिकता है।
उन्होंने बताया कि नैतिक पतन विनाश की ओर की ओर ले जाता है। इसीलिए
मूल्यों की रक्षा करना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य है। स्थानीय
ब्रह्माकुमारी राजयोग केंद्र की बीके पुष्पा ने इस अवसर पर कहा कि राजयोग
के द्वारा ही हम अपनी इंद्रियों पर संयम कर जीवन के मूल्यों को धारण कर
सकते हैं। यहां अध्यक्ष मनमोहन अग्रवाल भी उपस्थित थे।
भीलवाड़ा से आई बीके इंद्रा बहन ने राजयोग
ब्रह्मकुमार भगवान भाई स्थानीय शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों के
गुंडरदेही & अखिल भारतीय शैक्षणिक अभियान के कार्यक्रम के तहत प्रजापिता
ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से पधारे राजयोगी
ब्रह्मकुमार भगवान भाई स्थानीय शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों के
बीच पहुंचे। उन्होंने सर्वांगीण विकास के लिए भौतिक शिक्षा के साथ-साथ
नैतिक शिक्षा को भी आवश्यक बताया। माता कर्मा महाविद्यालय एवं शासकीय
उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए
उन्होंने कहा कि शैक्षणिक जगत में विद्यार्थियों के लिए नैतिक मूल्यों को
जीवन में धारण करने की प्रेरणा देना आज की आवश्यकता है। उन्होंने आगे
बताया कि नैतिक मूल्यों की कमी व्यक्तिगत, सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय
एवं अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का मूल कारण है। विद्यार्थियों का मूल्यांकन
आचरण, अनुसरण, लेखन, व्यवहारिक ज्ञान एवं अन्य बातों की तरफ प्रेरणा देने
की आवश्यकता है।
--
1 http://picasaweb.google.co.in/sanjogm916108/SchoolServicesByBKBhagwan
2 http://www.indiashines.com/brahakumaris-photos-102929
3 http://www.indiashines.com/brahakumaris-photos-102941
4 http://www.indiashines.com/brahakumaris-photos-102945
5 http://www.indiashines.com/brahakumaris-photos-102963
6 http://picasaweb.google.co.in/hometab=mq
B. K. BHAGWAN, SHANTIVAN, +919414534517, +919414008991
ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से पधारे राजयोगी
ब्रह्मकुमार भगवान भाई स्थानीय शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों के
बीच पहुंचे। उन्होंने सर्वांगीण विकास के लिए भौतिक शिक्षा के साथ-साथ
नैतिक शिक्षा को भी आवश्यक बताया। माता कर्मा महाविद्यालय एवं शासकीय
उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए
उन्होंने कहा कि शैक्षणिक जगत में विद्यार्थियों के लिए नैतिक मूल्यों को
जीवन में धारण करने की प्रेरणा देना आज की आवश्यकता है। उन्होंने आगे
बताया कि नैतिक मूल्यों की कमी व्यक्तिगत, सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय
एवं अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का मूल कारण है। विद्यार्थियों का मूल्यांकन
आचरण, अनुसरण, लेखन, व्यवहारिक ज्ञान एवं अन्य बातों की तरफ प्रेरणा देने
की आवश्यकता है।
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1 http://picasaweb.google.co.in/sanjogm916108/SchoolServicesByBKBhagwan
2 http://www.indiashines.com/brahakumaris-photos-102929
3 http://www.indiashines.com/brahakumaris-photos-102941
4 http://www.indiashines.com/brahakumaris-photos-102945
5 http://www.indiashines.com/brahakumaris-photos-102963
6 http://picasaweb.google.co.in/hometab=mq
B. K. BHAGWAN, SHANTIVAN, +919414534517, +919414008991
प्रभु चिंतन,आत्मचिंतन से मनुष्य को अतिंद्रिय सुख मिलता है।
भास्कर न्यूज & गरियाबंद
प्रभु चिंतन,आत्मचिंतन से मनुष्य को अतिंद्रिय सुख मिलता है। इस सुख के
सामने संसार के सारे सुख फीके लगते हैं। यह बातें प्रजापिता
ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू के राजयोगी भगवान भाई ने
कहीं। वे यहां केंद्र में ईश्वर प्रेमी श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे
हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान
होना जरूरी है। एक मैं कौन हूं। दो-मेरा आत्मिक पिता कौन है और तीन मैं
कहां से आया हूं। उन्होंने कहा कि हम ज्योतिस्वरूप आत्माएं हैं। हम सभी
निराकार आत्माएं निराकार परम पिता परमात्मा शिव के बच्चे हैं। हम सभी
चांद, सूर्य, तारा गण के पार सुनहरी लाल प्रकाशमय दुनिया से आए हैं।
उन्होंने कहा कि आज हम उस परमात्मा को भूल गए हैं। अपने को भूल गए हैं।
इसलिए संसार में भटक रहे हैं। परमात्मा गुणों, शांति,आनंद, प्रेम का सागर
है।
हमें भी सद्गुणों के विकास की ओर ध्यान देना चाहिए। उन्होंंने कहा आत्मा
के पतन का कारण देहभान है। जब मनुष्य का देहभान प्रबल हो जाता है तो वह
काम,क्रोध,लोभ, मोह, अहंकार, आदि विकारंों के वश में होकर अपनी दिव्य
शक्ति में खो देता है। इंद्रियों का गुलाम हो जाता है।
तब प्रकृति भी तमो प्रधान हो जाती है। मनुष्य दुखी और अशांत
रहता है। उन्होंने कहा अब भक्त की पुकार सुनकर निराकार शिव धरती पर
अवतरित हो चुके हैं। उनको सिर्फ भक्ति भाव से याद करने की आवश्यकता है।
शिव हमें कर्म गति का ज्ञान और योगाभ्यास का ज्ञान देकर मनोविकारों को
जीतने का आदेश दे रहे हैं। जो मनुष्य अपने विकारों को जीतेगा, सद्गुणों
को अपनाएगा, वत स्वर्णिम दुनिया में देवपद पाता है। उन्होंने कहा कि
सत्संग से प्राप्त ज्ञान ही हमारी असली कमाई है। इसे न तो चोर चुरा सकता
है और न आग जला सकती है। ऐसी कमाई के लिए हमें समय निकालना चाहिए। सत्संग
के द्वारा ही हम अच्छे संस्कार प्राप्त करते हैं और अपना व्यवहार सुधार
पाते हैं। उन्होंने राजयोग की महत्ता बताई और कहा कि राजयोग के द्वारा ही
हम अपने संस्कारों को सतो प्रदान बना सकते हैं। इंद्रियों पर काबू कर
सकते हैं। केंद्र की बीके बिंदु ने ईश्वरीय महावाक्य सुनाए। इस मौके पर
नगर पंचायत अध्यक्ष ममता राठौर सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
प्रभु वचन
मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान होना जरूरी है। और
ज्ञान ही हमारी असली कमाई है।
प्रभु चिंतन,आत्मचिंतन से मनुष्य को अतिंद्रिय सुख मिलता है। इस सुख के
सामने संसार के सारे सुख फीके लगते हैं। यह बातें प्रजापिता
ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू के राजयोगी भगवान भाई ने
कहीं। वे यहां केंद्र में ईश्वर प्रेमी श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे
हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान
होना जरूरी है। एक मैं कौन हूं। दो-मेरा आत्मिक पिता कौन है और तीन मैं
कहां से आया हूं। उन्होंने कहा कि हम ज्योतिस्वरूप आत्माएं हैं। हम सभी
निराकार आत्माएं निराकार परम पिता परमात्मा शिव के बच्चे हैं। हम सभी
चांद, सूर्य, तारा गण के पार सुनहरी लाल प्रकाशमय दुनिया से आए हैं।
उन्होंने कहा कि आज हम उस परमात्मा को भूल गए हैं। अपने को भूल गए हैं।
इसलिए संसार में भटक रहे हैं। परमात्मा गुणों, शांति,आनंद, प्रेम का सागर
है।
हमें भी सद्गुणों के विकास की ओर ध्यान देना चाहिए। उन्होंंने कहा आत्मा
के पतन का कारण देहभान है। जब मनुष्य का देहभान प्रबल हो जाता है तो वह
काम,क्रोध,लोभ, मोह, अहंकार, आदि विकारंों के वश में होकर अपनी दिव्य
शक्ति में खो देता है। इंद्रियों का गुलाम हो जाता है।
तब प्रकृति भी तमो प्रधान हो जाती है। मनुष्य दुखी और अशांत
रहता है। उन्होंने कहा अब भक्त की पुकार सुनकर निराकार शिव धरती पर
अवतरित हो चुके हैं। उनको सिर्फ भक्ति भाव से याद करने की आवश्यकता है।
शिव हमें कर्म गति का ज्ञान और योगाभ्यास का ज्ञान देकर मनोविकारों को
जीतने का आदेश दे रहे हैं। जो मनुष्य अपने विकारों को जीतेगा, सद्गुणों
को अपनाएगा, वत स्वर्णिम दुनिया में देवपद पाता है। उन्होंने कहा कि
सत्संग से प्राप्त ज्ञान ही हमारी असली कमाई है। इसे न तो चोर चुरा सकता
है और न आग जला सकती है। ऐसी कमाई के लिए हमें समय निकालना चाहिए। सत्संग
के द्वारा ही हम अच्छे संस्कार प्राप्त करते हैं और अपना व्यवहार सुधार
पाते हैं। उन्होंने राजयोग की महत्ता बताई और कहा कि राजयोग के द्वारा ही
हम अपने संस्कारों को सतो प्रदान बना सकते हैं। इंद्रियों पर काबू कर
सकते हैं। केंद्र की बीके बिंदु ने ईश्वरीय महावाक्य सुनाए। इस मौके पर
नगर पंचायत अध्यक्ष ममता राठौर सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
प्रभु वचन
मनुष्य को आत्मवान होने के नाते तीन बातों का ज्ञान होना जरूरी है। और
ज्ञान ही हमारी असली कमाई है।
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